भारतीय वायुसेना का 94वां स्थापना दिवस: 5 वायुवीर जिन्होंने शौर्य से रचा इतिहास
सारांश
मुख्य बातें
भारतीय वायुसेना इस वर्ष 8 अक्टूबर 2026 को अपना 94वां स्थापना दिवस मना रही है। 8 अक्टूबर 1932 को स्थापित यह सेना आज वायु युद्ध, वायु सुरक्षा और वायु चौकसी के क्षेत्र में भारत की सबसे महत्वपूर्ण ढाल है। देश की आज़ादी से पहले इसे 'रॉयल इंडियन एयरफोर्स' के नाम से जाना जाता था; स्वतंत्रता के बाद 'रॉयल' शब्द हटाकर इसे 'इंडियन एयरफोर्स' कर दिया गया। इस ऐतिहासिक अवसर पर उन पाँच वायुवीरों को स्मरण करना अनिवार्य हो जाता है जिन्होंने अपने साहस और बलिदान से आसमान में इतिहास की इबारत लिखी।
मार्शल ऑफ द एयरफोर्स अर्जन सिंह: एक युग का निर्माता
भारतीय वायुसेना के एकमात्र मार्शल ऑफ द एयरफोर्स रहे अर्जन सिंह का जन्म 15 अप्रैल 1919 को ब्रिटिश भारत के पंजाब प्रांत के लायलपुर में हुआ था। मात्र 19 वर्ष की उम्र में उन्हें एम्पायर पायलट प्रशिक्षण पाठ्यक्रम के लिए चुना गया और 1938 में रॉयल एयरफोर्स कॉलेज क्रैनवेल से उनके गौरवशाली करियर की नींव पड़ी। उन्होंने भारतीय कैडेटों के अपने बैच में पाठ्यक्रम में शीर्ष स्थान प्राप्त किया और तैराकी, एथलेटिक्स व हॉकी टीमों में उप-कप्तान की भूमिका निभाई।
द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान बर्मा अभियान में उत्कृष्ट नेतृत्व और अदम्य साहस के लिए उन्हें 1944 में डिस्टिंग्विश्ड फ्लाइंग क्रॉस (DFC) से सम्मानित किया गया। 15 अगस्त 1947 को लाल किले पर 100 से अधिक भारतीय वायुसेना के विमानों के ऐतिहासिक फ्लाईपास्ट का नेतृत्व करने का अनूठा सम्मान उन्हें मिला। उसी दिन उन्होंने ग्रुप कैप्टन के पद पर वायु सेना स्टेशन, अंबाला की कमान संभाली।
1965 के भारत-पाक युद्ध में वायुसेना प्रमुख के रूप में अर्जन सिंह ने भारतीय वायुसेना को चंब में पाकिस्तानी बख्तरबंद बल को कमज़ोर करने, पाकिस्तानी वायुसेना पर हवाई श्रेष्ठता हासिल करने और भारतीय सेना को रणनीतिक जीत दिलाने में सक्षम बनाया। तत्कालीन रक्षा मंत्री वाईबी चव्हाण ने उन्हें 'शांत रूप से कुशल, दृढ़ और अजेय नेता' बताया था। उनके नेतृत्व के सम्मान में CAS के पद को एयर चीफ मार्शल के स्तर पर उन्नत किया गया और वे पहले एयर चीफ मार्शल बने। 16 जुलाई 1969 को सेवानिवृत्ति के बाद उन्होंने स्विट्ज़रलैंड में भारत के राजदूत और केन्या में उच्चायुक्त के रूप में भी सेवाएं दीं। 2002 में उन्हें मार्शल ऑफ द एयरफोर्स की सर्वोच्च उपाधि से नवाज़ा गया। 16 सितंबर 2017 को इस महान वायुवीर का निधन हो गया।
एयर कमांडर मेहर सिंह: श्रीनगर के रक्षक
एयर कमांडर मेहर सिंह का जन्म 20 मार्च 1915 को लायलपुर जिले में हुआ था। उड़ान के प्रति बचपन से ही अनुराग रखने वाले मेहर सिंह 1934 में रॉयल एयर फोर्स कॉलेज क्रैनवेल, इंग्लैंड से जुड़े और अपने असाधारण उड़ान कौशल से साथी वायुसैनिकों का दिल जीता। बाबा मेहर सिंह के नाम से विख्यात इस अफसर ने अनुशासन और स्नेह का अद्वितीय संयोजन किया।
29 वर्ष की आयु में स्क्वाड्रन कमांडर के रूप में उन्हें प्रभावी नेतृत्व और व्यक्तिगत बहादुरी के लिए डिस्टिंग्विश्ड सर्विस ऑर्डर (DSO) से सम्मानित किया गया। उनकी सबसे यादगार उपलब्धि 1948 में डकोटा विमान में भारतीय सेना की पहली टुकड़ी को श्रीनगर ले जाना है, जिसने कश्मीर की रक्षा में निर्णायक भूमिका निभाई। 1948 में सेवानिवृत्ति के बाद 11 मार्च 1952 को एक हवाई दुर्घटना में उनका निधन हो गया।
