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हिमाचल विधानसभा ने पारित किया विश्वविद्यालय संशोधन विधेयक, HPPSC से होगी प्रोफेसरों की भर्ती

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हिमाचल विधानसभा ने पारित किया विश्वविद्यालय संशोधन विधेयक, HPPSC से होगी प्रोफेसरों की भर्ती

सारांश

हिमाचल प्रदेश विधानसभा ने राज्य के छह सरकारी विश्वविद्यालयों में प्रोफेसर भर्ती HPPSC के ज़रिए कराने का रास्ता साफ कर दिया। विपक्ष ने इसे विश्वविद्यालय स्वायत्तता पर हमला और UGC अनुदान के लिए खतरा बताया है, जबकि न्यायिक चुनौती की आशंका भी जताई जा रही है।

मुख्य बातें

हिमाचल प्रदेश विधानसभा ने 2 सितंबर 2026 को राज्य विश्वविद्यालय (संशोधन) विधेयक, 2026 ध्वनिमत से पारित किया।
प्रदेश के छह सरकारी विश्वविद्यालयों में प्रोफेसरों की भर्ती अब HPPSC और राज्य चयन आयोग के माध्यम से होगी; एसोसिएट प्रोफेसर भर्ती विश्वविद्यालय स्तर पर जारी रहेगी।
वित्त सचिव अभिषेक जैन सभी छह विश्वविद्यालयों की वित्त समितियों के अध्यक्ष बनाए गए।
BJP विधायक रणधीर शर्मा ने विश्वविद्यालय स्वायत्तता और UGC अनुदान पर असर की चिंता जताई।
नेता प्रतिपक्ष जयराम ठाकुर ने विधेयक को कानूनी कसौटी पर खरा न उतरने का दावा करते हुए न्यायिक चुनौती का संकेत दिया।

हिमाचल प्रदेश विधानसभा ने 2 सितंबर 2026 को ध्वनिमत से हिमाचल प्रदेश राज्य विश्वविद्यालय (संशोधन) विधेयक, 2026 पारित कर दिया। इस विधेयक के लागू होने से प्रदेश के छह सरकारी विश्वविद्यालयों में प्रोफेसरों और अन्य कर्मचारियों की भर्ती अब हिमाचल प्रदेश लोक सेवा आयोग (HPPSC) और राज्य चयन आयोग के माध्यम से होगी। यह कदम राज्य सरकार की भर्ती प्रक्रिया में पारदर्शिता और मेरिट-आधारित चयन सुनिश्चित करने की दिशा में उठाया गया है।

विधेयक में क्या है

नए प्रावधानों के अनुसार, प्रोफेसरों और अन्य कर्मचारियों की भर्ती HPPSC तथा राज्य चयन आयोग के ज़रिए की जाएगी। हालाँकि, एसोसिएट प्रोफेसरों की नियुक्ति पहले की भाँति संबंधित विश्वविद्यालय ही करते रहेंगे।

विधेयक में वित्तीय जवाबदेही को लेकर भी बड़ा बदलाव किया गया है — वित्त सचिव अभिषेक जैन अब सभी छह विश्वविद्यालयों की वित्त समितियों के अध्यक्ष होंगे। विश्वविद्यालयों की कार्यकारी परिषद (Executive Council) को वित्तीय मामलों में वित्त सचिव की अध्यक्षता वाली समिति की सिफारिशों को स्वीकार करना अनिवार्य होगा।

मुख्यमंत्री की प्रतिक्रिया

विधेयक पर चर्चा का जवाब देते हुए मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने कहा कि राज्य सरकार तृतीय और चतुर्थ श्रेणी के पदों पर भर्ती भी चयन आयोग या किसी समकक्ष संस्था के माध्यम से कराने पर विचार करेगी। उन्होंने यह भी बताया कि निजी विश्वविद्यालयों की परीक्षाएँ किसी नोडल एजेंसी के ज़रिए आयोजित कराने की संभावना भी तलाशी जा रही है।

सुक्खू ने दावा किया कि चयन आयोग के माध्यम से भर्ती होने से प्रक्रिया में पारदर्शिता आएगी और योग्य उम्मीदवारों का चयन मेरिट के आधार पर होगा, जिससे प्रदेश के युवाओं को सीधा लाभ मिलेगा।

विपक्ष की आपत्तियाँ

भाजपा विधायक रणधीर शर्मा ने इस विधेयक को विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता पर हमला करार दिया। उन्होंने तर्क दिया कि विश्वविद्यालयों को न केवल राज्य सरकार, बल्कि विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) से भी अनुदान प्राप्त होता है, इसलिए सरकार को यह आकलन करना चाहिए था कि विधेयक लागू होने के बाद UGC अनुदान पर क्या प्रभाव पड़ेगा।

