अमेरिकी सीनेट में उर्वरक संकट पर बहस, भारत के 2.5 मिलियन टन यूरिया टेंडर का हुआ जिक्र

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अमेरिकी सीनेट में उर्वरक संकट पर बहस, भारत के 2.5 मिलियन टन यूरिया टेंडर का हुआ जिक्र

सारांश

अमेरिकी सीनेट की कृषि समिति में उर्वरक संकट पर तीखी बहस हुई और भारत का नाम बार-बार उभरा। 2.5 मिलियन टन यूरिया का ताजा टेंडर, भारी सब्सिडी नीति और होर्मुज स्ट्रेट का जोखिम — इन तीन कारकों ने मिलकर वैश्विक उर्वरक बाजार को अस्थिर करने की चेतावनी दी है, जिसका असर भारत की अपनी कृषि लागत पर भी पड़ सकता है।

मुख्य बातें

अमेरिकी सीनेट कृषि समिति की 14 मई 2025 की सुनवाई में भारत को वैश्विक उर्वरक कीमतें प्रभावित करने वाले प्रमुख खरीदारों में गिनाया गया।
भारत ने हाल ही में लगभग 1,000 डॉलर प्रति मीट्रिक टन की दर से 2.5 मिलियन मीट्रिक टन यूरिया का टेंडर जारी किया — यह जानकारी कोरी रोसेनबुश ने दी।
अमेरिकी किसानों ने फरवरी से यूरिया में 55% , एनहाइड्रस में 33% और लिक्विड नाइट्रोजन में 25% मूल्यवृद्धि की सूचना दी।
वैश्विक यूरिया व्यापार का 34% और सल्फर निर्यात का 50% होर्मुज स्ट्रेट से होकर गुजरता है।
सीनेटर जॉन बूजमैन ने इसे अमेरिकी कृषि के लिए 'पीढ़ी दर पीढ़ी चलने वाला संकट' बताया; द्विदलीय विधायी समर्थन मिला।
भारत यूरिया, पोटाश और फॉस्फेट के लिए वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला पर अत्यधिक निर्भर है; कीमतें बढ़ने पर सब्सिडी बोझ बढ़ने का जोखिम।

अमेरिकी सीनेट कृषि समिति की 14 मई 2025 को हुई सुनवाई में भारत की भारी उर्वरक खरीद और सब्सिडी-आधारित कृषि नीतियों को वैश्विक उर्वरक कीमतों पर असर डालने वाले प्रमुख कारकों में गिनाया गया। सीनेटरों और किसान प्रतिनिधियों ने चेतावनी दी कि वैश्विक आपूर्ति में बाधाएँ और बढ़ती इनपुट लागत अमेरिकी कृषि क्षेत्र को गंभीर संकट में धकेल रही हैं।

सुनवाई में क्या उभरा

द फर्टिलाइजर इंस्टीट्यूट के अध्यक्ष एवं सीईओ कोरी रोसेनबुश ने समिति को बताया कि चीन के बाद दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा उर्वरक उपभोक्ता भारत ने हाल ही में लगभग 1,000 डॉलर प्रति मीट्रिक टन की दर से 2.5 मिलियन मीट्रिक टन यूरिया का एक बड़ा टेंडर जारी किया है। रोसेनबुश के अनुसार, 'भारत में संघीय सरकार उर्वरक खरीदती है और फिर अपने किसानों के लिए कीमतें कम रखने हेतु उस पर भारी सब्सिडी देती है।' उन्होंने कहा कि यह नीति वैश्विक माँग और आपूर्ति के पैटर्न को सीधे प्रभावित कर रही है।

अमेरिकी किसानों पर असर

दक्षिण डकोटा के किसान ट्रेंट कुबिक ने सीनेटरों को बताया कि हाल के वर्षों में उर्वरक की कीमतें लगभग दोगुनी हो गई हैं, जिससे खेती के फैसले बदलने पड़े हैं। कुबिक ने कहा, '2025 में हमने अपने खेत में कोई फॉस्फेट नहीं डाला क्योंकि यह हमारे लिए आर्थिक रूप से व्यावहारिक नहीं था।' केंटकी के किसान एडी मेल्टन ने बताया कि फरवरी से अब तक एनहाइड्रस की कीमतों में 33%, यूरिया में 55% और लिक्विड नाइट्रोजन में 25% की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। मेल्टन ने कहा कि कई उत्पादक बेहद कम या शून्य कार्यशील पूँजी के साथ काम कर रहे हैं।

भू-राजनीतिक जोखिम और होर्मुज स्ट्रेट

गवाहों ने होर्मुज स्ट्रेट के आसपास संभावित रुकावटों पर भी गंभीर चिंता जताई, जो ऊर्जा और उर्वरक सामग्री के लिए दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण शिपिंग मार्गों में से एक है। रोसेनबुश ने बताया कि वैश्विक स्तर पर कारोबार होने वाले यूरिया का लगभग 34% और दुनिया के सल्फर निर्यात का आधा हिस्सा इसी क्षेत्र से होकर गुजरता है। सुनवाई में चीन की उर्वरक उत्पादों पर निर्यात पाबंदियों पर भी चिंता व्यक्त की गई, जिससे वैश्विक आपूर्ति में और कमी आने की आशंका है।

