जैव विविधता दिवस 2026: 10 लाख प्रजातियाँ खतरे में, धरती के अस्तित्व की वैश्विक चेतावनी
सारांश
मुख्य बातें
22 मई 2026 को दुनिया भर में अंतर्राष्ट्रीय जैव विविधता दिवस मनाया जा रहा है — एक ऐसे समय में जब वैज्ञानिक चेतावनी दे रहे हैं कि पृथ्वी पर मौजूद अनुमानित 80 लाख प्रजातियों में से करीब 10 लाख प्रजातियाँ विलुप्त होने के कगार पर हैं। जलवायु परिवर्तन, प्रदूषण और प्राकृतिक संसाधनों के अनियंत्रित दोहन के बीच यह दिवस केवल एक औपचारिकता नहीं, बल्कि मानव सभ्यता के भविष्य को लेकर एक तीखी चेतावनी बन चुका है।
जैव विविधता का दायरा और महत्व
जैव विविधता केवल जंगलों के जानवरों या दुर्लभ पौधों तक सीमित नहीं है। इसमें फसलों की विभिन्न किस्में, पशुधन की नस्लें और झीलों, जंगलों, रेगिस्तानों तथा कृषि परिदृश्यों जैसे विविध पारिस्थितिक तंत्र भी शामिल हैं। यह विविधता मानव जीवन की आधारशिला है — मछलियाँ दुनिया के करीब 3 अरब लोगों को 20 प्रतिशत पशु प्रोटीन उपलब्ध कराती हैं, जबकि मानव आहार का 80 प्रतिशत से अधिक हिस्सा पौधों से प्राप्त होता है।
विकासशील देशों के ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले लगभग 80 प्रतिशत लोग बुनियादी स्वास्थ्य सेवाओं के लिए आज भी पारंपरिक वनस्पति-आधारित दवाओं पर निर्भर हैं। यही कारण है कि जैव विविधता का क्षरण केवल पर्यावरणीय नहीं, बल्कि एक गहरा सामाजिक-आर्थिक संकट भी है।
स्वास्थ्य और महामारी से सीधा संबंध
वैज्ञानिक शोध यह स्थापित कर चुके हैं कि जैव विविधता में कमी आने से जानवरों से मनुष्यों में फैलने वाली बीमारियों — यानी जूनोटिक बीमारियों — का खतरा बढ़ता है। स्वस्थ पारिस्थितिक तंत्र बीमारियों के प्रसार को नियंत्रित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। आंकड़ों के अनुसार, यदि जैव विविधता सुरक्षित रहती है, तो यह कोरोना जैसी महामारियों की रोकथाम में भी सहायक हो सकती है।
यह ऐसे समय में विशेष रूप से प्रासंगिक है जब वैश्विक स्वास्थ्य तंत्र अगली महामारी की संभावना को लेकर सतर्क है। गौरतलब है कि पिछले तीन दशकों में उभरी अधिकांश संक्रामक बीमारियाँ पशु-मानव संपर्क से जुड़ी रही हैं।
कृषि और जल संसाधनों पर असर
जैव विविधता कृषि उत्पादकता की रीढ़ है। यह परागण, कीट नियंत्रण, पोषक तत्वों के चक्र और कार्बन अवशोषण जैसी अनिवार्य इकोसिस्टम सेवाएँ प्रदान करती है। नदी किनारे के जंगल प्राकृतिक जल-फिल्टर की तरह काम करते हैं, भूजल को पुनर्भरित करते हैं और मिट्टी की उर्वरता बनाए रखते हैं।
वहीं, औद्योगिक खेती और फैक्ट्री फार्मिंग जैव विविधता के नुकसान का प्रमुख कारण बन चुकी हैं। वैश्विक स्तर पर भूमि उपयोग में होने वाले 80 प्रतिशत बदलाव के लिए कृषि क्षेत्र को जिम्मेदार माना जाता है। ब्राजील सहित कई देशों में पशुधन के चारे के लिए सोयाबीन उगाने हेतु बड़े पैमाने पर जंगलों की कटाई हो रही है, जिससे अमेज़न वर्षावन जैसे अमूल्य पारिस्थितिक तंत्र खतरे में हैं।
वन्यजीवों का व्यावसायिक दोहन: एक बड़ा खतरा
पर्यटन, पारंपरिक चिकित्सा और वन्यजीव पालन जैसे उद्योग जानवरों को उनके प्राकृतिक आवास से अलग कर रहे हैं। इससे पारिस्थितिक संतुलन बिगड़ता है और प्रजातियों के विलुप्त होने की रफ्तार तेज होती है। बढ़ती माँग अवैध वन्यजीव व्यापार को बढ़ावा देती है और आक्रामक प्रजातियों के प्रसार का कारण बनती है।
हालांकि, उम्मीद पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। दुनिया भर में ऐसे प्रयास जारी हैं जो लुप्तप्राय पारिस्थितिक तंत्रों को पुनर्जीवित करने पर केंद्रित हैं, और कई संकटग्रस्त स्तनधारी, सरीसृप तथा पक्षी प्रजातियाँ विलुप्त होने के कगार से वापस लौट रही हैं।
संयुक्त राष्ट्र की पहल और आगे की राह
संयुक्त राष्ट्र ने इसी गंभीरता को देखते हुए प्रतिवर्ष 22 मई को अंतर्राष्ट्रीय जैव विविधता दिवस मनाने का निर्णय लिया, ताकि लोगों में यह समझ विकसित हो कि यह केवल पर्यावरण का नहीं, बल्कि जीवन, स्वास्थ्य, भोजन, जल और भविष्य की सुरक्षा से जुड़ा मुद्दा है। विशेषज्ञों का कहना है कि वन्यजीवों के वस्तुकरण को रोकना, टिकाऊ कृषि को बढ़ावा देना और पारिस्थितिक तंत्रों की बहाली को नीतिगत प्राथमिकता देना अब विकल्प नहीं, अनिवार्यता बन चुकी है।