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गुजरात: मोतियाबिंद सर्जरी के लिए 18 फैकोइमल्सीफिकेशन मशीनें मंजूर, ₹8.85 करोड़ से होगा उन्नयन

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गुजरात: मोतियाबिंद सर्जरी के लिए 18 फैकोइमल्सीफिकेशन मशीनें मंजूर, ₹8.85 करोड़ से होगा उन्नयन

सारांश

गुजरात सरकार ने सरकारी अस्पतालों में मोतियाबिंद की मुफ्त, उन्नत सर्जरी सुनिश्चित करने के लिए ₹8.85 करोड़ की 18 फैकोइमल्सीफिकेशन मशीनों को मंजूरी दी है। अहमदाबाद से हिम्मतनगर तक 9 शहरों के संस्थानों को इससे लाभ मिलेगा।

मुख्य बातें

गुजरात के स्वास्थ्य मंत्री प्रफुल्ल पानशेरिया ने 18 फैकोइमल्सीफिकेशन मशीनों को मंजूरी दी।
मशीनों की कुल लागत ₹8.85 करोड़ से अधिक है।
सर्वाधिक 7 मशीनें अहमदाबाद के एम एंड जे इंस्टीट्यूट ऑफ ऑप्थल्मोलॉजी को मिलेंगी।
मशीनें अहमदाबाद, सूरत, भावनगर, वडोदरा, जामनगर, मोरबी, गांधीनगर, वडनगर और हिम्मतनगर के सरकारी संस्थानों में वितरित होंगी।
सीएएसई और एलिप्टिकल मूवमेंट जैसी तकनीकों से सर्जरी अधिक सटीक होगी और मरीज़ों की रिकवरी तेज़ होगी।
मरीजों को आँखों का आधुनिक इलाज निःशुल्क मिलेगा।

गुजरात के स्वास्थ्य मंत्री प्रफुल्ल पानशेरिया ने राज्य के सरकारी अस्पतालों और मेडिकल कॉलेजों में मोतियाबिंद सर्जरी की सुविधाओं को आधुनिक बनाने के लिए 18 अत्याधुनिक फैकोइमल्सीफिकेशन मशीनों को मंजूरी दी है। ₹8.85 करोड़ से अधिक की लागत वाली ये मशीनें राज्य के 9 शहरों के सरकारी स्वास्थ्य संस्थानों में वितरित की जाएंगी, जिससे मरीजों को आँखों का उन्नत इलाज निःशुल्क मिल सकेगा।

किन अस्पतालों को मिलेंगी मशीनें

मंजूरी के अनुसार, सर्वाधिक सात मशीनें अहमदाबाद के प्रतिष्ठित एम एंड जे इंस्टीट्यूट ऑफ ऑप्थल्मोलॉजी को आवंटित की जाएंगी। भावनगर के सरकारी मेडिकल कॉलेज और मोरबी के जीएमआरएस अस्पताल को दो-दो मशीनें प्राप्त होंगी।

इसके अतिरिक्त, सूरत के न्यू सिविल अस्पताल और ओल्ड सिविल अस्पताल, जामनगर के जीजी जनरल अस्पताल, वडोदरा के ईएसआईसी जनरल अस्पताल और गांधीनगर, वडनगर तथा हिम्मतनगर के जीएमईआरएस संस्थानों में से प्रत्येक को एक-एक मशीन दी जाएगी। इस प्रकार यह लाभ राज्य के विभिन्न क्षेत्रों तक फैलाया गया है।

तकनीकी विशेषताएँ और सर्जिकल लाभ

फैकोइमल्सीफिकेशन तकनीक सर्जन को अल्ट्रासाउंड ऊर्जा, वैक्यूम और तरल के बहाव (फ्लूइड फ्लो) को एक साथ नियंत्रित करने की सुविधा देती है। इससे मोतियाबिंद के टुकड़ों को सटीकता से तोड़कर बाहर निकाला जा सकता है और सर्जरी के बाद मरीज की रिकवरी तेज़ होती है।

इन मशीनों के हैंडपीस में 'एलिप्टिकल मूवमेंट' तकनीक (अंडाकार गति) और फ्लूइड व वैक्यूम नियंत्रण के लिए 'पेरिस्टाल्टिक पंप' सिस्टम शामिल है। एक फुट-पेडल कंट्रोल सिस्टम सर्जन को प्रत्येक ऑपरेशन की ज़रूरत के अनुसार सेटिंग्स को तत्काल समायोजित करने की सुविधा देता है।

इसके अलावा, मशीनों में सीएएसई (चैंबर स्टेबिलाइजेशन एनवायरनमेंट) तकनीक भी है, जो सर्जरी के दौरान आँख के भीतर दबाव को स्थिर रखती है। यह तकनीक 'पोस्ट-ऑक्लूजन सर्ज' — यानी अचानक दबाव घटने के खतरे — को कम करती है, जो परंपरागत सर्जरी में एक जोखिम-कारक रहा है।

