26 जून 2026
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जन विश्वास एक्ट 2026: दवा और कॉस्मेटिक्स कानून में बड़ा बदलाव, प्रक्रियागत उल्लंघनों पर अब प्रशासनिक जुर्माना

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जन विश्वास एक्ट 2026: दवा और कॉस्मेटिक्स कानून में बड़ा बदलाव, प्रक्रियागत उल्लंघनों पर अब प्रशासनिक जुर्माना

सारांश

जन विश्वास एक्ट 2026 के तहत केंद्र सरकार ने दवा, कॉस्मेटिक्स और खाद्य सुरक्षा कानूनों में बड़े बदलाव किए हैं — छोटी प्रक्रियागत गलतियों पर जेल की जगह प्रशासनिक जुर्माना, कारावास अवधि आधी, और कानूनी दोहराव खत्म। गंभीर स्वास्थ्य अपराधों पर सख्ती बरकरार।

मुख्य बातें

केंद्र सरकार ने 26 जून 2026 को जन विश्वास एक्ट, 2026 के तहत ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स एक्ट, 1940 और फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड्स एक्ट, 2006 में संशोधन लागू किए।
धारा 29 (सरकारी विश्लेषक रिपोर्ट के विज्ञापन में उपयोग पर ₹1 लाख जुर्माना) पूरी तरह हटाई गई।
कम जोखिम वाले कॉस्मेटिक उल्लंघन और धारा 28ए के प्रक्रियागत उल्लंघन अब प्रशासनिक जुर्माने के दायरे में।
ज़ब्त वस्तुओं से छेड़छाड़ की सज़ा 6 महीने से घटाकर 3 महीने की गई।
फूड सेफ्टी ऑफिसर के कार्य में बाधा से जुड़ा प्रावधान हटाया — BNS के तहत पहले से कवर होने के कारण।
नकली या मिलावटी उत्पादों और गंभीर स्वास्थ्य अपराधों के लिए सख्त दंड प्रावधान यथावत बने रहेंगे।

केंद्र सरकार ने 26 जून 2026 को जन विश्वास एक्ट, 2026 के तहत ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स एक्ट, 1940 और फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड्स एक्ट, 2006 में महत्वपूर्ण संशोधन लागू किए हैं। इन सुधारों का उद्देश्य छोटी और तकनीकी प्रकृति की गलतियों को आपराधिक दायरे से बाहर कर प्रशासनिक जुर्माने की व्यवस्था में लाना है, जबकि जन-स्वास्थ्य और उपभोक्ता सुरक्षा से जुड़े गंभीर अपराधों के लिए सख्त प्रावधान यथावत बने रहेंगे। स्वास्थ्य मंत्रालय ने शुक्रवार को जारी अपने आधिकारिक बयान में यह जानकारी दी।

मुख्य संशोधन: क्या बदला

ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स एक्ट, 1940 की धारा 29 को पूरी तरह हटा दिया गया है। इस धारा के तहत किसी दवा या कॉस्मेटिक उत्पाद के विज्ञापन में सरकारी विश्लेषक की रिपोर्ट के उपयोग पर ₹1 लाख तक के जुर्माने का प्रावधान था।

इसके साथ ही, धारा 28ए के अंतर्गत आने वाले उल्लंघन — जो मुख्यतः रिकॉर्ड रखने और जानकारी जमा करने जैसी प्रक्रियात्मक आवश्यकताओं से संबंधित हैं — अब प्रशासनिक जुर्माने के दायरे में आ गए हैं। कम जोखिम वाले कॉस्मेटिक उत्पादों के निर्माण या विक्रय से जुड़े उल्लंघन, जैसे गुणवत्ता के मामूली मानकों की अपूर्ति या लेबलिंग में छोटी-मोटी कमियाँ, भी इसी नई व्यवस्था के अंतर्गत लाए गए हैं।

हालाँकि, नकली या मिलावटी कॉस्मेटिक्स से जुड़े अपराध, जिनका सीधा प्रभाव उपभोक्ता की सुरक्षा पर पड़ता है, उनके लिए कानून के तहत कड़े罚 दंड के प्रावधान पहले की ही तरह लागू रहेंगे।

खाद्य सुरक्षा कानून में बदलाव

फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड्स एक्ट, 2006 के तहत फूड सेफ्टी ऑफिसर्स के विरुद्ध झूठी शिकायतों पर न्यायालय द्वारा जुर्माना लगाने के प्रावधान को अब प्रशासनिक दंड प्रणाली में परिवर्तित कर दिया गया है। ज़ब्त की गई वस्तुओं के साथ छेड़छाड़ की सज़ा को भी तर्कसंगत बनाया गया है — इसमें कारावास की अवधि छह महीने से घटाकर तीन महीने कर दी गई है।

इसके अतिरिक्त, फूड सेफ्टी ऑफिसर के कार्य में बाधा डालने या उनका विरोध करने से संबंधित प्रावधान को इस कानून से हटा दिया गया है, क्योंकि ऐसे अपराध पहले से ही भारतीय न्याय संहिता (BNS) के तहत कवर किए जा चुके हैं। इससे कानूनी ढाँचे में अनावश्यक दोहराव समाप्त होगा।

