20 अक्टूबर 2026
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परिसीमन पर जयराम रमेश ने रिजिजू से पूछे 3 सवाल: नया प्रस्ताव, सर्वदलीय बैठक और हारा विधेयक

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परिसीमन पर जयराम रमेश ने रिजिजू से पूछे 3 सवाल: नया प्रस्ताव, सर्वदलीय बैठक और हारा विधेयक

सारांश

परिसीमन पर खड़गे के चौथे पत्र के बाद रिजिजू का जवाब आया — और जयराम रमेश ने उसी जवाब में छेद ढूँढ लिए। तीन सीधे सवाल: नया प्रस्ताव क्या है, सर्वदलीय बैठक से इनकार क्यों, और जो विधेयक एक बार गिर चुका उसे फिर लाने का इरादा है क्या? सरकार फ़िलहाल चुप है।

मुख्य बातें

जयराम रमेश ने 20 अक्टूबर 2026 को एक्स पर पोस्ट कर किरेन रिजिजू से परिसीमन पर 3 सवाल पूछे।
मल्लिकार्जुन खड़गे ने 16 अक्टूबर को प्रधानमंत्री मोदी को चौथा पत्र लिखकर सर्वदलीय बैठक की माँग की थी।
परिसीमन पर संविधान संशोधन विधेयक 17 अप्रैल 2026 को लोकसभा में खारिज हो गया था।
रमेश के अनुसार, खड़गे ने सर्वदलीय बैठक के लिए छह बार लिखित माँग रखी — 4 बार PM को और 2 बार रिजिजू को।
सरकार ने DMK , समाजवादी पार्टी और शिवसेना (यूबीटी) से बातचीत का दावा किया, लेकिन वे दल भी विधेयक के विरुद्ध वोट दे चुके हैं।

कांग्रेस महासचिव और राज्यसभा सदस्य जयराम रमेश ने 20 अक्टूबर 2026 को केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू से परिसीमन (डिलिमिटेशन) मुद्दे पर सरकार की स्थिति को लेकर तीन सीधे और तीखे सवाल दागे, जिनका अब तक सरकार की ओर से कोई स्पष्ट जवाब नहीं आया है। रमेश ने यह सवाल एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर पोस्ट के ज़रिए उठाए, जो उस पत्र जवाब की प्रतिक्रिया में थे जो रिजिजू ने सोमवार को कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के पत्र के उत्तर में लिखा था।

घटनाक्रम की पृष्ठभूमि

16 अक्टूबर 2026 को कांग्रेस अध्यक्ष और राज्यसभा में विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अपना चौथा पत्र लिखकर माँग की कि परिसीमन के किसी भी प्रस्ताव को अंतिम रूप देने से पहले एक सर्वदलीय बैठक बुलाई जाए। इसके जवाब में रिजिजू ने दावा किया कि सरकार ने मार्च और अप्रैल 2026 में कांग्रेस से कई बार संपर्क किया था, लेकिन पार्टी की ओर से चर्चा की कोई तारीख नहीं दी गई।

रिजिजू ने यह भी कहा कि सरकार ने इसके बाद द्रविड़ मुनेत्र कषगम (DMK), समाजवादी पार्टी और शिवसेना (यूबीटी) सहित अन्य दलों से बातचीत करके आम सहमति बनाने की कोशिश की।

रमेश के तीन केंद्रीय सवाल

रमेश ने एक्स पर अपनी पोस्ट में रिजिजू के जवाब का हवाला देते हुए कहा कि मंत्री ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह द्वारा मार्च 2026 में कुछ राजनीतिक दलों के साथ की गई 'चुनिंदा बातचीत' का ज़िक्र किया है। हालाँकि, रमेश के अनुसार, रिजिजू के जवाब में उन वादों का कोई उल्लेख नहीं है जो गृह मंत्री ने उन चर्चाओं के दौरान कथित तौर पर किए थे और जो 16 अप्रैल 2026 को लोकसभा में पेश किए गए संविधान संशोधन विधेयक में शामिल नहीं किए गए।

रमेश ने याद दिलाया कि यह विधेयक 17 अप्रैल 2026 को लोकसभा में पूरी तरह खारिज हो गया था — और उन्हीं दलों ने इसके विरुद्ध मतदान किया जिनसे कथित तौर पर सलाह ली गई थी। इसी आधार पर उन्होंने रिजिजू से तीन सुनिश्चित सवालों का जवाब माँगा।

पहला सवाल: "क्या मोदी सरकार के पास परिसीमन के लिए कोई ठोस 'नया' प्रस्ताव है, जिस पर उसने किसी भी दल के साथ चर्चा की हो?" दूसरा: सरकार इस नए प्रस्ताव पर सभी दलों के साथ पारदर्शी चर्चा के लिए सर्वदलीय बैठक बुलाने से क्यों इनकार कर रही है — खासकर जब खड़गे ने 'एक दो बार नहीं, बल्कि छह बार लिखित रूप में' यह माँग रखी हो — चार बार प्रधानमंत्री के सामने और दो बार खुद रिजिजू के सामने। तीसरा: "क्या मोदी सरकार का इरादा उस हारे हुए विधेयक को वापस लाने और उसे दो तिहाई बहुमत से पास कराने की एक और कोशिश करने का है, जो कि पूरी तरह से विवादित है और जाहिर है, फिर से फेल हो जाएगा?"

