चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति में सीजेआई की भूमिका खत्म करने वाले कानून की सुनवाई अब 7 अप्रैल को
सारांश
Key Takeaways
- सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति में चीफ जस्टिस की भूमिका समाप्त करने वाले कानून पर रोक लगाने की याचिका पर सुनवाई टाली।
- इस मामले की अगली सुनवाई 7 अप्रैल को दूसरी बेंच के सामने होगी।
- याचिकाकर्ता का तर्क है कि चीफ जस्टिस की भूमिका की आवश्यकता है।
- सरकार का दावा है कि कानून संवैधानिक है।
- इस मामले पर न्यायपालिका की भूमिका और चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर चर्चा हो रही है।
नई दिल्ली, 20 मार्च (राष्ट्र प्रेस)। सुप्रीम कोर्ट में चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति में चीफ जस्टिस की भूमिका समाप्त करने वाले केंद्र सरकार के कानून पर रोक लगाने की मांग को लेकर दायर याचिका की सुनवाई 7 अप्रैल तक के लिए टल गई है। इस समय चीफ जस्टिस ने स्वयं इस मामले की सुनवाई से अलग होने का निर्णय लिया।
चीफ जस्टिस ने कहा कि चूंकि मामला सीजेआई से जुड़ा हुआ है, इसे दूसरी बेंच के सामने पेश किया जाना बेहतर होगा। उन्होंने स्पष्ट किया कि यदि वे स्वयं इस मामले की सुनवाई करेंगे, तो उन पर पक्षपात का आरोप लगाया जा सकता है।
याचिकाकर्ता की ओर से उपस्थित वकील प्रशांत भूषण ने भी सुझाव दिया कि यह मामला ऐसी बेंच को भेजा जाए, जिसमें कोई भावी चीफ जस्टिस शामिल न हो। इसके बाद चीफ जस्टिस ने निर्देश दिया कि 7 अप्रैल को यह केस दूसरी बेंच के सामने रखा जाएगा।
सुप्रीम कोर्ट ने पहले चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति को पारदर्शी बनाने के लिए आदेश दिया था, जिसके अंतर्गत इन पदों पर नियुक्ति एक समिति द्वारा की जानी थी, जिसमें चीफ जस्टिस, प्रधानमंत्री और विपक्ष के नेता शामिल होते। लेकिन, केंद्र सरकार ने कानून लाकर इस प्रक्रिया में चीफ जस्टिस की भूमिका समाप्त कर दी। इसके विरोध में कई याचिकाएं दायर की गई हैं, जिनमें इस कानून को चुनौती दी गई है।
याचिकाकर्ता का तर्क है कि चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति में पारदर्शिता और निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए चीफ जस्टिस की भूमिका आवश्यक है। उनका कहना है कि बिना चीफ जस्टिस की भागीदारी के यह प्रक्रिया पूरी तरह स्वतंत्र और भरोसेमंद नहीं मानी जा सकती। दूसरी ओर, सरकार का दावा है कि कानून के तहत नियुक्तियों की प्रक्रिया संवैधानिक है और इसमें किसी भी तरह का पक्षपात नहीं होगा।
सुप्रीम कोर्ट में इस मामले की सुनवाई को विशेष ध्यान दिया जा रहा है, क्योंकि यह सीधे न्यायपालिका की भूमिका और चुनाव आयोग की निष्पक्षता से जुड़ा हुआ है। अब 7 अप्रैल को यह मामला दूसरी बेंच के सामने रखा जाएगा, जो याचिकाओं की समीक्षा कर इसके आगे की कार्रवाई तय करेगी।