15 अक्टूबर 2026
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IIT मद्रास की डॉक्युमेंट्री 'पोर्ट्रेट ऑफ मेनी फेसेस': 17 छात्रों के संघर्ष की कहानी दुनिया तक पहुँचेगी

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IIT मद्रास की डॉक्युमेंट्री 'पोर्ट्रेट ऑफ मेनी फेसेस': 17 छात्रों के संघर्ष की कहानी दुनिया तक पहुँचेगी

सारांश

'पोर्ट्रेट ऑफ मेनी फेसेस' सिर्फ एक डॉक्युमेंट्री नहीं — यह IIT मद्रास के उस दावे की परीक्षा है कि उच्च शिक्षा अब सिर्फ JEE पास करने वालों की बपौती नहीं रही। 17 छात्रों की कहानियाँ, 50,000 से अधिक नामांकित विद्यार्थी और गरीबी रेखा से नीचे के 25% छात्र — यह वृत्तचित्र भारत में शिक्षा के लोकतांत्रिकरण का जीवंत दस्तावेज़ है।

मुख्य बातें

IIT मद्रास ने वृत्तचित्र फिल्म ' पोर्ट्रेट ऑफ मेनी फेसेस ' की घोषणा 15 अक्टूबर 2026 को की।
फिल्म में 17 विद्यार्थियों के संघर्ष, सपनों और उपलब्धियों को दर्शाया गया है; फिल्म निर्माण कंपनी इरॉस यूनिवर्स के साथ साझेदारी।
निर्देशन IIT मद्रास के पूर्व छात्र शाश्वत मुखर्जी ने किया, जो स्वयं इस ऑनलाइन कार्यक्रम के स्नातक हैं।
IIT मद्रास के ऑनलाइन उपाधि कार्यक्रम में 50,000 से अधिक सक्रिय विद्यार्थी; इसे दुनिया का सबसे बड़ा ऑनलाइन डिग्री कार्यक्रम (कैंपस के बाहर) बताया गया है।
नामांकित विद्यार्थियों में 25% से अधिक गरीबी रेखा से नीचे के परिवारों से आते हैं।
कामकोटि ने कहा, फिल्म स्वामी विवेकानंद के शिक्षा-सुलभता के विचार को व्यवहार में उतारती है।

भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) मद्रास ने 15 अक्टूबर 2026 को एक नई वृत्तचित्र फिल्म 'पोर्ट्रेट ऑफ मेनी फेसेस' की घोषणा की, जो देश के विभिन्न सामाजिक, आर्थिक और भौगोलिक पृष्ठभूमियों से आए 17 विद्यार्थियों के उच्च शिक्षा संघर्ष और उपलब्धियों को वैश्विक मंच पर प्रस्तुत करेगी। इस फिल्म के लिए संस्थान ने फिल्म निर्माण कंपनी इरॉस यूनिवर्स के साथ साझेदारी की है। यह वृत्तचित्र गुणवत्तापूर्ण और सुलभ उच्च शिक्षा की ज़रूरत और उसकी परिवर्तनकारी शक्ति को केंद्र में रखती है।

फिल्म की विशेषताएँ और दायरा

फिल्म का निर्देशन और संपादन IIT मद्रास के पूर्व विद्यार्थी शाश्वत मुखर्जी ने किया है। उल्लेखनीय है कि इस वृत्तचित्र की शूटिंग केवल कक्षाओं या संस्थान परिसर तक सीमित नहीं रही — टीम ने देशभर में विद्यार्थियों के घरों और उनके निजी परिवेश तक पहुँचकर यह दर्ज किया कि वे किन परिस्थितियों में अपनी पढ़ाई जारी रखते हैं। फिल्म में इन छात्रों के पारिवारिक परिवेश, चुनौतियों, महत्वाकांक्षाओं और शिक्षा से मिले नए अवसरों को सामने लाया गया है।

संस्थान की पहल और निदेशक की प्रतिक्रिया

IIT मद्रास के निदेशक प्रोफेसर वी. कामकोटि ने इस पहल की सराहना करते हुए कहा कि स्वामी विवेकानंद ने शिक्षा को गरीबों तक पहुँचाने की आवश्यकता पर जोर दिया था। इसी विचार से प्रेरित होकर संस्थान ने ऐसे स्नातक उपाधि कार्यक्रम शुरू किए, जिनके माध्यम से विद्यार्थी परिसर में आए बिना भी उच्च गुणवत्ता वाली शिक्षा प्राप्त कर सकते हैं। प्रोफेसर कामकोटि के अनुसार, 'पोर्ट्रेट ऑफ मेनी फेसेस' एक भावनात्मक और विचारोत्तेजक फिल्म है, जो दिखाती है कि शिक्षा को अधिक सुलभ बनाकर स्वामी विवेकानंद के विचारों को व्यवहार में कैसे उतारा जा सकता है।

IIT मद्रास का ऑनलाइन डिग्री कार्यक्रम: आँकड़े और महत्त्व

IIT मद्रास के कई स्नातक उपाधि कार्यक्रम — जिन्हें कैंपस के बाहर से संचालित होने वाला दुनिया का सबसे बड़ा ऑनलाइन उपाधि कार्यक्रम बताया गया है — में वर्तमान में 50,000 से अधिक सक्रिय विद्यार्थी नामांकित हैं। संस्थान के अनुसार, इन कार्यक्रमों में नामांकित 25 प्रतिशत से अधिक विद्यार्थी गरीबी रेखा से नीचे के परिवारों से आते हैं। यह ऐसे समय में महत्त्वपूर्ण है जब सामान्य संयुक्त प्रवेश परीक्षा (JEE) के रास्ते IIT व्यवस्था तक पहुँचना लाखों विद्यार्थियों के लिए संभव नहीं है।

