5 अक्टूबर 2026
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चुनाव आयोग में 'आंतरिक विवाद': पृथ्वीराज चव्हाण की माँग — CEC ज्ञानेश कुमार पर दो आयुक्तों के 14 पत्र सार्वजनिक हों

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चुनाव आयोग में 'आंतरिक विवाद': पृथ्वीराज चव्हाण की माँग — CEC ज्ञानेश कुमार पर दो आयुक्तों के 14 पत्र सार्वजनिक हों

सारांश

कांग्रेस नेता पृथ्वीराज चव्हाण ने CEC ज्ञानेश कुमार पर आरोपों के बीच चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर ही सवाल दाग दिए — दो आयुक्तों के 14 पत्र सार्वजनिक करने की माँग के साथ। उनकी दलील है: बहुमत के विरुद्ध लिया गया कोई भी फैसला कानूनन अमान्य है।

मुख्य बातें

कांग्रेस नेता पृथ्वीराज चव्हाण ने 4 अक्टूबर 2026 को CEC ज्ञानेश कुमार के खिलाफ लगे आरोपों पर मोर्चा खोला।
उन्होंने माँग की कि दो चुनाव आयुक्तों द्वारा CEC के फैसलों पर ऐतराज जताते हुए लिखे 14 पत्र सार्वजनिक किए जाएँ।
चव्हाण की दलील: कानून के अनुसार आयोग के फैसले बहुमत से होने चाहिए; बहुमत के विरुद्ध कोई भी निर्णय गैरकानूनी है।
राहुल गांधी भी CEC के मुद्दे को पहले उठा चुके हैं; यह विपक्ष के व्यापक अभियान का हिस्सा है।
चुनाव आयोग की ओर से अभी तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है।

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण ने 4 अक्टूबर 2026 को नई दिल्ली में मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार पर विपक्ष के हमलों के बीच चुनाव आयोग की आंतरिक कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए। उन्होंने माँग की कि दो चुनाव आयुक्तों द्वारा CEC के फैसलों पर ऐतराज जताते हुए लिखे गए 14 पत्रों को तत्काल सार्वजनिक किया जाए।

चव्हाण ने क्या कहा

चव्हाण ने कहा, 'अभी हमारे सामने सबसे ज़रूरी मुद्दा चीफ इलेक्शन कमिश्नर ज्ञानेश कुमार के कार्यकाल में हुई कथित गड़बड़ियों और गैर-कानूनी कामों को लेकर चल रहा आंदोलन है। राहुल गांधी ने भी यह मुद्दा उठाया है।' उन्होंने जोड़ा कि सबसे पहले चुनाव आयोग से जुड़े कानूनी प्रावधानों पर गौर किया जाना चाहिए।

चव्हाण के अनुसार, कानून के तहत तीन सदस्यीय चुनाव आयोग का गठन किया गया था और सर्वोच्च न्यायालय के आदेश में प्रत्येक सदस्य की शक्तियाँ व अधिकार स्पष्ट रूप से परिभाषित हैं। उन्होंने कहा कि आयोग के सभी निर्णय या तो सर्वसम्मति से या बहुमत के आधार पर लिए जाने चाहिए।

14 पत्रों का मुद्दा और कानूनी दलील

कांग्रेस नेता ने तर्क दिया कि यदि दो चुनाव आयुक्तों ने CEC के निर्णयों पर आपत्ति जताते हुए 14 बार लिखित पत्र भेजे हैं, तो यह स्पष्ट संकेत है कि आयोग के भीतर मतभेद मौजूद हैं। उनके अनुसार, 'इन पत्रों को सार्वजनिक किया जाना चाहिए, ताकि देश जान सके कि आयोग के अंदर क्या चल रहा है।'

उन्होंने आगे कहा कि यदि दो आयुक्त किसी विशेष कदम के पक्ष में हों तो वे स्वतः ही बहुमत बनाते हैं। ऐसे में अगर उनके मत के विपरीत कोई निर्णय लिया गया, तो वह कानूनी दृष्टि से 'गैरकानूनी' ठहरता है। चव्हाण ने स्पष्ट किया कि इस मसले का चुनाव जीतने या हारने से कोई संबंध नहीं है — यह सीधे तौर पर संस्थागत प्रक्रिया और कानून की पालना का सवाल है।

