5 अक्टूबर 2026
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मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की शक्तियों पर सुप्रीम कोर्ट में सोमवार को सुनवाई

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मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की शक्तियों पर सुप्रीम कोर्ट में सोमवार को सुनवाई

सारांश

सुप्रीम कोर्ट में सोमवार को वह बड़ा सवाल उठेगा जो भारतीय लोकतंत्र की नींव को छूता है — क्या मुख्य चुनाव आयुक्त पूरे आयोग की संवैधानिक शक्तियाँ अकेले इस्तेमाल कर सकते हैं? दो चुनाव आयुक्तों की 14 दर्ज आपत्तियाँ इस मामले को महज़ एक याचिका नहीं, संस्थागत संकट का दस्तावेज़ बनाती हैं।

मुख्य बातें

सर्वोच्च न्यायालय 6 अक्टूबर 2026 को मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की एकतरफा शक्तियों को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई करेगा।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत , न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी.
मोहना की पीठ मामले की सुनवाई करेगी।
याचिका में संविधान के अनुच्छेद 324 और 2023 अधिनियम की धारा 18 का हवाला देते हुए सामूहिक निर्णय-प्रक्रिया लागू करने की माँग की गई है।
चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने अक्टूबर 2025 से अगस्त 2026 के बीच कम से कम 14 आपत्तियाँ दर्ज कराई थीं।
याचिका में मतदाता सूची डेटाबेस के केंद्रीकरण और बिना मंजूरी के जारी आदेशों पर भी सवाल उठाए गए हैं।
वरिष्ठ अधिवक्ता विकास सिंह ने 29 सितंबर 2026 को यह मामला मुख्य न्यायाधीश के समक्ष उठाया था।

सर्वोच्च न्यायालय सोमवार, 6 अक्टूबर 2026 को उन याचिकाओं पर सुनवाई करेगा, जिनमें यह प्रश्न उठाया गया है कि क्या मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार संवैधानिक रूप से समूचे बहु-सदस्यीय भारत निर्वाचन आयोग को प्रदत्त शक्तियों का एकतरफा प्रयोग कर सकते हैं। यह मामला निर्वाचन आयोग के भीतर सामूहिक निर्णय-प्रक्रिया की संवैधानिक वैधता से जुड़ा है, जिसे लेकर न्यायालय के हस्तक्षेप की माँग की गई है।

पीठ और सुनवाई की पृष्ठभूमि

सर्वोच्च न्यायालय की आधिकारिक वेबसाइट पर प्रकाशित मामले की सूची के अनुसार, भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची एवं न्यायमूर्ति वी. मोहना की तीन-सदस्यीय पीठ इस विषय पर विचार करेगी। इससे पहले 29 सितंबर 2026 को वरिष्ठ अधिवक्ता विकास सिंह ने यह मामला मुख्य न्यायाधीश के समक्ष उठाया था, जिस पर मुख्य न्यायाधीश ने निर्देश दिया था कि इसे अगले सप्ताह सूचीबद्ध किया जाए।

याचिका की मुख्य माँगें

याचिका में दो प्रमुख अनुतोष माँगे गए हैं। पहला, निर्वाचन आयोग के भीतर सामूहिक निर्णय-प्रक्रिया को कड़ाई से लागू करना। दूसरा, 'क्वो वारंटो' (अधिकार-पृच्छा) रिट जारी करना, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि मुख्य चुनाव आयुक्त ने किस अधिकार के तहत आयोग की कथित मंजूरी के बिना निर्णय लिए।

याचिका में तर्क दिया गया है कि संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत चुनावों की देखरेख, निर्देशन और नियंत्रण का अधिकार किसी एकल मुख्य चुनाव आयुक्त को नहीं, बल्कि समग्र 'चुनाव आयोग' संस्था को दिया गया है। इसके समर्थन में मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा शर्तें और कार्यकाल) अधिनियम, 2023 की धारा 18 का उल्लेख किया गया है, जिसमें सामूहिक निर्णय का प्रावधान है और असहमति की स्थिति में बहुमत से निर्णय लेने की व्यवस्था है।

चुनाव आयुक्तों की आपत्तियाँ

याचिका में चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और चुनाव आयुक्त विवेक जोशी के समकालीन लिखित संचार और फाइल नोटिंग का हवाला दिया गया है। दोनों आयुक्तों ने अक्टूबर 2025 से अगस्त 2026 के बीच आयोग के नाम पर उनकी मंजूरी के बिना लिए गए निर्णयों को लेकर कम से कम 14 औपचारिक आपत्तियाँ दर्ज कराई थीं।

