चुनाव आयुक्त नियुक्ति विवाद: सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी पर अधिवक्ता शशांक रत्नू का विश्लेषण
सारांश
मुख्य बातें
सर्वोच्च न्यायालय में चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया को लेकर चल रही सुनवाई पर अधिवक्ता शशांक रत्नू ने 23 सितंबर 2026 को अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि अदालत ने नियुक्ति की संरचना और समिति के गठन पर गंभीर संवैधानिक प्रश्न खड़े किए हैं। उन्होंने इस फैसले को 'बेहद तल्ख और सख्त' बताया और कहा कि पारदर्शिता एवं संस्थागत स्वतंत्रता का सवाल इस पूरे मामले के केंद्र में है।
अदालत के सवाल और निर्णय की पृष्ठभूमि
रत्नू के अनुसार, सर्वोच्च न्यायालय ने अपने निर्णय में डॉ. भीमराव आंबेडकर के भाषणों, संविधान सभा की बहसों और उस दौर में पैदा हुए संवैधानिक शून्य का विस्तारपूर्वक उल्लेख किया है। उन्होंने कहा, 'उनका जजमेंट यही है कि ऐसा नहीं होना चाहिए। कमेटी बिल्कुल क्लियर होनी चाहिए और वह मामले की गहराई में गए हैं।' यह ऐसे समय में आया है जब चुनाव प्रक्रिया की निष्पक्षता को लेकर राष्ट्रीय बहस चल रही है।
न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता की टिप्पणी
न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता की कड़ी टिप्पणियों का उल्लेख करते हुए रत्नू ने बताया कि उन्होंने मौजूदा नियुक्ति व्यवस्था को प्रथम दृष्टया गलत करार दिया और स्पष्ट कहा कि ऐसी व्यवस्था नहीं होनी चाहिए। न्यायमूर्ति दत्ता ने 'जजेस अपॉइंट जजेस' की अवधारणा को एक भ्रम बताया और कॉलेजियम की सिफारिशों को रोकने तथा उनमें हस्तक्षेप से जुड़े सवाल भी उठाए। रत्नू के मुताबिक, फैसले में सरकार की ओर से पेश कुछ तर्कों पर भी टिप्पणी दर्ज की गई है।
तीन महत्वपूर्ण संवैधानिक पहलू
रत्नू ने इस मामले के तीन प्रमुख बिंदुओं को रेखांकित किया। पहला — पाँच न्यायाधीशों की पीठ का वह पहले का फैसला, जिसमें एक प्रो-टेम समिति बनाने और उसमें भारत के मुख्य न्यायाधीश को शामिल करने की बात कही गई थी। दूसरा — प्रधानमंत्री की अनुशंसा को संबंधित मंत्री द्वारा टाले जाने की राजनीतिक वास्तविकता, जो नियुक्ति की स्वतंत्रता पर सवाल उठाती है। तीसरा — क्या इस तरह के गंभीर संवैधानिक मामलों को बार-बार लंबित रखने की अनुमति दी जानी चाहिए, यह प्रश्न भी रत्नू ने खड़ा किया।
पाँच जजों की पीठ की आगामी भूमिका
रत्नू के अनुसार, इस पूरे मामले में आगे की कानूनी दिशा पाँच न्यायाधीशों की संविधान पीठ पर निर्भर करेगी। गौरतलब है कि यह पहली बार नहीं है जब चुनाव आयुक्त नियुक्ति का मुद्दा न्यायिक समीक्षा के दायरे में आया हो — इससे पहले भी सर्वोच्च न्यायालय ने इस विषय पर दिशा-निर्देश दिए थे जिन्हें बाद में विधायी बदलावों से चुनौती दी गई।
संस्थागत स्वतंत्रता और पारदर्शिता
रत्नू ने अंत में ज़ोर देकर कहा कि चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति जैसी संवैधानिक प्रक्रिया में पारदर्शिता और संस्थागत स्वतंत्रता का प्रश्न केंद्रीय महत्व का है। लोकतंत्र की विश्वसनीयता उन संस्थाओं की निष्पक्षता पर टिकी होती है जो चुनावी प्रक्रिया की देखरेख करती हैं, और यह बहस उसी मूल प्रश्न से जुड़ी है।