विपक्ष का व्यापक अभियान

गौरतलब है कि यह ऐसे समय में आया है जब भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (INC) सहित कई विपक्षी दल CEC ज्ञानेश कुमार के खिलाफ मोर्चा खोले हुए हैं। राहुल गांधी ने इस मुद्दे को पहले ही राष्ट्रीय बहस में केंद्र में ला दिया है। चव्हाण का यह बयान विपक्ष की उस व्यापक रणनीति का हिस्सा प्रतीत होता है जो चुनाव आयोग की स्वायत्तता और पारदर्शिता पर सवाल उठाने की है।

यह भी उल्लेखनीय है कि सर्वोच्च न्यायालय पहले ही चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया को लेकर ऐतिहासिक फैसला सुना चुका है, जिसमें आयोग के सदस्यों की स्वतंत्रता को रेखांकित किया गया था।

संस्थागत महत्व और आगे की राह

चव्हाण की माँग यदि मानी जाती है और 14 पत्र सार्वजनिक होते हैं, तो यह चुनाव आयोग की आंतरिक कार्यशैली पर अभूतपूर्व पारदर्शिता का द्वार खोल सकता है। फिलहाल चुनाव आयोग की ओर से इन आरोपों पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। राजनीतिक हलचल के बीच यह देखना होगा कि सत्ता पक्ष इन माँगों पर क्या रुख अपनाता है और क्या न्यायपालिका इस विषय पर कोई हस्तक्षेप करती है।

संपादकीय दृष्टिकोण

तो यह आंतरिक असहमति का ऐसा दस्तावेज़ी रिकॉर्ड होगा जिसे नज़रअंदाज़ करना संभव नहीं। असली सवाल यह है कि क्या ये पत्र सार्वजनिक होंगे, या संस्थागत गोपनीयता की आड़ में दबा दिए जाएंगे — क्योंकि लोकतंत्र की विश्वसनीयता उन संस्थाओं की पारदर्शिता पर टिकी है जो चुनाव कराती हैं।
RashtraPress
5 अक्टूबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

पृथ्वीराज चव्हाण ने CEC ज्ञानेश कुमार के बारे में क्या माँग की है?
चव्हाण ने माँग की है कि दो चुनाव आयुक्तों द्वारा CEC के फैसलों पर आपत्ति जताते हुए लिखे गए 14 पत्रों को सार्वजनिक किया जाए। उनका कहना है कि इन पत्रों से स्पष्ट होता है कि आयोग के भीतर गंभीर मतभेद हैं।
चुनाव आयोग में बहुमत से फैसले लेने का क्या नियम है?
कानून के अनुसार चुनाव आयोग के सभी फैसले या तो सर्वसम्मति से या बहुमत के आधार पर लिए जाने चाहिए। चव्हाण की दलील है कि यदि दो आयुक्त किसी निर्णय के विरुद्ध हैं, तो वे स्वतः बहुमत बनाते हैं और उनके मत के खिलाफ लिया गया निर्णय गैरकानूनी है।
राहुल गांधी ने इस मामले में क्या भूमिका निभाई है?
कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने CEC ज्ञानेश कुमार पर आरोपों का मुद्दा पहले ही राष्ट्रीय स्तर पर उठाया है। चव्हाण ने अपने बयान में इसका उल्लेख करते हुए कहा कि यह विपक्ष की व्यापक चिंता का विषय है।
चुनाव आयोग ने इन आरोपों पर क्या कहा है?
अब तक चुनाव आयोग की ओर से इन आरोपों और पत्रों की माँग पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। मामला सार्वजनिक बहस में बना हुआ है।
यह मुद्दा संस्थागत रूप से क्यों महत्वपूर्ण है?
चुनाव आयोग भारत की चुनावी प्रक्रिया की आधारशिला है और उसकी स्वायत्तता व पारदर्शिता लोकतंत्र के लिए अनिवार्य है। यदि आयोग के भीतर ही बहुमत-विरोधी निर्णय लिए जाने के आरोप साबित होते हैं, तो यह संवैधानिक संस्था की विश्वसनीयता पर सीधा सवाल बनता है।
राष्ट्र प्रेस
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