23 सितंबर 2026
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चुनाव आयुक्त विवाद: पृथ्वीराज चव्हाण बोले — सीईसी बॉस नहीं, आयुक्त राष्ट्रपति के पास जाएं

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चुनाव आयुक्त विवाद: पृथ्वीराज चव्हाण बोले — सीईसी बॉस नहीं, आयुक्त राष्ट्रपति के पास जाएं

सारांश

पृथ्वीराज चव्हाण का यह बयान महज़ आलोचना नहीं — यह चुनाव आयोग की आंतरिक कार्यप्रणाली पर एक संवैधानिक चुनौती है। दो आयुक्तों की कथित शिकायत और एसआईआर विवाद की पृष्ठभूमि में उनकी सुप्रीम कोर्ट से स्वतः संज्ञान की माँग, लोकतंत्र के एक बुनियादी स्तंभ की साख पर उठते सवालों को उजागर करती है।

मुख्य बातें

कांग्रेस नेता पृथ्वीराज चव्हाण ने 23 सितंबर 2026 को चुनाव आयोग के कामकाज पर गंभीर सवाल उठाए।
चव्हाण के अनुसार तीनों चुनाव आयुक्त संवैधानिक रूप से बराबर हैं और सीईसी बाकी दो का बॉस नहीं है।
कथित तौर पर दोनों आयुक्तों ने कैबिनेट सचिव तक शिकायत की कि एसआईआर प्रक्रिया में उन्हें दरकिनार किया गया।
चव्हाण ने कहा कि आयुक्तों की अपील केवल सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश या राष्ट्रपति के पास जानी चाहिए, नौकरशाही के पास नहीं।
उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय से अनुच्छेद 32 और अनुच्छेद 142 के तहत स्वतः संज्ञान लेने की माँग की।

कांग्रेस नेता और महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण ने 23 सितंबर 2026 को चुनाव आयोग के आंतरिक कामकाज को लेकर सामने आई रिपोर्टों पर तीखी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि तीनों चुनाव आयुक्तों की संवैधानिक स्थिति पूरी तरह बराबर है और मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) अन्य दो आयुक्तों के 'बॉस' नहीं हैं। चव्हाण ने सर्वोच्च न्यायालय से इस मामले में स्वतः संज्ञान लेने की माँग की।

चव्हाण का संवैधानिक तर्क

चव्हाण ने अपने बयान में स्पष्ट किया, 'कानून बिल्कुल साफ है कि तीनों चुनाव आयुक्त बराबर हैं। उनके पद में कोई छोटा-बड़ा नहीं है। मुख्य चुनाव आयुक्त बाकी दो आयुक्तों का बॉस नहीं होता। सभी फैसले मिलकर लिए जाने चाहिए, और अगर आम सहमति नहीं बन पाती है, तो आयोग को बहुमत के नियम के आधार पर काम करना होता है।'

उन्होंने आगे कहा, 'अगर तीन में से दो लोग कुछ अलग कह रहे हैं और फिर भी फैसले स्वतंत्र रूप से लिए जा रहे हैं, तो यह एक गंभीर मामला है।' यह बयान ऐसे समय आया है जब विशेष सारांश पुनरीक्षण (एसआईआर) प्रक्रिया से जुड़ा एक मामला सर्वोच्च न्यायालय में पहले से विचाराधीन है।

कैबिनेट सचिव तक शिकायत का आरोप

चव्हाण ने दावा किया कि उन्हें जानकारी मिली है कि दोनों आयुक्तों ने कैबिनेट सचिव तक शिकायत पहुँचाई थी कि आयोग का कामकाज सही ढंग से नहीं चल रहा और एसआईआर प्रक्रिया में उनसे बिना पूछे निर्णय लिए जा रहे थे।

उन्होंने इस पर आपत्ति जताते हुए कहा, 'आज जो खबर छपी है और चुनाव आयोग के कामकाज को लेकर जो बातें सामने आई हैं, वे एक बहुत गंभीर मुद्दा उठाती हैं। यह मामला एसआईआर से भी आगे की बात है। आपने हमारे संविधान के मूल ढाँचे और निष्पक्ष चुनाव कराने के हमारे मौलिक अधिकार पर हमला किया है।'

आयुक्तों को अपील का रास्ता

चव्हाण ने यह भी स्पष्ट किया कि संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति की शिकायत का रास्ता नौकरशाही से नहीं, बल्कि उच्चतर संवैधानिक संस्थाओं से होकर जाता है। उनके शब्दों में, 'वह केवल दो जगह अपील कर सकते हैं — सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के पास, या राष्ट्रपति के पास। लेकिन उन्होंने ब्यूरोक्रेटिक हेड के पास जाने की कोशिश की। वह सरकारी नौकर नहीं हैं, वह एक संवैधानिक पद पर बैठे संवैधानिक व्यक्ति हैं।'

