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झारखंड हाईकोर्ट में JPSC परीक्षा रद्द मामले की सुनवाई पूरी, फैसला सुरक्षित — सरकार पर उठे गंभीर सवाल

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झारखंड हाईकोर्ट में JPSC परीक्षा रद्द मामले की सुनवाई पूरी, फैसला सुरक्षित — सरकार पर उठे गंभीर सवाल

सारांश

झारखंड हाईकोर्ट में JPSC परीक्षा रद्द मामले की सुनवाई पूरी, फैसला सुरक्षित। सरकार ने महज 5 मिनट में बहस समेटी, हलफनामे में सबूत नहीं — याचिकाकर्ताओं का दावा, रद्द करने के दिन सरकार के पास पर्याप्त साक्ष्य ही नहीं थे। हज़ारों सफल उम्मीदवारों का भविष्य अदालत के फैसले पर टिका।

मुख्य बातें

झारखंड हाईकोर्ट में 11वीं से 13वीं जेपीएससी परीक्षा रद्द मामले की सुनवाई 12 अक्टूबर 2026 को पूरी; फैसला सुरक्षित।
राज्य सरकार ने पूरी बहस महज 5 मिनट में समेटी; दायर हलफनामे में कोई सबूत या अनुलग्नक नहीं था।
याचिकाकर्ताओं का तर्क — रद्द करने की अधिसूचना जाँच शुरू होने से पहले जारी हुई, यानी रद्दीकरण के दिन पर्याप्त साक्ष्य नहीं थे।
टीडीपीएल की जेपीएससी में कथित संलिप्तता की सीमा और स्तर की स्वतंत्र जाँच की माँग उठाई गई।
सरकार ने एक अतिरिक्त रिपोर्ट और कैबिनेट रिपोर्ट सीलबंद लिफाफे में अदालत के समक्ष पेश की।
अदालत ने स्वयं टिप्पणी की कि जाँच अब तक अधूरी है और यह कितने वर्षों तक चलती रहेगी।

झारखंड हाईकोर्ट में 11वीं से 13वीं जेपीएससी (JPSC) परीक्षा रद्द किए जाने के मामले में 12 अक्टूबर 2026 को सुनवाई पूरी हो गई और अदालत ने अपना फैसला सुरक्षित रख लिया। सुनवाई के दौरान हस्तक्षेपकर्ताओं ने राज्य सरकार पर गंभीर आरोप लगाए — सरकार की ओर से पूरी बहस महज 5 मिनट में समेट ली गई और दायर हलफनामे में कोई ठोस सबूत या अनुलग्नक नहीं था। याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि परीक्षा रद्द करने की अधिसूचना जारी होने के बाद जाँच शुरू हुई, जिसका अर्थ है कि रद्द करने के दिन सरकार के पास पर्याप्त साक्ष्य ही नहीं थे।

मुख्य घटनाक्रम

सुनवाई के दौरान सफल उम्मीदवारों की ओर से हस्तक्षेपकर्ता के अधिवक्ता कुमार हर्ष ने अदालत के सामने कहा, 'राज्य सरकार ने अपनी पूरी बहस खत्म करने में मात्र 5 मिनट लिए। उनके द्वारा दायर किए गए हलफनामे में कोई सबूत या अनुलग्नक नहीं था।' उन्होंने यह भी कहा कि जो भी साक्ष्य सामने आ रहे हैं, उन्हें अदालत के सामने रखना राज्य सरकार की जिम्मेदारी और कर्तव्य है।

अधिवक्ता हर्ष ने पारदर्शिता और जवाबदेही पर ज़ोर देते हुए कहा कि अदालत ने स्वयं यह टिप्पणी की कि जाँच कितने वर्षों तक चलती रहेगी, क्योंकि यह अब तक अधूरी है। उनके अनुसार, इसके लिए राज्य सरकार सीधे जिम्मेदार है।

याचिकाकर्ताओं की दलीलें

याचिकाकर्ता के अधिवक्ता अमृतांश वत्स पार्थी ने कहा कि 11वीं से 13वीं जेपीएससी और खाद्य सुरक्षा अधिकारी — दोनों मामलों में अधिसूचना जारी होने के बाद ही जाँच शुरू हुई। खाद्य सुरक्षा अधिकारी मामले में तो अधिसूचना के बावजूद जाँच शुरू ही नहीं हुई।

उन्होंने तर्क दिया, 'इसका सीधा अर्थ है कि जिस दिन परीक्षा रद्द की गई, उस दिन सरकार के पास पर्याप्त सबूत नहीं थे।' उन्होंने टीडीपीएल की जेपीएससी में कथित संलिप्तता की सीमा और स्तर की भी पड़ताल की माँग रखी और कहा कि इस पहलू की भी स्वतंत्र जाँच होनी चाहिए।

सरकार की प्रस्तुति

सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से पेश हुए अधिवक्ताओं ने अपनी दलीलें रखीं। इसके अतिरिक्त एक अतिरिक्त रिपोर्ट और कैबिनेट रिपोर्ट भी सीलबंद लिफाफे में अदालत के समक्ष पेश की गई। इसके बाद हस्तक्षेपकर्ताओं की ओर से बहस हुई और अंत में सभी पक्षों की दलीलें पूरी होने पर अदालत ने फैसला सुरक्षित रख लिया।

