परिसीमन पर जयराम रमेश ने रिजिजू से पूछे 3 सवाल: नया प्रस्ताव, सर्वदलीय बैठक और हारा विधेयक
सारांश
मुख्य बातें
कांग्रेस महासचिव और राज्यसभा सदस्य जयराम रमेश ने 20 अक्टूबर 2026 को केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू से परिसीमन (डिलिमिटेशन) मुद्दे पर सरकार की स्थिति को लेकर तीन सीधे और तीखे सवाल दागे, जिनका अब तक सरकार की ओर से कोई स्पष्ट जवाब नहीं आया है। रमेश ने यह सवाल एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर पोस्ट के ज़रिए उठाए, जो उस पत्र जवाब की प्रतिक्रिया में थे जो रिजिजू ने सोमवार को कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के पत्र के उत्तर में लिखा था।
घटनाक्रम की पृष्ठभूमि
16 अक्टूबर 2026 को कांग्रेस अध्यक्ष और राज्यसभा में विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अपना चौथा पत्र लिखकर माँग की कि परिसीमन के किसी भी प्रस्ताव को अंतिम रूप देने से पहले एक सर्वदलीय बैठक बुलाई जाए। इसके जवाब में रिजिजू ने दावा किया कि सरकार ने मार्च और अप्रैल 2026 में कांग्रेस से कई बार संपर्क किया था, लेकिन पार्टी की ओर से चर्चा की कोई तारीख नहीं दी गई।
रिजिजू ने यह भी कहा कि सरकार ने इसके बाद द्रविड़ मुनेत्र कषगम (DMK), समाजवादी पार्टी और शिवसेना (यूबीटी) सहित अन्य दलों से बातचीत करके आम सहमति बनाने की कोशिश की।
रमेश के तीन केंद्रीय सवाल
रमेश ने एक्स पर अपनी पोस्ट में रिजिजू के जवाब का हवाला देते हुए कहा कि मंत्री ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह द्वारा मार्च 2026 में कुछ राजनीतिक दलों के साथ की गई 'चुनिंदा बातचीत' का ज़िक्र किया है। हालाँकि, रमेश के अनुसार, रिजिजू के जवाब में उन वादों का कोई उल्लेख नहीं है जो गृह मंत्री ने उन चर्चाओं के दौरान कथित तौर पर किए थे और जो 16 अप्रैल 2026 को लोकसभा में पेश किए गए संविधान संशोधन विधेयक में शामिल नहीं किए गए।
रमेश ने याद दिलाया कि यह विधेयक 17 अप्रैल 2026 को लोकसभा में पूरी तरह खारिज हो गया था — और उन्हीं दलों ने इसके विरुद्ध मतदान किया जिनसे कथित तौर पर सलाह ली गई थी। इसी आधार पर उन्होंने रिजिजू से तीन सुनिश्चित सवालों का जवाब माँगा।
पहला सवाल: "क्या मोदी सरकार के पास परिसीमन के लिए कोई ठोस 'नया' प्रस्ताव है, जिस पर उसने किसी भी दल के साथ चर्चा की हो?" दूसरा: सरकार इस नए प्रस्ताव पर सभी दलों के साथ पारदर्शी चर्चा के लिए सर्वदलीय बैठक बुलाने से क्यों इनकार कर रही है — खासकर जब खड़गे ने 'एक दो बार नहीं, बल्कि छह बार लिखित रूप में' यह माँग रखी हो — चार बार प्रधानमंत्री के सामने और दो बार खुद रिजिजू के सामने। तीसरा: "क्या मोदी सरकार का इरादा उस हारे हुए विधेयक को वापस लाने और उसे दो तिहाई बहुमत से पास कराने की एक और कोशिश करने का है, जो कि पूरी तरह से विवादित है और जाहिर है, फिर से फेल हो जाएगा?"
सरकार का पक्ष
रिजिजू ने विपक्ष को नज़रअंदाज़ किए जाने के आरोप को खारिज किया और कहा कि सरकार ने व्यापक दलीय परामर्श की पहल की थी। सरकार का तर्क है कि बातचीत की विफलता के लिए कांग्रेस की अनुपस्थिति जिम्मेदार है, न कि सरकार की अनिच्छा।
क्यों महत्वपूर्ण है यह विवाद
परिसीमन का मुद्दा दक्षिणी राज्यों के लिए विशेष रूप से संवेदनशील है, जहाँ तेज जनसंख्या नियंत्रण के कारण लोकसभा सीटों में संभावित कटौती की आशंका है। आलोचकों का कहना है कि उत्तरी राज्यों के पक्ष में झुकाव वाला कोई भी परिसीमन फॉर्मूला संघीय संतुलन को बिगाड़ सकता है। गौरतलब है कि यह विवाद तब और गहरा हो जाता है जब 17 अप्रैल 2026 को पेश विधेयक, जिसे सरकार ने सर्वसम्मति का दावा करते हुए लाया था, उन्हीं दलों के वोटों से गिर गया जिन्हें परामर्श में शामिल बताया गया था।
आगे की राह
कांग्रेस और विपक्षी दलों की सर्वदलीय बैठक की माँग अभी भी लंबित है। सरकार ने अब तक कोई नई बैठक बुलाने की घोषणा नहीं की है। रमेश के तीन सवाल राजनीतिक दबाव बढ़ाने का साफ़ संकेत हैं — और संसद सत्र से पहले परिसीमन प्रक्रिया की पारदर्शिता पर बहस तेज होने की संभावना है।