नेता प्रतिपक्ष जयराम ठाकुर ने आरोप लगाया कि यह विधेयक कानूनी कसौटी पर खरा नहीं उतरेगा और राज्य सरकार के कई पूर्व विधेयकों को अदालतें पहले ही निरस्त कर चुकी हैं। इस पर मुख्यमंत्री सुक्खू ने पलटवार करते हुए कहा कि पिछली भारतीय जनता पार्टी (BJP) सरकार के कार्यकाल में भी अनेक विधेयक न्यायालयों द्वारा खारिज किए गए थे।

राजनीतिक नोकझोंक

चर्चा के दौरान मुख्यमंत्री सुक्खू और नेता प्रतिपक्ष जयराम ठाकुर के बीच पेपर लीक समेत कई मुद्दों पर तीखी राजनीतिक बहस भी हुई। राजस्व मंत्री जगत सिंह नेगी, तकनीकी शिक्षा मंत्री राजेश धर्माणी तथा विधायक विपिन सिंह परमार, त्रिलोक जमवाल, हरीश जनारथा और सुरेश कुमार ने भी चर्चा में सक्रिय भागीदारी की।

आगे क्या होगा

गौरतलब है कि यह विधेयक ऐसे समय में आया है जब राज्य में सरकारी भर्तियों में पारदर्शिता की माँग लंबे समय से उठ रही है। विपक्ष द्वारा न्यायिक चुनौती की संभावना जताई जा रही है, जबकि UGC अनुदान पर संभावित प्रभाव को लेकर भी सवाल अनुत्तरित हैं। विश्वविद्यालयों में भर्ती प्रक्रिया कब से शुरू होगी, इसका ब्यौरा अभी सरकार की ओर से आना बाकी है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन विश्वविद्यालयों की वित्त समितियों की अध्यक्षता सीधे वित्त सचिव को सौंपना एक असाधारण केंद्रीकरण है जो UGC के स्वायत्तता मानकों से टकरा सकता है। विपक्ष की UGC अनुदान वाली चिंता महज राजनीतिक नहीं है — अतीत में कई राज्यों के ऐसे हस्तक्षेपों पर UGC ने आपत्ति जताई है। साथ ही, मुख्यमंत्री का यह स्वीकारना कि उनके कुछ पूर्व विधेयक अदालतों में टिके नहीं, इस विधेयक की कानूनी मज़बूती पर स्वयं सवाल खड़ा करता है। असली परीक्षा यह होगी कि HPPSC के पास उच्च-शिक्षा विशेषज्ञ भर्ती की क्षमता और विशेषज्ञता कितनी है।
RashtraPress
3 सितंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

हिमाचल प्रदेश राज्य विश्वविद्यालय संशोधन विधेयक 2026 क्या है?
यह 2 सितंबर 2026 को हिमाचल प्रदेश विधानसभा द्वारा ध्वनिमत से पारित वह विधेयक है, जो प्रदेश के छह सरकारी विश्वविद्यालयों में प्रोफेसरों की भर्ती HPPSC और राज्य चयन आयोग के माध्यम से कराने का प्रावधान करता है। इसके साथ ही वित्त सचिव को सभी विश्वविद्यालयों की वित्त समितियों का अध्यक्ष बनाया गया है।
क्या सभी प्रोफेसरों की भर्ती अब HPPSC से होगी?
नहीं। विधेयक के अनुसार प्रोफेसर और अन्य कर्मचारियों की भर्ती HPPSC व राज्य चयन आयोग से होगी, लेकिन एसोसिएट प्रोफेसरों की नियुक्ति पहले की तरह संबंधित विश्वविद्यालय ही करते रहेंगे।
BJP ने इस विधेयक का विरोध क्यों किया?
BJP विधायक रणधीर शर्मा ने इसे विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता पर हमला बताया और चेताया कि विश्वविद्यालयों को UGC से भी अनुदान मिलता है, जिस पर इस विधेयक का प्रतिकूल असर पड़ सकता है। नेता प्रतिपक्ष जयराम ठाकुर ने न्यायिक चुनौती की संभावना भी जताई।
वित्त सचिव की भूमिका विश्वविद्यालयों में क्या होगी?
विधेयक के प्रावधान के अनुसार, हिमाचल प्रदेश के वित्त सचिव अभिषेक जैन सभी छह सरकारी विश्वविद्यालयों की वित्त समितियों के अध्यक्ष होंगे। विश्वविद्यालयों की कार्यकारी परिषद को वित्तीय मामलों में इस समिति की सिफारिशें मानना अनिवार्य होगा।
मुख्यमंत्री सुक्खू ने इस विधेयक से क्या उम्मीदें जताई हैं?
मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने कहा कि चयन आयोग के माध्यम से भर्ती से प्रक्रिया में पारदर्शिता आएगी और मेरिट के आधार पर योग्य उम्मीदवारों का चयन होगा। उन्होंने तृतीय-चतुर्थ श्रेणी भर्तियों और निजी विश्वविद्यालयों की परीक्षाओं को भी नोडल एजेंसी से कराने पर विचार करने की बात कही।
राष्ट्र प्रेस
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