चुनाव आयोग में 'आंतरिक विवाद': पृथ्वीराज चव्हाण की माँग — CEC ज्ञानेश कुमार पर दो आयुक्तों के 14 पत्र सार्वजनिक हों
सारांश
मुख्य बातें
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण ने 4 अक्टूबर 2026 को नई दिल्ली में मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार पर विपक्ष के हमलों के बीच चुनाव आयोग की आंतरिक कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए। उन्होंने माँग की कि दो चुनाव आयुक्तों द्वारा CEC के फैसलों पर ऐतराज जताते हुए लिखे गए 14 पत्रों को तत्काल सार्वजनिक किया जाए।
चव्हाण ने क्या कहा
चव्हाण ने कहा, 'अभी हमारे सामने सबसे ज़रूरी मुद्दा चीफ इलेक्शन कमिश्नर ज्ञानेश कुमार के कार्यकाल में हुई कथित गड़बड़ियों और गैर-कानूनी कामों को लेकर चल रहा आंदोलन है। राहुल गांधी ने भी यह मुद्दा उठाया है।' उन्होंने जोड़ा कि सबसे पहले चुनाव आयोग से जुड़े कानूनी प्रावधानों पर गौर किया जाना चाहिए।
चव्हाण के अनुसार, कानून के तहत तीन सदस्यीय चुनाव आयोग का गठन किया गया था और सर्वोच्च न्यायालय के आदेश में प्रत्येक सदस्य की शक्तियाँ व अधिकार स्पष्ट रूप से परिभाषित हैं। उन्होंने कहा कि आयोग के सभी निर्णय या तो सर्वसम्मति से या बहुमत के आधार पर लिए जाने चाहिए।
14 पत्रों का मुद्दा और कानूनी दलील
कांग्रेस नेता ने तर्क दिया कि यदि दो चुनाव आयुक्तों ने CEC के निर्णयों पर आपत्ति जताते हुए 14 बार लिखित पत्र भेजे हैं, तो यह स्पष्ट संकेत है कि आयोग के भीतर मतभेद मौजूद हैं। उनके अनुसार, 'इन पत्रों को सार्वजनिक किया जाना चाहिए, ताकि देश जान सके कि आयोग के अंदर क्या चल रहा है।'
उन्होंने आगे कहा कि यदि दो आयुक्त किसी विशेष कदम के पक्ष में हों तो वे स्वतः ही बहुमत बनाते हैं। ऐसे में अगर उनके मत के विपरीत कोई निर्णय लिया गया, तो वह कानूनी दृष्टि से 'गैरकानूनी' ठहरता है। चव्हाण ने स्पष्ट किया कि इस मसले का चुनाव जीतने या हारने से कोई संबंध नहीं है — यह सीधे तौर पर संस्थागत प्रक्रिया और कानून की पालना का सवाल है।
विपक्ष का व्यापक अभियान
गौरतलब है कि यह ऐसे समय में आया है जब भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (INC) सहित कई विपक्षी दल CEC ज्ञानेश कुमार के खिलाफ मोर्चा खोले हुए हैं। राहुल गांधी ने इस मुद्दे को पहले ही राष्ट्रीय बहस में केंद्र में ला दिया है। चव्हाण का यह बयान विपक्ष की उस व्यापक रणनीति का हिस्सा प्रतीत होता है जो चुनाव आयोग की स्वायत्तता और पारदर्शिता पर सवाल उठाने की है।
यह भी उल्लेखनीय है कि सर्वोच्च न्यायालय पहले ही चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया को लेकर ऐतिहासिक फैसला सुना चुका है, जिसमें आयोग के सदस्यों की स्वतंत्रता को रेखांकित किया गया था।
संस्थागत महत्व और आगे की राह
चव्हाण की माँग यदि मानी जाती है और 14 पत्र सार्वजनिक होते हैं, तो यह चुनाव आयोग की आंतरिक कार्यशैली पर अभूतपूर्व पारदर्शिता का द्वार खोल सकता है। फिलहाल चुनाव आयोग की ओर से इन आरोपों पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। राजनीतिक हलचल के बीच यह देखना होगा कि सत्ता पक्ष इन माँगों पर क्या रुख अपनाता है और क्या न्यायपालिका इस विषय पर कोई हस्तक्षेप करती है।