सुप्रीम कोर्ट अगले हफ्ते सुनेगा याचिका: सीईसी ज्ञानेश कुमार के अकेले फैसले लेने पर उठे सवाल
सारांश
मुख्य बातें
सर्वोच्च न्यायालय ने मंगलवार, 29 सितंबर 2026 को एक नई याचिका पर सुनवाई की सहमति दी, जो मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) ज्ञानेश कुमार द्वारा अकेले निर्णय लेने की कार्यप्रणाली को संवैधानिक रूप से चुनौती देती है। भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत ने निर्देश दिया कि इस मामले को अगले सप्ताह सूचीबद्ध किया जाए।
मामला कैसे पहुँचा सर्वोच्च न्यायालय
वरिष्ठ अधिवक्ता विकास सिंह ने यह मामला मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत के समक्ष रखा। सुनवाई के दौरान सीजेआई ने संक्षेप में कहा, "इसे अगले हफ्ते लिस्ट किया जाए।" इस प्रकार याचिका को औपचारिक रूप से सूचीबद्ध किए जाने का मार्ग प्रशस्त हो गया।
याचिका का केंद्रीय तर्क यह है कि संविधान के अनुच्छेद 324 के अंतर्गत चुनावों के संचालन, निर्देशन और नियंत्रण की शक्ति 'आयोग' में निहित है, न कि किसी एकल मुख्य चुनाव आयुक्त में। याचिकाकर्ता ने तर्क दिया है कि यह शक्ति संवैधानिक रूप से बहुसदस्यीय निकाय को प्रदान की गई है।
अधिनियम 2023 की धारा 18 और सामूहिक निर्णय का प्रश्न
याचिका में मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा शर्तें और कार्यकाल) अधिनियम, 2023 की धारा 18 का भी हवाला दिया गया है। इस धारा में स्पष्ट प्रावधान है कि निर्णय सामूहिक रूप से लिए जाएँगे और जहाँ आम सहमति न हो, वहाँ बहुमत से फैसला होगा।
याचिकाकर्ता ने माँग की है कि न्यायालय यह घोषित करे कि अनुच्छेद 324 के तहत प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग केवल संवैधानिक और विधिक ढाँचे के अनुसार ही किया जाए, सामूहिक निर्णय प्रक्रिया का अनुपालन सुनिश्चित हो, और विवादित फैसलों से जुड़े अभिलेख सुरक्षित रखे जाएँ।
आयुक्तों की 14 दर्ज आपत्तियाँ
याचिका में चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी की लिखित टिप्पणियों और फाइल नोटिंग का विशेष उल्लेख किया गया है। आरोप है कि इन दोनों आयुक्तों ने अक्टूबर 2025 से अगस्त 2026 के बीच कम से कम 14 औपचारिक आपत्तियाँ दर्ज कराई हैं।
इन आपत्तियों में शामिल मुद्दे हैं — बिना आयोग की सहमति के आदेश जारी करना, बैठकों से पहले एजेंडा और बाद में कार्यवाही का विवरण न साझा करना, बिना स्वीकृति के विदेश यात्रा, फॉर्म 6 में बदलाव, मतदाता सूची के डेटाबेस तक पहुँच, और पश्चिम बंगाल में न्यायाधिकरण के समक्ष अपील दायर करने से संबंधित प्रश्न।
दोनों आयुक्तों ने कथित तौर पर मतदाता सूची डेटाबेस के क्रमिक केंद्रीकरण और चुनाव आयोग के सूचना प्रौद्योगिकी विभाग में कार्य विभाजन में परिवर्तनों पर भी चिंता व्यक्त की थी।
चुनाव आयोग का पक्ष
भारत निर्वाचन आयोग ने इन आरोपों को अस्वीकार करते हुए कहा है कि आयुक्तों के बीच मतभेद को संस्थागत 'टूट' नहीं माना जा सकता। आयोग के अनुसार, एक बहुसदस्यीय संवैधानिक निकाय में आंतरिक आपत्तियाँ और लिखित नोट सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया का अंग हैं। आयोग ने यह भी स्पष्ट किया है कि विशेष सारांश पुनरीक्षण (SIR) से जुड़े निर्णय सर्वसम्मति से लिए गए थे।
क्या होगा आगे
सर्वोच्च न्यायालय अगले सप्ताह इस याचिका पर विधिवत सुनवाई करेगा। यह मामला ऐसे समय में महत्त्वपूर्ण हो जाता है जब चुनाव आयोग की स्वायत्तता और पारदर्शिता पर व्यापक सार्वजनिक बहस जारी है। गौरतलब है कि 2023 के अधिनियम के बाद से चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया पर भी न्यायिक दृष्टि बनी हुई है। इस सुनवाई का नतीजा चुनाव आयोग की आंतरिक निर्णय प्रक्रिया के भविष्य को परिभाषित कर सकता है।