नई प्रशासनिक व्यवस्था

नए ढाँचे को प्रभावी ढंग से लागू करने के लिए एडजुडिकेटिंग अथॉरिटीज (निर्णायक अधिकारियों) की नियुक्ति और अपील की व्यवस्था से जुड़े प्रावधान शुरू किए गए हैं। इसका लक्ष्य उल्लंघन के मामलों का समयबद्ध और पारदर्शी निपटारा सुनिश्चित करना है।

यह ऐसे समय में आया है जब सरकार व्यापक स्तर पर 'ईज ऑफ डूइंग बिजनेस' को बढ़ावा देने की दिशा में काम कर रही है। गौरतलब है कि जन विश्वास एक्ट कई क्षेत्रों के कानूनों में एक साथ सुधार करने का प्रयास है, और दवा-कॉस्मेटिक्स तथा खाद्य सुरक्षा क्षेत्र में ये संशोधन उसी व्यापक पहल का हिस्सा हैं।

सरकार का पक्ष

स्वास्थ्य मंत्रालय के बयान के अनुसार, इन संशोधनों का उद्देश्य तकनीकी या प्रक्रियागत चूकों और गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य अपराधों के बीच स्पष्ट अंतर स्थापित करना है। मंत्रालय का कहना है कि इससे भारत के खाद्य और दवा नियामक ढाँचे की विश्वसनीयता बनाए रखते हुए अनुपालन का बोझ कम होगा और कारोबारी माहौल बेहतर बनेगा।

आगे चलकर यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि नई एडजुडिकेटिंग अथॉरिटीज किस गति और निष्पक्षता से काम करती हैं, और क्या ये बदलाव वास्तव में उद्योग जगत व उपभोक्ताओं दोनों के लिए संतुलित परिणाम दे पाते हैं।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन असली परीक्षा नई एडजुडिकेटिंग अथॉरिटीज की स्वतंत्रता और दक्षता से होगी — अगर ये अधिकारी भी नौकरशाही की उसी पुरानी लय में काम करें, तो 'प्रशासनिक जुर्माना' महज एक नया नाम बनकर रह जाएगा। 'तकनीकी उल्लंघन' और 'गंभीर स्वास्थ्य अपराध' के बीच की रेखा कानून में नहीं, बल्कि ज़मीनी अमल में खिंचती है — और वहीं सबसे ज़्यादा जोखिम है। उपभोक्ता संगठनों की यह चिंता वाजिब है कि लेबलिंग की 'मामूली कमियों' की आड़ में बड़े उल्लंघन न छुप जाएँ।
RashtraPress
26 जून 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

जन विश्वास एक्ट 2026 के तहत दवा और कॉस्मेटिक्स कानून में क्या बदला है?
जन विश्वास एक्ट 2026 के तहत ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स एक्ट, 1940 की धारा 29 हटा दी गई है और प्रक्रियागत व कम जोखिम वाले उल्लंघनों को आपराधिक दायरे से निकालकर प्रशासनिक जुर्माने की व्यवस्था में लाया गया है। नकली या मिलावटी उत्पादों के लिए सख्त दंड पहले की तरह बने रहेंगे।
फूड सेफ्टी एक्ट में कारावास की सज़ा कितनी घटाई गई है?
फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड्स एक्ट, 2006 के तहत ज़ब्त वस्तुओं से छेड़छाड़ की सज़ा में कारावास की अवधि छह महीने से घटाकर तीन महीने कर दी गई है। यह बदलाव दंड को तर्कसंगत बनाने की दिशा में उठाया गया कदम है।
क्या इन संशोधनों से उपभोक्ता सुरक्षा कमज़ोर होगी?
सरकार के अनुसार, नकली, मिलावटी या उपभोक्ता सुरक्षा के लिए खतरनाक उत्पादों से जुड़े अपराधों पर सख्त प्रावधान यथावत लागू रहेंगे। केवल प्रक्रियागत और तकनीकी प्रकृति की छोटी गलतियों को ही प्रशासनिक जुर्माने के दायरे में लाया गया है।
नई एडजुडिकेटिंग अथॉरिटीज क्या हैं और इनकी भूमिका क्या होगी?
एडजुडिकेटिंग अथॉरिटीज यानी निर्णायक अधिकारी वे नियुक्त अधिकारी होंगे जो प्रशासनिक जुर्माने से जुड़े मामलों की सुनवाई और निपटारा करेंगे। इनके साथ अपील की व्यवस्था भी बनाई गई है ताकि मामलों का समयबद्ध और पारदर्शी समाधान हो सके।
फूड सेफ्टी ऑफिसर के कार्य में बाधा डालने का प्रावधान क्यों हटाया गया?
इस प्रावधान को फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड्स एक्ट से इसलिए हटाया गया क्योंकि ऐसे अपराध पहले से ही भारतीय न्याय संहिता (BNS) के तहत कवर किए जा चुके हैं। इससे कानूनी ढाँचे में अनावश्यक दोहराव समाप्त होगा।
राष्ट्र प्रेस
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