निर्देशक शाश्वत मुखर्जी की यात्रा

फिल्म के निर्देशक शाश्वत मुखर्जी की कहानी स्वयं इस कार्यक्रम की उपयोगिता का प्रमाण है। उन्होंने फिल्म निर्माण में भविष्य बनाने की इच्छा के साथ IIT मद्रास के स्नातक उपाधि कार्यक्रम में दाखिला लिया। कार्यक्रम की लचीली अध्ययन व्यवस्था ने उन्हें पढ़ाई के साथ-साथ एक फिल्म सोसायटी की स्थापना करने, उसका नेतृत्व करने और अंततः दृश्य प्रभाव तकनीक, एआई (AI) तथा फिल्म निर्माण के संयोजन पर काम करने वाला एक नया उद्यम शुरू करने का अवसर दिया।

आगे की राह

प्रोफेसर कामकोटि ने उम्मीद जताई है कि यह फिल्म दुनिया के कोने-कोने तक पहुँचेगी और अन्य शैक्षणिक संस्थान भी ऐसे पाठ्यक्रम शुरू करने के लिए प्रेरित होंगे, ताकि सभी को समान, गुणवत्तापूर्ण और किफायती शिक्षा मिल सके। यह वृत्तचित्र न केवल IIT मद्रास की समावेशी शिक्षा नीति का दस्तावेज़ है, बल्कि भारत में उच्च शिक्षा के लोकतांत्रिकरण की बहस को नई दिशा भी दे सकती है।

संपादकीय दृष्टिकोण

50,000 नामांकित छात्रों और 25% BPL प्रतिनिधित्व के आँकड़े इस कार्यक्रम को नीतिगत वैधता दिलाने का काम करते हैं। गौरतलब है कि JEE की संकरी गली से बाहर उच्च गुणवत्ता की शिक्षा देने का यह प्रयास सराहनीय है, लेकिन असली सवाल यह है कि इन ऑनलाइन स्नातकों को नियोक्ता बाज़ार में कैंपस स्नातकों के समान मान्यता मिल रही है या नहीं। वृत्तचित्र संघर्ष और प्रेरणा की कहानी तो बताती है, पर रोज़गार परिणामों का डेटा सार्वजनिक नहीं किया गया — यही अगला ज़रूरी सवाल है।
RashtraPress
15 अक्टूबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

'पोर्ट्रेट ऑफ मेनी फेसेस' डॉक्युमेंट्री क्या है?
यह IIT मद्रास द्वारा निर्मित एक वृत्तचित्र फिल्म है, जिसमें संस्थान के 17 विद्यार्थियों के उच्च शिक्षा संघर्ष, सपनों और उपलब्धियों को दर्शाया गया है। इसे फिल्म निर्माण कंपनी इरॉस यूनिवर्स के साथ साझेदारी में बनाया गया है और इसका निर्देशन IIT मद्रास के पूर्व छात्र शाश्वत मुखर्जी ने किया है।
IIT मद्रास का ऑनलाइन डिग्री कार्यक्रम क्या है और इसमें कितने विद्यार्थी हैं?
IIT मद्रास का ऑनलाइन स्नातक उपाधि कार्यक्रम एक ऐसी व्यवस्था है जिसमें विद्यार्थी परिसर में आए बिना घर से ही संस्थान के शिक्षकों से पढ़ सकते हैं। संस्थान के अनुसार इसमें 50,000 से अधिक सक्रिय विद्यार्थी नामांकित हैं और इसे कैंपस के बाहर से संचालित दुनिया का सबसे बड़ा ऑनलाइन डिग्री कार्यक्रम बताया गया है।
इस कार्यक्रम में गरीब पृष्ठभूमि के कितने छात्र पढ़ते हैं?
IIT मद्रास के निदेशक प्रोफेसर वी. कामकोटि के अनुसार, इस ऑनलाइन उपाधि कार्यक्रम में नामांकित 25 प्रतिशत से अधिक विद्यार्थी गरीबी रेखा से नीचे के परिवारों से आते हैं। यह कार्यक्रम उन छात्रों के लिए विशेष रूप से उपयोगी है जो JEE के रास्ते IIT में प्रवेश नहीं पा सके।
फिल्म के निर्देशक शाश्वत मुखर्जी कौन हैं?
शाश्वत मुखर्जी IIT मद्रास के पूर्व विद्यार्थी हैं जिन्होंने इसी ऑनलाइन स्नातक उपाधि कार्यक्रम से पढ़ाई की। उन्होंने पढ़ाई के दौरान एक फिल्म सोसायटी की स्थापना की, और बाद में दृश्य प्रभाव तकनीक, AI और फिल्म निर्माण के मेल पर काम करने वाला एक उद्यम भी शुरू किया।
यह डॉक्युमेंट्री किनके लिए महत्त्वपूर्ण है और इसे क्यों बनाया गया?
यह फिल्म उन विद्यार्थियों की प्रेरणा के लिए बनाई गई है जो आर्थिक कठिनाइयों, पारिवारिक जिम्मेदारियों या भौगोलिक दूरी के कारण नियमित कैंपस शिक्षा नहीं पा सकते। प्रोफेसर कामकोटि ने कहा कि यह स्वामी विवेकानंद के शिक्षा को गरीबों तक पहुँचाने के विचार को व्यवहार में उतारने का प्रयास है।
राष्ट्र प्रेस
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