सरकारी प्रतिक्रिया और विधायी कदम

समिति के अध्यक्ष सीनेटर जॉन बूजमैन ने इस संकट को अमेरिकी कृषि के लिए 'पीढ़ी दर पीढ़ी चलने वाली घटना' करार दिया। दोनों प्रमुख दलों के सीनेटरों ने उर्वरक बाजार में पारदर्शिता बढ़ाने और घरेलू अमेरिकी उत्पादन क्षमता को प्रोत्साहित करने के लिए द्विदलीय कानून का समर्थन किया। यह सुनवाई ऐसे समय में हुई जब ग्रामीण अमेरिका में दिवालियेपन की दर बढ़ रही है और खाद्य आपूर्ति की सुरक्षा को राष्ट्रीय सुरक्षा का विषय बताया जा रहा है।

भारत पर संभावित प्रभाव

गौरतलब है कि भारत यूरिया, पोटाश और फॉस्फेट के लिए वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला पर अत्यधिक निर्भर है। विशेषज्ञों के अनुसार, खाड़ी शिपिंग मार्ग में किसी भी दीर्घकालिक रुकावट या अंतरराष्ट्रीय उर्वरक कीमतों में और बढ़ोतरी से नई दिल्ली पर सब्सिडी का बोझ काफी बढ़ सकता है और फसल सीजन से पहले कृषि इनपुट लागत पर सीधा असर पड़ सकता है। आने वाले महीनों में अमेरिकी कांग्रेस में उर्वरक बाजार सुधार पर बहस और तेज होने की संभावना है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन आर्थिक तर्क से परे नहीं — चीन के बाद दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा उर्वरक उपभोक्ता होने के नाते भारत की थोक खरीद वास्तव में वैश्विक कीमतें प्रभावित करती है। विरोधाभास यह है कि भारत की सब्सिडी नीति घरेलू किसानों की रक्षा के लिए बनी है, लेकिन इसका अनपेक्षित असर अमेरिकी किसानों की लागत बढ़ाने में भी पड़ रहा है। मुख्यधारा की कवरेज इस तथ्य को नजरअंदाज करती है कि होर्मुज संकट और चीन की निर्यात पाबंदियाँ भारत के लिए भी उतनी ही खतरनाक हैं — नई दिल्ली इस बहस में आरोपी नहीं, बल्कि एक समान रूप से जोखिम में खड़ा खिलाड़ी है।
RashtraPress
14 मई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

अमेरिकी सीनेट की सुनवाई में भारत का जिक्र क्यों हुआ?
भारत को वैश्विक उर्वरक कीमतें प्रभावित करने वाले सबसे बड़े खरीदारों में गिनाया गया क्योंकि वह चीन के बाद दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा उर्वरक उपभोक्ता है। भारत की सब्सिडी नीति और बड़े पैमाने पर थोक खरीद — जैसे हालिया 2.5 मिलियन मीट्रिक टन यूरिया टेंडर — वैश्विक माँग और आपूर्ति के संतुलन को प्रभावित करती है।
भारत ने हाल ही में कितना यूरिया खरीदने का टेंडर जारी किया?
द फर्टिलाइजर इंस्टीट्यूट के अध्यक्ष कोरी रोसेनबुश के अनुसार, भारत ने लगभग 1,000 डॉलर प्रति मीट्रिक टन की दर से 2.5 मिलियन मीट्रिक टन यूरिया का टेंडर जारी किया है। यह जानकारी 14 मई 2025 की अमेरिकी सीनेट सुनवाई में सामने आई।
होर्मुज स्ट्रेट का उर्वरक आपूर्ति से क्या संबंध है?
होर्मुज स्ट्रेट वैश्विक उर्वरक व्यापार के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है — दुनिया भर में कारोबार होने वाले यूरिया का लगभग 34% और वैश्विक सल्फर निर्यात का आधा हिस्सा इसी मार्ग से गुजरता है। किसी भी रुकावट से वैश्विक उर्वरक आपूर्ति और कीमतों पर गंभीर असर पड़ सकता है।
अमेरिकी किसानों पर उर्वरक की बढ़ती कीमतों का क्या असर पड़ा है?
फरवरी 2025 से अब तक यूरिया में 55%, एनहाइड्रस में 33% और लिक्विड नाइट्रोजन में 25% की मूल्यवृद्धि दर्ज की गई है। दक्षिण डकोटा के किसान ट्रेंट कुबिक ने बताया कि 2025 में उन्होंने आर्थिक कारणों से अपने खेत में फॉस्फेट का उपयोग बंद कर दिया।
भारत की उर्वरक सब्सिडी नीति का वैश्विक असर क्या है?
भारत सरकार वैश्विक बाजार से उर्वरक खरीदती है और फिर घरेलू किसानों के लिए कीमतें कम रखने हेतु उस पर भारी सब्सिडी देती है। आलोचकों का कहना है कि यह नीति वैश्विक माँग बढ़ाकर अंतरराष्ट्रीय कीमतों को ऊपर धकेलती है, जिससे अन्य देशों के किसान प्रभावित होते हैं।
राष्ट्र प्रेस
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