हरियाली तीज 2025: पहली बार व्रत रखने वाली महिलाएं जानें पूजा विधि, शुभ मुहूर्त और झूला परंपरा का अर्थ
सारांश
मुख्य बातें
हरियाली तीज का पावन पर्व इस वर्ष 15 अगस्त (शनिवार) को सावन शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि पर मनाया जाएगा। सुहागिन महिलाएं इस दिन भगवान शिव और माता पार्वती की उपासना कर अखंड सौभाग्य की कामना करती हैं, जबकि मनचाहे वर की इच्छा रखने वाली कुंवारी कन्याएं भी यह व्रत रख सकती हैं। जो महिलाएं पहली बार यह व्रत कर रही हैं, उनके लिए पूजा विधि और परंपराओं को समझना विशेष रूप से महत्वपूर्ण है।
पूजा की तैयारी कैसे करें
व्रत के दिन महिलाओं को सूर्योदय से पहले उठकर स्नान करना चाहिए और स्वच्छ वस्त्र धारण करने चाहिए। हाथों में मेहंदी रचाना इस पर्व का अभिन्न हिस्सा है। मायके से आने वाले सिंधारे — जिसमें साड़ी, चूड़ियाँ, मिठाइयाँ और शृंगार का सामान शामिल होता है — की साड़ी पहनना शुभ माना जाता है। विशेष रूप से हरे रंग की साड़ी इस त्योहार की पहचान है और इसे सौभाग्य का प्रतीक माना जाता है।
पूजा विधि और सोलह शृंगार
हरियाली तीज पर सोलह शृंगार करना सुहाग का प्रतीक माना जाता है। महिलाओं को संकल्प लेकर व्रत आरंभ करना चाहिए। शुभ मुहूर्त में माता पार्वती को शृंगार सामग्री अर्पित करें और भगवान शिव को बेलपत्र, जल तथा पुष्प चढ़ाएं। पूजा के लिए 15 अगस्त को सूर्योदय से सुबह 9:08 बजे तक का समय सर्वोत्तम बताया गया है। तृतीया तिथि का आरंभ 14 अगस्त की शाम 6:46 बजे से होगा और यह 15 अगस्त की शाम 5:28 बजे तक रहेगी।
झूला झूलने की परंपरा का महत्व
हरियाली तीज को भगवान शिव और माता पार्वती के पुनर्मिलन और प्रेम के उत्सव के रूप में जाना जाता है। इसी आनंद की अभिव्यक्ति में महिलाएं झूला झूलती हैं और पारंपरिक तीज गीत गाती हैं। गौरतलब है कि झूला झूलना व्रत या पूजा का अनिवार्य धार्मिक नियम नहीं है — यह एक लोक परंपरा है जो उत्सव की भावना को जीवंत करती है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश, राजस्थान और हरियाणा में यह परंपरा विशेष रूप से प्रचलित है। सुहागिन महिलाओं के साथ-साथ कुंवारी कन्याएं भी झूला झूल सकती हैं।
किन बातों का रखें विशेष ध्यान
पहली बार व्रत रखने वाली महिलाओं को यह जानना आवश्यक है कि यह व्रत निर्जला या फलाहारी रूप में रखा जा सकता है — परिवार की परंपरा के अनुसार। व्रत कथा का श्रवण भी इस दिन का महत्वपूर्ण हिस्सा है। शाम को पूजा के बाद सामूहिक रूप से झूला झूलना और गीत गाना इस पर्व को सामाजिक और सांस्कृतिक उत्सव का रूप देता है।
सांस्कृतिक और आध्यात्मिक महत्व
हरियाली तीज सावन माह की हरियाली, वर्षा ऋतु की उमंग और दांपत्य प्रेम के उत्सव का संगम है। यह त्योहार न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है, बल्कि उत्तर भारत की स्त्री-केंद्रित लोक संस्कृति की एक जीवंत अभिव्यक्ति भी है। आने वाले वर्षों में भी यह परंपरा पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ती रहेगी।