झारखंड हाईकोर्ट में JPSC परीक्षा रद्द मामला: सरकार ने कहा — सीआईडी जांच में उजागर हुई व्यापक अनियमितताएं
सारांश
मुख्य बातें
झारखंड हाईकोर्ट में 9 अक्टूबर 2026 को न्यायमूर्ति दीपक रोशन की अदालत में जेपीएससी (JPSC) की तीन प्रमुख भर्ती परीक्षाओं — सिविल सेवा परीक्षा-2023, बाल विकास परियोजना पदाधिकारी (CDPO) और फूड सेफ्टी ऑफिसर — की नियुक्तियाँ रद्द करने के झारखंड सरकार के फैसले के विरुद्ध दाखिल याचिकाओं पर सुनवाई हुई। राज्य सरकार ने अदालत को बताया कि सीआईडी (CID) दस्तावेजों सहित जाँच में इन परीक्षाओं में बड़े पैमाने पर गड़बड़ियाँ सामने आई हैं, जिसके चलते नियुक्तियाँ रद्द करना अनिवार्य हो गया। मामले में अगली सुनवाई सोमवार, 13 अक्टूबर 2026 को दोपहर 2:15 बजे IST निर्धारित है।
सरकार का पक्ष: अनियमितताओं की पुष्टि
झारखंड सरकार की ओर से अदालत में तर्क दिया गया कि जाँच के दौरान आउटसोर्सिंग एजेंसी टीडीपीएल (TDPL) की कथित संलिप्तता सहित व्यापक अनियमितताएं प्रकाश में आई हैं। सरकार के अनुसार, सीआईडी दस्तावेज भी इन गड़बड़ियों की पुष्टि करते हैं।
सरकार ने यह भी दलील दी कि जब परीक्षा प्रक्रिया में इस स्तर की अनियमितता हो, तो सफल अभ्यर्थियों में दोषी और निर्दोष को अलग कर पाना व्यावहारिक रूप से संभव नहीं है। इसी आधार पर राज्य सरकार ने तीनों भर्तियाँ निरस्त करने का अधिकार अपने पास होने का दावा किया।
याचिकाकर्ताओं की दलीलें: प्रक्रिया पर सवाल
याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता अमृतांश वत्स और इंद्रजीत सिन्हा ने सरकार के फैसले को चुनौती देते हुए कहा कि टीडीपीएल इन परीक्षाओं की चयन प्रक्रिया के अंतिम चरण में — जुलाई 2025 में — शामिल हुई थी, जब केवल दस्तावेजों का सत्यापन चल रहा था। ऐसे में पूरी नियुक्ति प्रक्रिया को एजेंसी की संलिप्तता से नहीं जोड़ा जा सकता।
याचिकाकर्ताओं के वकीलों ने यह भी रेखांकित किया कि इन तीनों परीक्षाओं के संदर्भ में अब तक कोई प्राथमिकी (FIR) दर्ज नहीं हुई, किसी अभ्यर्थी को समन नहीं किया गया और किसी की गिरफ्तारी नहीं हुई है। इसके अतिरिक्त, सफल अभ्यर्थियों के विरुद्ध कोई मनी ट्रेल या वित्तीय लेनदेन का प्रमाण भी सामने नहीं आया है।
संवैधानिक प्रश्न: किसके पास है रद्द करने का अधिकार?
अधिवक्ता अमृतांश वत्स ने अदालत के समक्ष एक महत्वपूर्ण संवैधानिक प्रश्न उठाया — परीक्षा और विज्ञापन रद्द करने का अधिकार संबंधित आयोग, यानी जेपीएससी (JPSC) या जेएसएससी (JSSC) के पास है, न कि सीधे राज्य सरकार के पास। उनके अनुसार, राज्य सरकार नियुक्ति आदेश निरस्त कर सकती है, परंतु उसके लिए निर्धारित संवैधानिक प्रक्रिया का पालन अनिवार्य है।
याचिकाकर्ताओं ने आरोप लगाया कि सरकार ने जल्दबाजी में यह फैसला लिया और ऐसा करते हुए प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों की अनदेखी की गई।
कौन-सी भर्तियाँ हैं विवाद में
इन याचिकाओं में तीन भर्तियों को रद्द करने के फैसले को चुनौती दी गई है — सिविल सेवा परीक्षा-2023 (विज्ञापन संख्या 01/2024), फूड सेफ्टी ऑफिसर भर्ती (विज्ञापन संख्या 18/2023), और सीडीपीओ भर्ती (विज्ञापन संख्या 21/2023)।
गौरतलब है कि ये भर्तियाँ झारखंड में सरकारी सेवाओं में प्रवेश के प्रमुख मार्ग हैं और इनसे बड़ी संख्या में युवा अभ्यर्थी प्रभावित होते हैं।
आगे क्या होगा
न्यायमूर्ति दीपक रोशन की अदालत में सोमवार, 13 अक्टूबर 2026 को हस्तक्षेपकर्ता की ओर से बहस होनी है। अदालत के अगले आदेश से यह स्पष्ट होगा कि सरकार की अधिसूचना कानूनी कसौटी पर खरी उतरती है या नहीं। यह मामला झारखंड में सार्वजनिक भर्ती प्रक्रिया की विश्वसनीयता और संवैधानिक मर्यादाओं की परीक्षा लेने वाला बन चुका है।