जयशंकर का चिन्मय मिशन सम्मेलन में कड़ा संदेश: युद्ध कहीं भी हो, शांति सर्वत्र खतरे में
सारांश
मुख्य बातें
विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने 25 अक्टूबर 2026 को नई दिल्ली के भारत मंडपम में आयोजित चिन्मय मिशन ग्लोबल सम्मेलन को संबोधित करते हुए कहा कि दुनिया में कहीं भी होने वाला युद्ध वैश्विक शांति के लिए खतरा बन जाता है। उन्होंने आतंकवाद को राज्य की नीति के साधन के रूप में इस्तेमाल करने को 'किसी भी परिस्थिति में अस्वीकार्य' बताया और अंतरराष्ट्रीय समुदाय से शून्य सहिष्णुता की नीति अपनाने का आह्वान किया।
सम्मेलन की पृष्ठभूमि
यह तीन दिवसीय सम्मेलन चिन्मय मिशन की स्थापना के 75 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में साल भर चले आयोजनों के समापन का हिस्सा था। सम्मेलन का उद्घाटन 23 अक्टूबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किया था, जिन्होंने मिशन की यात्रा को विकसित भारत 2047 के लक्ष्य से जोड़ा था।
जयशंकर ने अपने संबोधन की शुरुआत सम्मेलन की थीम 'अद्वैत' से की। उन्होंने कहा, 'हमारे इस सम्मेलन का थीम अद्वैत है। जिसका सामान्य अर्थ हमारे अस्तित्व को एक वास्तविकता के रूप में स्वीकार करना है। हम सभी से आग्रह करते हैं कि हम दुनिया को "दूसरों" पर ध्यान केंद्रित करने के नज़रिए से न देखें।'
वैश्विक संघर्षों पर चिंता
वैश्विक व्यवस्था में सहयोग और प्रतिस्पर्धा के बीच बहस का उल्लेख करते हुए जयशंकर ने कहा कि आज की गहराई से जुड़ी दुनिया में किसी एक क्षेत्र का संघर्ष वैश्विक शांति, आर्थिक समृद्धि और विकास को भी प्रभावित करता है। उन्होंने वर्तमान में जारी दो बड़े संघर्षों — यूक्रेन और पश्चिम एशिया (मध्य पूर्व) — का उल्लेख करते हुए कहा कि 'संघर्ष और हिंसा दुनिया की प्रगति को बाधित करते हैं।'
उन्होंने संवाद और कूटनीति पर ज़ोर देते हुए कहा, 'जब हम यह कहते हैं कि संवाद और कूटनीति ही एकमात्र समाधान है, तो भारत पूरी दुनिया की भावना को ही व्यक्त कर रहा होता है।' उनका यह वक्तव्य ऐसे समय में महत्वपूर्ण है जब वैश्विक स्तर पर शांति प्रयासों में गतिरोध बना हुआ है।
आतंकवाद पर कड़ा रुख
आतंकवाद के मसले पर जयशंकर ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि 'यह शांति के लिए एक घातक खतरा है।' उन्होंने उन देशों पर परोक्ष निशाना साधा जो आतंकवाद को पनपने देते हैं और शून्य सहिष्णुता की नीति पर काम नहीं करना चाहते। उनके अनुसार, ऐतिहासिक अनुभवों से सबक लेने की जगह राजनीतिक हितों को प्राथमिकता देना वैश्विक सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा है।
गौरतलब है कि यह भारत की उस दीर्घकालिक कूटनीतिक स्थिति को रेखांकित करता है जिसमें 'आतंकवाद के प्रायोजकों' को बिना नाम लिए उजागर किया जाता है — एक संदेश जो पड़ोसी देश पाकिस्तान पर स्पष्ट रूप से लक्षित माना जाता है।
एआई और वैश्विक समावेश
विदेश मंत्री ने कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) पर भी अपना दृष्टिकोण साझा किया। उन्होंने कहा कि 'एआई सभी बदलावों की जड़ बनने की क्षमता रखता है, लेकिन इसे केवल कुछ ही लोगों के हाथों में नहीं छोड़ा जा सकता।' भारत ने एआई के संदर्भ में 'ज़िम्मेदार, समावेशी और मानव केंद्रित दृष्टिकोण' का समर्थन किया।
उन्होंने कोविड महामारी के दौरान भारत की भूमिका का उल्लेख करते हुए कहा कि जब देश में स्वयं टीकाकरण अभियान चल रहा था, तब भी भारत ने उन देशों को वैक्सीन देने का फैसला किया जो पीछे छूट सकते थे — यह 'वसुधैव कुटुंबकम' के सिद्धांत को व्यवहार में लाने का उदाहरण है।
संयुक्त राष्ट्र सुधार और बहुपक्षवाद
जयशंकर ने संयुक्त राष्ट्र के संदर्भ में 'सुधारवादी बहुपक्षवाद' की बढ़ती माँग का उल्लेख किया। उनके अनुसार, 'दुनिया के बड़े हिस्सों को निर्णय लेने की प्रक्रिया से बाहर नहीं रखा जा सकता।' उन्होंने संयुक्त राष्ट्र से वैश्विक संकटों में महज दर्शक बने रहने के बजाय नेतृत्व दिखाने का आग्रह किया — एक ऐसा आह्वान जो संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता के भारत के दावे की पृष्ठभूमि में और भी अहम हो जाता है।