चुनाव आयुक्त विवाद: पृथ्वीराज चव्हाण बोले — सीईसी बॉस नहीं, आयुक्त राष्ट्रपति के पास जाएं
सारांश
मुख्य बातें
कांग्रेस नेता और महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण ने 23 सितंबर 2026 को चुनाव आयोग के आंतरिक कामकाज को लेकर सामने आई रिपोर्टों पर तीखी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि तीनों चुनाव आयुक्तों की संवैधानिक स्थिति पूरी तरह बराबर है और मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) अन्य दो आयुक्तों के 'बॉस' नहीं हैं। चव्हाण ने सर्वोच्च न्यायालय से इस मामले में स्वतः संज्ञान लेने की माँग की।
चव्हाण का संवैधानिक तर्क
चव्हाण ने अपने बयान में स्पष्ट किया, 'कानून बिल्कुल साफ है कि तीनों चुनाव आयुक्त बराबर हैं। उनके पद में कोई छोटा-बड़ा नहीं है। मुख्य चुनाव आयुक्त बाकी दो आयुक्तों का बॉस नहीं होता। सभी फैसले मिलकर लिए जाने चाहिए, और अगर आम सहमति नहीं बन पाती है, तो आयोग को बहुमत के नियम के आधार पर काम करना होता है।'
उन्होंने आगे कहा, 'अगर तीन में से दो लोग कुछ अलग कह रहे हैं और फिर भी फैसले स्वतंत्र रूप से लिए जा रहे हैं, तो यह एक गंभीर मामला है।' यह बयान ऐसे समय आया है जब विशेष सारांश पुनरीक्षण (एसआईआर) प्रक्रिया से जुड़ा एक मामला सर्वोच्च न्यायालय में पहले से विचाराधीन है।
कैबिनेट सचिव तक शिकायत का आरोप
चव्हाण ने दावा किया कि उन्हें जानकारी मिली है कि दोनों आयुक्तों ने कैबिनेट सचिव तक शिकायत पहुँचाई थी कि आयोग का कामकाज सही ढंग से नहीं चल रहा और एसआईआर प्रक्रिया में उनसे बिना पूछे निर्णय लिए जा रहे थे।
उन्होंने इस पर आपत्ति जताते हुए कहा, 'आज जो खबर छपी है और चुनाव आयोग के कामकाज को लेकर जो बातें सामने आई हैं, वे एक बहुत गंभीर मुद्दा उठाती हैं। यह मामला एसआईआर से भी आगे की बात है। आपने हमारे संविधान के मूल ढाँचे और निष्पक्ष चुनाव कराने के हमारे मौलिक अधिकार पर हमला किया है।'
आयुक्तों को अपील का रास्ता
चव्हाण ने यह भी स्पष्ट किया कि संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति की शिकायत का रास्ता नौकरशाही से नहीं, बल्कि उच्चतर संवैधानिक संस्थाओं से होकर जाता है। उनके शब्दों में, 'वह केवल दो जगह अपील कर सकते हैं — सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के पास, या राष्ट्रपति के पास। लेकिन उन्होंने ब्यूरोक्रेटिक हेड के पास जाने की कोशिश की। वह सरकारी नौकर नहीं हैं, वह एक संवैधानिक पद पर बैठे संवैधानिक व्यक्ति हैं।'
गौरतलब है कि चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति और उनके अधिकारों को लेकर सर्वोच्च न्यायालय पहले भी कई ऐतिहासिक फैसले दे चुका है, जिनमें 2023 के अनूप बरनवाल फैसले में नियुक्ति प्रक्रिया में सुधार की बात कही गई थी।
सर्वोच्च न्यायालय से स्वतः संज्ञान की माँग
चव्हाण ने माँग की कि सर्वोच्च न्यायालय इस मामले में अनुच्छेद 32 और अनुच्छेद 142 के तहत अखबारी रिपोर्ट के आधार पर स्वतः संज्ञान ले। उन्होंने कहा, 'सभी आयुक्तों को कोर्ट के सामने बुलाया जाना चाहिए। क्या संवैधानिक व्यवस्था को तोड़ा-मरोड़ा गया है? सुप्रीम कोर्ट को संज्ञान लेकर संविधान को बचाना चाहिए।'
यह माँग ऐसे समय में आई है जब विपक्षी दल चुनाव आयोग की स्वायत्तता और पारदर्शिता पर लगातार सवाल उठाते रहे हैं। आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि सर्वोच्च न्यायालय इस मसले पर स्वप्रेरणा से दखल देता है या नहीं, और चुनाव आयोग इन आरोपों पर कोई आधिकारिक स्पष्टीकरण जारी करता है।