2 अक्टूबर 2026
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गांधी जयंती पर राज ठाकरे का सत्ता पर निशाना: 'रस्मी श्रद्धांजलि नहीं, असली लोकतंत्र चाहिए'

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गांधी जयंती पर राज ठाकरे का सत्ता पर निशाना: 'रस्मी श्रद्धांजलि नहीं, असली लोकतंत्र चाहिए'

सारांश

गांधी जयंती पर राज ठाकरे ने सत्ता को आईना दिखाया — मूर्तियों पर माला नहीं, असली लोकतंत्र चाहिए। एक्स पर लिखी उनकी पोस्ट में असहमति को 'राष्ट्र-विरोधी' ठहराने की प्रवृत्ति, संवैधानिक संस्थाओं की घटती स्वायत्तता और 'व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी' के खतरे पर सीधा हमला है।

मुख्य बातें

राज ठाकरे ने 2 अक्टूबर 2026 को गांधी जयंती पर एक्स पर पोस्ट कर सत्तारूढ़ राजनीति पर निशाना साधा।
उन्होंने कहा कि महान हस्तियों को जयंती-पुण्यतिथि तक सीमित रखना उनकी विरासत के साथ अन्याय है।
सवाल उठाने वालों को 'राष्ट्र-विरोधी' बताने की प्रवृत्ति और शांतिपूर्ण प्रदर्शनों पर सरकारी बल के इस्तेमाल पर चिंता जताई।
चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्थाओं की स्वायत्तता घटने पर भी सवाल उठाए।
'व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी' के ज़रिए स्वतंत्र सोच को कमज़ोर करने की कोशिशों के प्रति नागरिकों को सतर्क रहने की अपील की।

महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (MNS) के अध्यक्ष राज ठाकरे ने 2 अक्टूबर 2026 को महात्मा गांधी की जयंती के अवसर पर सत्तारूढ़ राजनीतिक प्रतिष्ठान पर तीखा प्रहार किया। उन्होंने कहा कि गांधीजी को केवल जयंती-पुण्यतिथि पर मालाओं और तस्वीरों तक सीमित रखना उनके साथ अन्याय है — बिना उनकी मूल शिक्षाओं को आत्मसात किए, सच्चा लोकतंत्र टिक नहीं सकता। ठाकरे ने यह टिप्पणी एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर एक पोस्ट के ज़रिए की।

प्रतीकों से आगे बढ़ने की ज़रूरत

राज ठाकरे ने अपनी पोस्ट में लिखा कि महान हस्तियों को याद करने का तरीका अब मूर्तियों पर माला चढ़ाने और उनके सामने खड़े होकर तस्वीर खिंचवाने तक सिमट गया है। उनके अनुसार, स्मारकों को केवल फोटो-ऑप का माध्यम बनाकर हम उन विभूतियों की असली विरासत को नज़रअंदाज़ करते हैं।

उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि महात्मा गांधी की सबसे बड़ी देन राजनीतिक स्वतंत्रता नहीं, बल्कि आम नागरिक का वह अधिकार था जिससे वह सरकार की मनमानी या अत्यधिक हस्तक्षेप के विरुद्ध 'ना' कह सके।

असहमति पर बढ़ती असहिष्णुता

ठाकरे ने मौजूदा राजनीतिक माहौल पर सीधा प्रहार करते हुए कहा कि जैसे ही कोई नागरिक सवाल उठाता है, सत्ता में बैठे लोग और उनकी 'ऑनलाइन ट्रोल की फौज' उसे तुरंत 'राष्ट्र-विरोधी' करार देने पर उतर आती है। उन्होंने यह भी कहा कि शांतिपूर्ण प्रदर्शनों को दबाना और प्रदर्शनकारियों के खिलाफ सरकारी ताकत का इस्तेमाल करना लोकतंत्र की मूल भावना के विरुद्ध है।

उन्होंने चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्थाओं की स्वायत्तता में कमी पर भी चिंता व्यक्त की। यह ऐसे समय में आया है जब देशभर में संस्थागत स्वतंत्रता पर बहस तेज़ होती जा रही है।

गांधी की विरासत और सरकार का नैतिक दायरा

ठाकरे के अनुसार, सरकार के पास कानून है, सत्ता की शक्ति है और अपनी सुविधानुसार नियम बदलने की क्षमता भी है — फिर भी गांधीजी ने यह सिद्ध किया कि इन सबके बावजूद कोई भी सत्ता आम आदमी की तर्कसंगत सोच या उसके ज़मीर पर कब्ज़ा नहीं कर सकती।

उन्होंने नागरिकों को डिजिटल प्लेटफॉर्म पर चल रहे प्रोपेगैंडा — जिसे अक्सर 'व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी' कहा जाता है — के प्रति सतर्क रहने की अपील की। उनका कहना था कि स्वतंत्र सोच और जन-जागरूकता को कमज़ोर करने की सुनियोजित कोशिशें लोकतंत्र के लिए उतनी ही खतरनाक हैं।

