इब्राहिम अल्काजी: NSD के निदेशक जिन्होंने भारतीय रंगमंच को दिया विश्वस्तरीय मुकाम, नसीरुद्दीन शाह-ओम पुरी को किया तराशा
सारांश
मुख्य बातें
इब्राहिम अल्काजी — आधुनिक भारतीय रंगमंच के पितामह — ने नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा (NSD) के निदेशक के रूप में 1962 से 1977 तक हिंदी थिएटर को एक अनुशासित, विश्वस्तरीय कला के रूप में स्थापित किया। उनके मार्गदर्शन में तैयार हुई पीढ़ी ने भारतीय सिनेमा और टेलीविजन की दिशा ही बदल दी। 18 अक्टूबर 1925 को पुणे में जन्मे अल्काजी ने 4 अगस्त 2020 को 94 वर्ष की आयु में दुनिया को अलविदा कहा।
प्रारंभिक जीवन और रंगमंच से जुड़ाव
अल्काजी के पिता सऊदी अरब के खानाबदोश व्यापारी थे और माता कुवैती थीं। प्रारंभिक शिक्षा पुणे में हुई, जिसके बाद वे मुंबई के सेंट जेवियर्स कॉलेज आए। यहीं उनका झुकाव कला और साहित्य की ओर गहरा हुआ। कॉलेज में पढ़ाई के दौरान वे सुल्तान 'बॉबी' पदमसी की अंग्रेज़ी थिएटर कंपनी से जुड़े, जहाँ उन्होंने अभिनय और निर्देशन दोनों में हाथ आज़माया।
लंदन से मिली तकनीकी दक्षता
पिता की सलाह पर 1947 में वे लंदन गए और प्रतिष्ठित रॉयल एकेडेमी ऑफ ड्रामेटिक आर्ट (RADA) में प्रशिक्षण लिया। वहाँ उन्होंने पश्चिमी रंगमंच की तकनीक — प्रकाश व्यवस्था, सेट डिज़ाइनिंग और अभिनय की बारीकियाँ — आत्मसात कीं। इंग्लिश ड्रामा लीग और ब्रिटिश ब्रॉडकास्टिंग कॉर्पोरेशन (BBC) द्वारा सम्मानित किए जाने के बाद उन्हें वहाँ करियर के प्रस्ताव मिले, किंतु उन्होंने सभी अवसर ठुकराकर भारत लौटने का निर्णय लिया। यह उनके भारत-प्रेम का प्रमाण था — विभाजन के समय जब परिवार के अधिकांश सदस्य पाकिस्तान चले गए, अल्काजी भारत में ही रहे।
NSD में क्रांतिकारी बदलाव
1952 में इंग्लैंड से लौटकर उन्होंने बॉम्बे में थिएटर ग्रुप का पुनर्गठन किया। जीवन का सबसे महत्वपूर्ण मोड़ 1962 में आया, जब वे राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (NSD) के निदेशक नियुक्त हुए। उन्होंने एक ऐसा पाठ्यक्रम तैयार किया जो अभिनय और निर्देशन के साथ-साथ रंगमंच के हर पहलू — तकनीक, डिज़ाइन, प्रकाश — को समान महत्व देता था। गौरतलब है कि उनके 15 वर्षों के कार्यकाल में NSD ने देश के सर्वश्रेष्ठ रंगकर्मियों की एक पूरी पीढ़ी तैयार की।
प्रसिद्ध शिष्य और विरासत
अल्काजी के छात्रों की सूची भारतीय कला जगत का एक स्वर्णिम अध्याय है। इनमें नसीरुद्दीन शाह, ओम पुरी, विजया मेहता, ओम शिवपुरी, हरपाल तिवाना, नीना तिवाना, बलराज पंडित, मनोहर सिंह, उत्तरा बाओकर, ज्योति सुभाष, सुहास जोशी, बी. जयश्री, जयदेव, रोहिणी हट्टंगड़ी, कुमार वर्मा और एस. रामानुजम शामिल हैं। 60 के दशक से ही इन प्रतिभाओं ने आर्टहाउस सिनेमा और फिर मुख्यधारा के सिनेमा व टेलीविजन को एक नई दिशा दी।
निर्देशन और सम्मान
अल्काजी ने 50 से अधिक नाटकों का निर्देशन किया — जिनमें गिरीश कर्नाड का तुगलक, मोहन राकेश का आषाढ़ का एक दिन, धर्मवीर भारती का अंधा युग और कई शेक्सपियर व ग्रीक नाटक शामिल हैं। उन्हें पद्म श्री (1966), पद्म भूषण (1991), पद्म विभूषण (2010) और संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से नवाज़ा गया। भारतीय रंगमंच को अनुशासन, गहराई और वैश्विक पहचान देने वाले इस महान रंगकर्मी की विरासत आज भी NSD की हर दीवार में जीवित है।