इन आपत्तियों में शामिल हैं — बिना स्वीकृति के जारी किए गए संचार और आदेश, बैठकों से पहले एजेंडा और बैठकों के बाद के कार्यवृत्त की अनुपस्थिति, बिना सहमति के की गई विदेश यात्रा, फॉर्म 6 में परिवर्तन, मतदाता सूची डेटाबेस तक पहुँच, तथा पश्चिम बंगाल में न्यायाधिकरणों के समक्ष अपील दायर करने से जुड़े मामले।

डेटा केंद्रीकरण पर चिंता

याचिका में दोनों चुनाव आयुक्तों द्वारा 'मतदाता सूची डेटाबेस के क्रमिक केंद्रीकरण' को लेकर जताई गई चिंताओं का भी उल्लेख है। इसके अतिरिक्त, निर्वाचन आयोग के आईटी प्रतिष्ठान के कार्य-आवंटन में एकपक्षीय बदलावों पर भी सवाल उठाए गए हैं। याचिकाकर्ता ने न्यायालय से यह घोषणा करने का अनुरोध किया है कि अनुच्छेद 324 के तहत निहित शक्तियों का प्रयोग तब तक वैध नहीं माना जा सकता जब तक यह संवैधानिक और वैधानिक ढाँचे के अनुरूप न हो।

आगे क्या होगा

सोमवार की सुनवाई से यह स्पष्ट होगा कि सर्वोच्च न्यायालय इस मामले को नोटिस के लिए स्वीकार करता है अथवा विस्तृत सुनवाई के लिए कोई विशेष पीठ गठित करता है। यह मुकदमा ऐसे समय में आया है जब निर्वाचन आयोग की संरचना और उसके भीतर अधिकार-संतुलन को लेकर संवैधानिक बहस तेज़ हो रही है।

संपादकीय दृष्टिकोण

संरचनात्मक हैं। मतदाता सूची डेटाबेस के केंद्रीकरण का आरोप — यदि सिद्ध हुआ — तो यह चुनाव-प्रक्रिया की पारदर्शिता पर सबसे गंभीर प्रश्न है जो हाल के वर्षों में उठा है। सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय न केवल इस मामले, बल्कि भविष्य में निर्वाचन आयोग के स्वरूप को भी परिभाषित करेगा।
RashtraPress
5 अक्टूबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

सुप्रीम कोर्ट में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ याचिका में क्या माँगा गया है?
याचिका में निर्वाचन आयोग के भीतर सामूहिक निर्णय-प्रक्रिया लागू करने और 'क्वो वारंटो' रिट जारी करने की माँग की गई है। याचिकाकर्ता का तर्क है कि संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत शक्तियाँ मुख्य चुनाव आयुक्त को नहीं, बल्कि पूरे आयोग को दी गई हैं।
दोनों चुनाव आयुक्तों ने कितनी आपत्तियाँ दर्ज की थीं और किन विषयों पर?
चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने अक्टूबर 2025 से अगस्त 2026 के बीच कम से कम 14 आपत्तियाँ दर्ज कराई थीं। ये आपत्तियाँ बिना मंजूरी के जारी आदेशों, बैठकों में एजेंडा और कार्यवृत्त की अनुपस्थिति, विदेश यात्रा, फॉर्म 6 में बदलाव और मतदाता सूची डेटाबेस तक पहुँच से जुड़ी हैं।
यह मामला किस संवैधानिक प्रावधान पर आधारित है?
याचिका मुख्यतः संविधान के अनुच्छेद 324 और मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा शर्तें और कार्यकाल) अधिनियम, 2023 की धारा 18 पर आधारित है। धारा 18 में सामूहिक निर्णय और मतभेद की स्थिति में बहुमत से निर्णय का प्रावधान है।
यह मामला सुप्रीम कोर्ट में कैसे पहुँचा?
वरिष्ठ अधिवक्ता विकास सिंह ने 29 सितंबर 2026 को मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत के समक्ष इस मामले को मेंशन किया था। मुख्य न्यायाधीश के निर्देश पर इसे अगले सप्ताह, यानी 6 अक्टूबर 2026 को, तीन सदस्यीय पीठ के समक्ष सूचीबद्ध किया गया।
सुनवाई के बाद आगे क्या हो सकता है?
सोमवार की सुनवाई में सर्वोच्च न्यायालय यह तय करेगा कि मामले में नोटिस जारी किया जाए अथवा विस्तृत सुनवाई के लिए कोई विशेष व्यवस्था की जाए। न्यायालय का रुख तय करेगा कि मुख्य चुनाव आयुक्त की शक्तियों की संवैधानिक सीमा पर गहन विचार होगा या नहीं।
राष्ट्र प्रेस
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