गौरतलब है कि अधिवक्ता पार्थी ने यह भी स्पष्ट किया कि सरकारी हलफनामा अभी तक उनके द्वारा पढ़ा नहीं गया है और उसकी विस्तृत समीक्षा के बाद ही उसकी विषयवस्तु पर टिप्पणी संभव होगी।

आम उम्मीदवारों पर असर

यह मामला उन हज़ारों उम्मीदवारों के भविष्य से जुड़ा है जो 11वीं से 13वीं जेपीएससी में सफल हुए थे। परीक्षा रद्द होने से उनकी नियुक्ति प्रक्रिया ठप पड़ी है। यह ऐसे समय में आया है जब झारखंड में सरकारी नौकरियों को लेकर युवाओं में पहले से ही गहरी बेचैनी है।

आलोचकों का कहना है कि राज्य सरकार की ओर से ढीली पैरवी और हलफनामे में सबूतों का अभाव न केवल अदालत में सरकार की स्थिति को कमज़ोर करता है, बल्कि सफल उम्मीदवारों के न्याय पाने की उम्मीदों पर भी सवाल खड़ा करता है।

क्या होगा आगे

अब सभी की नज़रें झारखंड हाईकोर्ट के उस फैसले पर टिकी हैं जो सुरक्षित रख लिया गया है। यदि अदालत परीक्षा रद्द करने के निर्णय को बरकरार रखती है, तो सफल उम्मीदवारों की नियुक्ति की उम्मीदें धूमिल हो जाएँगी। दूसरी ओर, यदि रद्दीकरण को असंवैधानिक या प्रक्रियागत रूप से त्रुटिपूर्ण माना जाता है, तो नियुक्ति प्रक्रिया पर पुनर्विचार का रास्ता खुल सकता है। जाँच की अधूरी स्थिति और सरकार की कमज़ोर पैरवी इस फैसले को और अधिक निर्णायक बना देती है।

संपादकीय दृष्टिकोण

तो क्या यह निर्णय विधिसम्मत प्रक्रिया के बजाय राजनीतिक दबाव में लिया गया था? टीडीपीएल की संलिप्तता की जाँच का अधूरा रहना और सरकार का ढीला रवैया मिलकर एक ऐसा चित्र बनाते हैं जो न्यायिक जवाबदेही की माँग करता है — और हाईकोर्ट का आगामी फैसला झारखंड में भर्ती प्रक्रियाओं की विश्वसनीयता के लिए एक मिसाल बनेगा।
RashtraPress
13 अक्टूबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

झारखंड हाईकोर्ट में JPSC परीक्षा रद्द मामले में क्या हुआ?
12 अक्टूबर 2026 को झारखंड हाईकोर्ट में 11वीं से 13वीं जेपीएससी परीक्षा रद्द किए जाने के मामले में सभी पक्षों की बहस पूरी हो गई और अदालत ने फैसला सुरक्षित रख लिया। राज्य सरकार ने मात्र 5 मिनट में बहस समेटी और हलफनामे में कोई ठोस सबूत नहीं था।
याचिकाकर्ताओं का मुख्य तर्क क्या था?
याचिकाकर्ताओं का कहना है कि परीक्षा रद्द करने की अधिसूचना जारी होने के बाद ही जाँच शुरू हुई, यानी रद्दीकरण के दिन सरकार के पास पर्याप्त साक्ष्य नहीं थे। इसके अलावा, टीडीपीएल की कथित संलिप्तता की सीमा की भी स्वतंत्र जाँच की माँग रखी गई।
सरकार की ओर से क्या प्रस्तुत किया गया?
सरकार की ओर से एक अतिरिक्त रिपोर्ट और कैबिनेट रिपोर्ट सीलबंद लिफाफे में अदालत के समक्ष पेश की गई। हालाँकि, हस्तक्षेपकर्ताओं ने आरोप लगाया कि दायर हलफनामे में कोई सबूत या अनुलग्नक नहीं था।
इस मामले से कौन प्रभावित हो रहे हैं?
वे हज़ारों उम्मीदवार प्रभावित हैं जो 11वीं से 13वीं जेपीएससी परीक्षाओं में सफल घोषित हुए थे। परीक्षा रद्द होने से उनकी नियुक्ति प्रक्रिया रुकी हुई है और उनका करियर अदालत के आगामी फैसले पर निर्भर है।
अदालत का फैसला कब आ सकता है और इसका क्या महत्व है?
फैसले की तिथि अभी घोषित नहीं हुई है क्योंकि अदालत ने इसे सुरक्षित रख लिया है। यह फैसला महत्वपूर्ण है क्योंकि यह तय करेगा कि परीक्षा रद्द करना वैध था या नहीं, और इससे झारखंड में सरकारी भर्ती प्रक्रियाओं की भविष्य की दिशा भी प्रभावित होगी।
राष्ट्र प्रेस
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