सरकार का पक्ष

रिजिजू ने विपक्ष को नज़रअंदाज़ किए जाने के आरोप को खारिज किया और कहा कि सरकार ने व्यापक दलीय परामर्श की पहल की थी। सरकार का तर्क है कि बातचीत की विफलता के लिए कांग्रेस की अनुपस्थिति जिम्मेदार है, न कि सरकार की अनिच्छा।

क्यों महत्वपूर्ण है यह विवाद

परिसीमन का मुद्दा दक्षिणी राज्यों के लिए विशेष रूप से संवेदनशील है, जहाँ तेज जनसंख्या नियंत्रण के कारण लोकसभा सीटों में संभावित कटौती की आशंका है। आलोचकों का कहना है कि उत्तरी राज्यों के पक्ष में झुकाव वाला कोई भी परिसीमन फॉर्मूला संघीय संतुलन को बिगाड़ सकता है। गौरतलब है कि यह विवाद तब और गहरा हो जाता है जब 17 अप्रैल 2026 को पेश विधेयक, जिसे सरकार ने सर्वसम्मति का दावा करते हुए लाया था, उन्हीं दलों के वोटों से गिर गया जिन्हें परामर्श में शामिल बताया गया था।

आगे की राह

कांग्रेस और विपक्षी दलों की सर्वदलीय बैठक की माँग अभी भी लंबित है। सरकार ने अब तक कोई नई बैठक बुलाने की घोषणा नहीं की है। रमेश के तीन सवाल राजनीतिक दबाव बढ़ाने का साफ़ संकेत हैं — और संसद सत्र से पहले परिसीमन प्रक्रिया की पारदर्शिता पर बहस तेज होने की संभावना है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन जिन दलों से बातचीत हुई उन्होंने ही विधेयक को गिरा दिया। यह विरोधाभास मूल समस्या को रेखांकित करता है: परामर्श की प्रक्रिया और सहमति के बीच भारी अंतर है। दक्षिणी राज्यों की जनसंख्या आधारित आपत्तियाँ इस विवाद को महज़ राजनीतिक नहीं, बल्कि संवैधानिक बनाती हैं। जब तक सरकार एक पारदर्शी और समावेशी प्रक्रिया नहीं अपनाती, हर अगला विधेयक भी उसी हश्र का सामना करेगा।
RashtraPress
20 अक्टूबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

जयराम रमेश ने किरेन रिजिजू से परिसीमन पर क्या सवाल पूछे?
रमेश ने तीन सवाल पूछे: क्या सरकार के पास परिसीमन का कोई नया ठोस प्रस्ताव है; वह सर्वदलीय बैठक बुलाने से क्यों इनकार कर रही है; और क्या सरकार उस विधेयक को फिर से लाने की योजना बना रही है जो पहले ही लोकसभा में खारिज हो चुका है।
परिसीमन पर संविधान संशोधन विधेयक क्यों गिरा?
यह विधेयक 17 अप्रैल 2026 को लोकसभा में पेश किया गया था और उसी दिन खारिज हो गया। रमेश के अनुसार, उन्हीं दलों ने इसके विरुद्ध मतदान किया जिनसे सरकार ने पहले 'सलाह' ली थी — जो सरकार के सर्वसम्मति के दावे को कमज़ोर करता है।
खड़गे ने परिसीमन पर कितनी बार सरकार को पत्र लिखा?
कांग्रेस नेता जयराम रमेश के अनुसार, मल्लिकार्जुन खड़गे ने सर्वदलीय बैठक की माँग को लेकर छह बार लिखित रूप में अनुरोध किया — चार बार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को और दो बार संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू को। 16 अक्टूबर 2026 का पत्र इस क्रम में मोदी को चौथा था।
सरकार ने परिसीमन पर किन दलों से बात की?
केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू के अनुसार, सरकार ने DMK, समाजवादी पार्टी और शिवसेना (यूबीटी) सहित कई दलों से बातचीत की। हालाँकि, रमेश ने बताया कि इनमें से अधिकांश दलों ने बाद में लोकसभा में परिसीमन विधेयक के विरुद्ध मतदान किया।
परिसीमन का मुद्दा दक्षिण भारत के लिए क्यों संवेदनशील है?
जनसंख्या के आधार पर लोकसभा सीटों के पुनर्वितरण से दक्षिणी राज्यों — जिन्होंने बेहतर जनसंख्या नियंत्रण किया है — की सीटें घट सकती हैं, जबकि उत्तरी राज्यों की बढ़ सकती हैं। आलोचकों का कहना है कि यह संघीय संतुलन को बिगाड़ेगा और दक्षिण के राजनीतिक प्रतिनिधित्व को कमज़ोर करेगा।
राष्ट्र प्रेस
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