फ्लाइंग ऑफिसर निर्मलजीत सिंह शेखों: परमवीर चक्र का अमर गान
फ्लाइंग ऑफिसर निर्मलजीत सिंह शेखों का जन्म 17 जुलाई 1945 को पंजाब के लुधियाना जिले के रुर्का गाँव में हुआ था। फ्लाइट लेफ्टिनेंट तरलोचन सिंह शेखों के सुपुत्र निर्मलजीत को 4 जून 1967 को भारतीय वायुसेना की उड़ान शाखा में नियुक्त किया गया।
1971 के युद्ध के दौरान श्रीनगर में तैनात नैट विमान के पायलट शेखों ने अत्यधिक ऊँचाई की चुनौतियों के बीच कश्मीर घाटी की रक्षा का बीड़ा उठाया। 14 दिसंबर 1971 को जब पाकिस्तान के छह 'सेबर' जेट विमानों ने श्रीनगर हवाई अड्डे पर हमला बोला, तो वे विपरीत परिस्थितियों में उड़ान भरकर शत्रु से जा भिड़े। बेहद कम ऊँचाई पर भीषण डॉगफाइट में उनका विमान दुश्मन की गोलाबारी का शिकार हो गया, लेकिन उनके अदम्य साहस ने दुश्मन के हमले को नाकाम कर दिया और श्रीनगर हवाई अड्डे को सुरक्षित रखा। फ्लाइंग ऑफिसर शेखों का यह सर्वोच्च बलिदान भारतीय वायुसेना में वीरता का एक अमर मानक बन गया।
स्क्वाड्रन लीडर अज्जामद बोपय्या देवैया: अज्ञात बलिदान का महावीर
स्क्वाड्रन लीडर अज्जामद बोपय्या देवैया भारतीय वायुसेना के साहसी फाइटर पायलट थे। 1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में उन्हें पाकिस्तान के अत्यंत सुरक्षित सरगोधा हवाई ठिकाने पर हमले का दुस्साहसी मिशन सौंपा गया था। 'मिस्तेरे' विमान में उड़ान भरते हुए उनका रास्ता पाकिस्तान के F-104 स्टार फाइटर ने रोका, लेकिन देवैया ने अपनी बहादुरी का परिचय देते हुए उस पाकिस्तानी जेट को मार गिराया। कथित तौर पर इस दौरान उनका अपना विमान भी क्षतिग्रस्त हो गया और वे पाकिस्तानी क्षेत्र में जा गिरे; उनका शव कभी नहीं मिल पाया। उनकी वीरतापूर्ण शहादत के 23 वर्ष बाद उन्हें मरणोपरांत महावीर चक्र से सम्मानित किया गया। बॉलीवुड फिल्म 'स्काई फोर्स' उन्हीं के जीवन पर आधारित है, जिसमें वीर पहाड़िया ने उनकी भूमिका निभाई।
एयर चीफ मार्शल ओम प्रकाश मेहरा: आधुनिक वायुसेना के शिल्पकार
एयर चीफ मार्शल ओम प्रकाश मेहरा का जन्म 19 जनवरी 1919 को लाहौर में हुआ था। उन्होंने 1933 में सेंट्रल मॉडल स्कूल से स्कूली शिक्षा पूर्ण की और गवर्नमेंट कॉलेज यूनिवर्सिटी, लाहौर में दाखिला लिया। नॉर्दर्न इंडिया फ्लाइंग क्लब, वाल्टन में अनुभव के बाद 30 नवंबर 1940 को वे पायलट अधिकारी के रूप में RIAF में शामिल हुए।
अपने सेवाकाल में उन्होंने प्रतिष्ठित 1 स्क्वाड्रन की कमान संभाली और अंबाला में प्राथमिक उड़ान प्रशिक्षण विद्यालय के कमांडेंट रहे। 1963 में उन्होंने AOC-in-C रखरखाव कमान का पदभार ग्रहण किया और 1965 के युद्ध के दौरान इसी भूमिका में सेवाएं दीं। बाद में वायुसेना उप-प्रमुख और हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) के अध्यक्ष के रूप में भी उन्होंने उल्लेखनीय योगदान दिया। 15 जनवरी 1973 को उन्होंने एयर चीफ मार्शल पीसी लाल के उत्तराधिकारी के रूप में वायुसेना प्रमुख का पदभार संभाला।
इन पाँचों वायुवीरों की वीरगाथाएँ भारतीय वायुसेना की उस अदम्य आत्मा का प्रतीक हैं, जो आज भी अपने उत्तराधिकारियों को प्रेरित करती है। 94वें स्थापना दिवस पर इन महान योद्धाओं को नमन करते हुए भारत उनकी विरासत को आगे बढ़ाने का संकल्प दोहराता है।