नागरिक भागीदारी की अनिवार्यता

राज ठाकरे ने दोहराया कि एक लोकतांत्रिक गणराज्य में जनता सर्वोपरि है। उनके मुताबिक राजनीतिक आंदोलन, सड़कों पर मार्च और नागरिकों की सक्रिय भागीदारी — ये सभी सत्तारूढ़ प्रशासन को जवाबदेह बनाए रखने के अनिवार्य साधन हैं।

उन्होंने कहा कि शासक वर्ग गांधी को तभी अपनाता है जब यह उनकी तात्कालिक राजनीतिक सुविधा के अनुकूल हो। गौरतलब है कि गांधी जयंती पर यह बयान ऐसे राजनीतिक परिवेश में आया है जब विपक्षी दलों और नागरिक समाज की ओर से सत्ता की जवाबदेही को लेकर आवाज़ें लगातार तेज़ हो रही हैं।

आगे क्या

ठाकरे का यह बयान MNS की व्यापक राजनीतिक रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है, जो महाराष्ट्र में अपनी पहचान को पुनः परिभाषित करने में लगी है। उनके इस वक्तव्य पर राजनीतिक प्रतिक्रियाएँ अपेक्षित हैं और यह देखना होगा कि सत्तापक्ष इस चुनौती का जवाब किस रूप में देता है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन असल में यह एक सुनियोजित राजनीतिक संदेश है जो MNS को महाराष्ट्र में विपक्षी स्वर के रूप में पुनः स्थापित करने की कोशिश है। जो बात मुख्यधारा की कवरेज अक्सर चूक जाती है वह यह है कि ठाकरे खुद लंबे समय तक क्षेत्रीय उग्र-राष्ट्रवाद के प्रतीक रहे हैं — इसलिए असहमति और संस्थागत स्वायत्तता पर उनकी यह चिंता उनकी अपनी राजनीतिक यात्रा के संदर्भ में भी परखी जानी चाहिए। गांधी की विरासत को 'सत्ता से सवाल पूछने के अधिकार' से जोड़ना एक शक्तिशाली फ्रेमिंग है, लेकिन इसकी विश्वसनीयता तभी बनेगी जब MNS खुद इस कसौटी पर खरी उतरे।
RashtraPress
2 अक्टूबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

राज ठाकरे ने गांधी जयंती पर क्या कहा?
MNS प्रमुख राज ठाकरे ने 2 अक्टूबर 2026 को एक्स पर पोस्ट कर कहा कि गांधीजी को केवल जयंती-पुण्यतिथि पर मालाओं और तस्वीरों तक सीमित रखना उचित नहीं है। उनके अनुसार, उनकी मूल शिक्षाओं — विशेषकर सत्ता से सवाल पूछने के अधिकार — के बिना सच्चा लोकतंत्र नहीं टिक सकता।
राज ठाकरे ने किन संवैधानिक संस्थाओं पर चिंता जताई?
ठाकरे ने चुनाव आयोग जैसी अहम संवैधानिक संस्थाओं की स्वायत्तता में कमी पर चिंता व्यक्त की। उन्होंने शांतिपूर्ण प्रदर्शनों को दबाने और प्रदर्शनकारियों के खिलाफ सरकारी बल के इस्तेमाल को भी लोकतंत्र के लिए खतरनाक बताया।
'व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी' के बारे में राज ठाकरे ने क्या कहा?
ठाकरे ने नागरिकों को डिजिटल प्लेटफॉर्म पर फैलाए जा रहे प्रोपेगैंडा — जिसे 'व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी' कहा जाता है — के प्रति सतर्क रहने की अपील की। उनका कहना था कि इन माध्यमों से स्वतंत्र सोच और जन-जागरूकता को सुनियोजित तरीके से कमज़ोर करने की कोशिश की जाती है।
गांधीजी की विरासत के बारे में ठाकरे का क्या मत है?
ठाकरे के अनुसार, गांधीजी का सबसे बड़ा योगदान राजनीतिक आज़ादी नहीं, बल्कि आम नागरिक का वह जन्मसिद्ध अधिकार था जिससे वह सरकार की मनमानी के विरुद्ध 'ना' कह सके। उन्होंने कहा कि सरकार के पास कानून और शक्ति होने के बावजूद वह किसी नागरिक के ज़मीर पर अपना अधिकार नहीं जता सकती।
राज ठाकरे का यह बयान राजनीतिक रूप से कितना महत्वपूर्ण है?
यह बयान MNS की बदलती राजनीतिक रणनीति का संकेत है, जिसमें पार्टी महाराष्ट्र में विपक्षी आवाज़ के रूप में खुद को पुनः स्थापित करने की कोशिश कर रही है। गांधी जयंती पर सत्ता की आलोचना को प्रतीकात्मक रूप से जोड़ना एक सुनियोजित राजनीतिक संदेश माना जा रहा है।
राष्ट्र प्रेस
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