गौरतलब है कि चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति और उनके अधिकारों को लेकर सर्वोच्च न्यायालय पहले भी कई ऐतिहासिक फैसले दे चुका है, जिनमें 2023 के अनूप बरनवाल फैसले में नियुक्ति प्रक्रिया में सुधार की बात कही गई थी।

सर्वोच्च न्यायालय से स्वतः संज्ञान की माँग

चव्हाण ने माँग की कि सर्वोच्च न्यायालय इस मामले में अनुच्छेद 32 और अनुच्छेद 142 के तहत अखबारी रिपोर्ट के आधार पर स्वतः संज्ञान ले। उन्होंने कहा, 'सभी आयुक्तों को कोर्ट के सामने बुलाया जाना चाहिए। क्या संवैधानिक व्यवस्था को तोड़ा-मरोड़ा गया है? सुप्रीम कोर्ट को संज्ञान लेकर संविधान को बचाना चाहिए।'

यह माँग ऐसे समय में आई है जब विपक्षी दल चुनाव आयोग की स्वायत्तता और पारदर्शिता पर लगातार सवाल उठाते रहे हैं। आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि सर्वोच्च न्यायालय इस मसले पर स्वप्रेरणा से दखल देता है या नहीं, और चुनाव आयोग इन आरोपों पर कोई आधिकारिक स्पष्टीकरण जारी करता है।

संपादकीय दृष्टिकोण

तो यह संवैधानिक पद की गरिमा और स्वायत्तता दोनों पर प्रश्नचिह्न लगाता है। 2023 के अनूप बरनवाल फैसले में सुप्रीम कोर्ट पहले ही नियुक्ति प्रक्रिया में सुधार की बात कह चुका है — अब कार्यप्रणाली विवाद उसी अधूरे सुधार की अगली कड़ी बन सकता है। मुख्यधारा की कवरेज इसे राजनीतिक बयानबाज़ी तक सीमित कर रही है, जबकि असली सवाल यह है कि क्या आयोग का निर्णय-तंत्र संवैधानिक मानकों पर खरा उतर रहा है।
RashtraPress
23 सितंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

पृथ्वीराज चव्हाण ने चुनाव आयोग पर क्या आरोप लगाए हैं?
चव्हाण ने आरोप लगाया है कि चुनाव आयोग में एसआईआर जैसी प्रक्रियाओं में दो आयुक्तों को दरकिनार कर मुख्य चुनाव आयुक्त अकेले निर्णय ले रहे हैं, जो संवैधानिक रूप से अनुचित है। उनके अनुसार तीनों आयुक्त बराबर हैं और सभी फैसले सर्वसम्मति या बहुमत से होने चाहिए।
क्या मुख्य चुनाव आयुक्त के पास अन्य आयुक्तों से ज़्यादा अधिकार होते हैं?
नहीं। संविधान के अनुसार तीनों चुनाव आयुक्तों की संवैधानिक स्थिति बराबर है और मुख्य चुनाव आयुक्त अन्य दो का वरिष्ठ अधिकारी नहीं होता। चव्हाण के अनुसार सभी निर्णय आम सहमति से, या न हो तो बहुमत से लिए जाने चाहिए।
चुनाव आयुक्त शिकायत के लिए कहाँ जा सकते हैं?
चव्हाण के अनुसार संवैधानिक पद पर बैठे आयुक्तों की अपील केवल सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश या राष्ट्रपति के पास जानी चाहिए। कैबिनेट सचिव जैसे नौकरशाही प्रमुख के पास जाना संवैधानिक पद की गरिमा के अनुकूल नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट से स्वतः संज्ञान की माँग क्यों की जा रही है?
चव्हाण का कहना है कि चुनाव आयोग एक संवैधानिक संस्था है और उसके कामकाज में संवैधानिक उल्लंघन की आशंका होने पर सर्वोच्च न्यायालय अनुच्छेद 32 और अनुच्छेद 142 के तहत स्वप्रेरणा से दखल दे सकता है। उनकी माँग है कि सभी आयुक्तों को अदालत के सामने बुलाकर स्थिति स्पष्ट कराई जाए।
एसआईआर प्रक्रिया क्या है और इसका इस विवाद से क्या संबंध है?
एसआईआर यानी विशेष सारांश पुनरीक्षण, मतदाता सूची को अद्यतन करने की एक प्रक्रिया है जिसका मामला पहले से सर्वोच्च न्यायालय में विचाराधीन है। चव्हाण का आरोप है कि इसी प्रक्रिया में दो आयुक्तों को दरकिनार कर निर्णय लिए गए, जिसकी शिकायत कथित तौर पर कैबिनेट सचिव तक पहुँची।
राष्ट्र प्रेस
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