ओम पुरी ने बताया: एनएसडी में अंग्रेजी से संघर्ष और अलकाजी की सलाह ने बदली जिंदगी
सारांश
मुख्य बातें
दिवंगत दिग्गज अभिनेता ओम पुरी ने एक बार खुलासा किया था कि नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा (एनएसडी) में अपने प्रशिक्षण के दौरान उन्हें अंग्रेजी भाषा को लेकर गहरी हीन भावना से जूझना पड़ा था। पंजाबी माध्यम से पढ़े होने के कारण कॉन्वेंट-शिक्षित सहपाठियों के बीच वे खुद को कमतर महसूस करते थे — लेकिन एनएसडी के तत्कालीन निदेशक इब्राहिम अलकाजी की एक सलाह ने उनका नज़रिया हमेशा के लिए बदल दिया।
एनएसडी में अंग्रेजी की चुनौती
अभिनेता अनुपम खेर के चर्चित शो 'द अनुपम खेर शो — कुछ भी हो सकता है' में ओम पुरी ने अपना अनुभव साझा करते हुए कहा था: 'मुझे एनएसडी में अंग्रेजी को लेकर बहुत कठिनाई होती थी क्योंकि मैंने पढ़ाई पंजाबी माध्यम से की थी, जबकि यहाँ हमें अंग्रेजी माध्यम में पढ़ाया जाता था। कुछ छात्र कॉन्वेंट से थे, जिनकी अंग्रेजी बहुत अच्छी थी। इसलिए मुझे हीन भावना महसूस होती थी।'
यह वह दौर था जब एनएसडी भारत के सर्वश्रेष्ठ अभिनय प्रतिभाओं को एक छत के नीचे तराश रहा था। भाषाई असमानता एक वास्तविक बाधा थी — और ओम पुरी इससे अकेले नहीं जूझ रहे थे, लेकिन उन्होंने इसे सबसे गहराई से महसूस किया।
अलकाजी की दूरदर्शी सलाह
जब इब्राहिम अलकाजी को ओम पुरी की इस परेशानी का पता चला, तो उन्होंने पहले अन्य लोगों से उन पर नज़र रखने को कहा। बाद में जब ओम पुरी ने स्वीकार किया कि वे दूसरों की तरह अंग्रेजी नहीं बोल सकते, तो अलकाजी ने उन्हें सहज भाषा में — यानी हिंदी में — बोलने की अनुमति दी।
साथ ही अलकाजी ने व्यावहारिक मार्ग भी सुझाया: अंग्रेजी अखबार पढ़ें और दोस्तों के साथ अंग्रेजी में बातचीत करें। उनके शब्द थे — 'भले ही लोग हंसे, लेकिन चिंता मत करो।' यह सलाह महज़ भाषा सीखने की नहीं थी; यह आत्मविश्वास बनाने का पाठ था।
एफटीआईआई और करियर की नींव
एनएसडी के बाद ओम पुरी के सहपाठी और मित्र नसीरुद्दीन शाह ने उन्हें पुणे स्थित फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (एफटीआईआई) में दाखिला लेने के लिए प्रेरित किया। यह कदम उनके अभिनय जीवन की दिशा तय करने में निर्णायक साबित हुआ।
ओम पुरी ने अपने करियर की शुरुआत 1976 की मराठी फिल्म 'घासीराम कोतवाल' से की, जो विजय तेंदुलकर के प्रसिद्ध नाटक पर आधारित थी। गौरतलब है कि जो अभिनेता एनएसडी में अंग्रेजी से घबराता था, उसने आगे चलकर अंग्रेजी, पंजाबी, कन्नड़, तेलुगु, मलयालम, बंगाली, गुजराती, उर्दू और मराठी — कुल नौ भाषाओं में काम किया।
यादगार फिल्में और विरासत
ओम पुरी की प्रमुख फिल्मों में आक्रोश (1980), आरोहण (1982), अर्धसत्य (1983), डिस्को डांसर (1982), जाने भी दो यारो (1983), चाची 420 (1997), हेराफेरी (2000) और चुप चुप के (2006) शामिल हैं। उनकी यह यात्रा इस बात का प्रमाण है कि भाषाई संघर्ष किसी असाधारण प्रतिभा की राह नहीं रोक सकता।