मरीजों पर असर

हैंडपीस की विशेष डिज़ाइन सर्जरी के दौरान छोटे चीरे के स्थान पर अत्यधिक गर्मी उत्पन्न होने से रोकती है, जिससे कॉर्नियल सूजन (कॉर्नियल एडिमा) और पश्चात् की जटिलताओं का जोखिम काफी कम हो जाता है। राज्य सरकार के अनुसार, इन उपकरणों की उपलब्धता से सरकारी स्वास्थ्य केंद्रों में आने वाले मरीजों को निजी अस्पतालों जैसी उन्नत सुविधाएँ बिना किसी शुल्क के मिलेंगी।

गौरतलब है कि भारत में मोतियाबिंद अंधेपन का प्रमुख कारण है और सरकारी अस्पतालों में आधुनिक उपकरणों की कमी के चलते बड़ी संख्या में मरीज़ उचित समय पर इलाज से वंचित रह जाते हैं। यह निर्णय उसी अंतराल को पाटने की कोशिश है।

सरकार की प्राथमिकता

स्वास्थ्य मंत्री प्रफुल्ल पानशेरिया की अध्यक्षता में हुई बैठक में इन मशीनों को औपचारिक मंजूरी दी गई। राज्य सरकार का कहना है कि यह कदम सरकारी मेडिकल कॉलेजों और अस्पतालों में नेत्र देखभाल की सुविधाओं को व्यवस्थित रूप से सुदृढ़ करने की दीर्घकालिक नीति का हिस्सा है। आने वाले समय में अन्य विशेषताओं को भी इसी क्रम में उन्नत किए जाने की संभावना है।

संपादकीय दृष्टिकोण

किंतु असली कसौटी यह है कि ये मशीनें संस्थानों में कितनी जल्दी परिचालन में आती हैं और इनके रखरखाव का दीर्घकालिक प्रबंध कैसे होगा। भारत में मोतियाबिंद अंधेपन के सबसे बड़े कारणों में से एक है, फिर भी सरकारी केंद्रों में उपकरणों की कमी अक्सर उचित इलाज में देरी कराती है। केवल नौ बड़े शहरों पर केंद्रित यह वितरण ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों की पहुँच का सवाल अनुत्तरित छोड़ता है। उपकरण खरीद से आगे बढ़कर प्रशिक्षित जनशक्ति और नियमित मानक-जाँच तंत्र को मज़बूत किए बिना यह कदम अपनी पूरी क्षमता तक नहीं पहुँच पाएगा।
RashtraPress
15 अक्टूबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

गुजरात में मोतियाबिंद सर्जरी के लिए मंजूर की गई फैकोइमल्सीफिकेशन मशीनें क्या हैं?
फैकोइमल्सीफिकेशन मशीनें अत्याधुनिक शल्य-चिकित्सा उपकरण हैं जो अल्ट्रासाउंड ऊर्जा से मोतियाबिंद को तोड़कर सुरक्षित रूप से बाहर निकालती हैं। गुजरात सरकार ने ऐसी 18 मशीनों को ₹8.85 करोड़ की लागत से राज्य के सरकारी अस्पतालों और मेडिकल कॉलेजों के लिए मंजूरी दी है।
गुजरात के किन अस्पतालों को ये मशीनें मिलेंगी?
अहमदाबाद के एम एंड जे इंस्टीट्यूट ऑफ ऑप्थल्मोलॉजी को 7 मशीनें, भावनगर के सरकारी मेडिकल कॉलेज और मोरबी के जीएमआरएस अस्पताल को दो-दो मशीनें मिलेंगी। सूरत, जामनगर, वडोदरा, गांधीनगर, वडनगर और हिम्मतनगर के सरकारी संस्थानों को एक-एक मशीन आवंटित की जाएगी।
इन मशीनों से मरीजों को क्या फायदा होगा?
इन मशीनों की सीएएसई तकनीक और एलिप्टिकल मूवमेंट हैंडपीस से सर्जरी अधिक सटीक होगी, जटिलताओं का खतरा कम होगा और मरीज़ जल्दी ठीक होंगे। राज्य सरकार के अनुसार, यह सुविधा मरीजों को निःशुल्क मिलेगी।
इन मशीनों को किसने और कब मंजूरी दी?
गुजरात के स्वास्थ्य मंत्री प्रफुल्ल पानशेरिया की अध्यक्षता में हुई बैठक में 15 अक्टूबर 2026 को इन 18 मशीनों को औपचारिक मंजूरी दी गई।
फैकोइमल्सीफिकेशन तकनीक परंपरागत मोतियाबिंद सर्जरी से कैसे बेहतर है?
पारंपरिक सर्जरी की तुलना में फैकोइमल्सीफिकेशन में छोटा चीरा लगाया जाता है और अल्ट्रासाउंड ऊर्जा से मोतियाबिंद को तोड़कर सक्शन से बाहर निकाला जाता है। इससे कॉर्निया में सूजन और अन्य जटिलताओं का खतरा कम होता है तथा रिकवरी तेज़ होती है।
राष्ट्र प्रेस
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