12 अक्टूबर 2026
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झारखंड हाईकोर्ट ने जेपीएससी की तीन परीक्षाओं की नियुक्ति रद्द आदेश पर फैसला सुरक्षित रखा

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झारखंड हाईकोर्ट ने जेपीएससी की तीन परीक्षाओं की नियुक्ति रद्द आदेश पर फैसला सुरक्षित रखा

सारांश

झारखंड हाईकोर्ट ने जेपीएससी की तीन परीक्षाओं की नियुक्तियाँ रद्द करने के सरकारी आदेश पर फैसला सुरक्षित रखा। ₹50-50 लाख में उत्तीर्ण कराने के आरोप, सीआईडी की गिरफ्तारियाँ, और सैकड़ों अभ्यर्थियों का भविष्य अधर में — अदालत का केंद्रीय सवाल है: क्या दोषी और निर्दोष में फर्क अब भी संभव है?

मुख्य बातें

झारखंड हाईकोर्ट ने 12 अक्टूबर 2026 को जेपीएससी की तीन परीक्षाओं की नियुक्तियाँ रद्द करने के सरकारी आदेश पर फैसला सुरक्षित रखा।
न्यायमूर्ति दीपक रोशन ने सभी पक्षों को गुरुवार तक संक्षिप्त लिखित नोट दाखिल करने का निर्देश दिया।
हस्तक्षेपकर्ता के अधिवक्ता ने आरोप लगाया कि टीडीपीएल के माध्यम से कथित तौर पर ₹50-50 लाख लेकर अभ्यर्थियों को उत्तीर्ण कराया गया।
सीआईडी जाँच में कई गिरफ्तारियाँ हो चुकी हैं; सरकार ने अदालत में सीलबंद रिपोर्ट पेश की।
प्रार्थियों का तर्क — नियुक्त अभ्यर्थियों को सामूहिक अधिसूचना से हटाना उचित प्रक्रिया का उल्लंघन है।
अदालत का मुख्य प्रश्न: क्या परीक्षा प्रणाली इतनी दूषित है कि दोषी और निर्दोष के बीच भेद करना संभव नहीं?

झारखंड हाईकोर्ट ने 12 अक्टूबर 2026 को झारखंड लोक सेवा आयोग (जेपीएससी) द्वारा आयोजित 11वीं-13वीं संयुक्त सिविल सेवा परीक्षा, बाल विकास परियोजना पदाधिकारी (सीडीपीओ) और फूड सेफ्टी ऑफिसर पदों की नियुक्तियाँ रद्द करने के राज्य सरकार के आदेश को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर अंतिम सुनवाई पूरी कर फैसला सुरक्षित रख लिया। यह मामला झारखंड की सरकारी भर्ती प्रक्रिया में कथित व्यापक अनियमितताओं से जुड़ा है, जो राज्य में सिविल सेवा चयन की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल खड़े करता है।

मुख्य घटनाक्रम

न्यायमूर्ति दीपक रोशन की अदालत ने सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद फैसला सुरक्षित रखा और प्रार्थियों तथा राज्य सरकार को गुरुवार तक संक्षिप्त लिखित नोट दाखिल करने का निर्देश दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि नियुक्ति परीक्षा रद्द करने के मामले में सर्वोच्च न्यायालय का निर्देश स्पष्ट है और अब विचार इस बात पर होगा कि परीक्षा में कथित अनियमितताओं के लिए दोषी और निर्दोष अभ्यर्थियों को अलग-अलग किया जा सकता है या नहीं।

अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि इस पहलू पर विचार आवश्यक है कि क्या परीक्षा प्रणाली इतनी दूषित हो चुकी है कि दोषी और निर्दोष अभ्यर्थियों के बीच भेद करना अब संभव नहीं है।

प्रार्थियों के तर्क

प्रार्थियों की ओर से अधिवक्ता इंद्रजीत सिन्हा और अमृतांश वत्स ने दलील दी कि परीक्षा आयोजित करने वाली एजेंसी टीडीपीएल को अनियमितताओं में संलिप्त बताकर पूरी परीक्षा को रद्द करना न्यायसंगत नहीं है। उनका तर्क था कि एजेंसी के साजिश में शामिल होने का निष्कर्ष अभी नहीं निकाला जा सकता और यह जाँच का विषय है।

प्रार्थियों ने यह भी कहा कि नियुक्तियाँ हो जाने के बाद उन्हें रद्द करने के लिए निर्धारित प्रक्रिया का पालन अनिवार्य है — सफल अभ्यर्थियों की नियुक्तियाँ केवल एक सामूहिक अधिसूचना जारी कर रद्द नहीं की जा सकतीं।

हस्तक्षेपकर्ता और सरकार का पक्ष

हस्तक्षेपकर्ता की ओर से अधिवक्ता कुमार हर्ष ने आरोप लगाया कि 11वीं-13वीं सिविल सेवा परीक्षा और सीडीपीओ परीक्षा में कथित तौर पर टीडीपीएल के माध्यम से ₹50-50 लाख लेकर कई अभ्यर्थियों को उत्तीर्ण कराया गया।

राज्य सरकार की ओर से वरीय अधिवक्ता मीनाक्षी अरोड़ा और महाधिवक्ता रोहित राय ने अदालत को बताया कि परीक्षाओं में अनियमितताओं के संकेत कई बिंदुओं से मिले हैं और इनके समर्थन में पर्याप्त साक्ष्य एवं दस्तावेज उपलब्ध हैं। सरकार ने बताया कि सीआईडी की जाँच में कई गिरफ्तारियाँ हो चुकी हैं और परीक्षा में पैसे के लेनदेन से संबंधित तथ्य सामने आए हैं। अदालत में सीलबंद रिपोर्ट भी पेश की गई।

आम अभ्यर्थियों पर असर

गौरतलब है कि यह मामला सैकड़ों उन अभ्यर्थियों के भविष्य से जुड़ा है जो इन परीक्षाओं में सफल रहे और पदों पर नियुक्त हो चुके हैं। यदि अदालत नियुक्तियाँ रद्द करने के सरकारी आदेश को बरकरार रखती है, तो उन्हें पद छोड़ना पड़ सकता है, भले ही उनकी व्यक्तिगत संलिप्तता साबित न हुई हो।

यह ऐसे समय में आया है जब देशभर में सरकारी परीक्षाओं में अनियमितता के मामले बढ़ रहे हैं और न्यायालयों को यह तय करना पड़ रहा है कि किसी दूषित प्रक्रिया में निर्दोष अभ्यर्थियों के अधिकारों की रक्षा किस सीमा तक हो सकती है।

आगे क्या होगा

अदालत का फैसला आने के बाद यह स्पष्ट होगा कि नियुक्तियाँ बहाल रहती हैं या रद्द होती हैं। तब तक प्रभावित अभ्यर्थियों की अनिश्चितता बनी रहेगी। अदालत का यह निर्णय आगे चलकर अन्य राज्यों में सिविल सेवा भर्ती विवादों के लिए भी एक महत्वपूर्ण मिसाल बन सकता है।

संपादकीय दृष्टिकोण

तो उनकी कीमत सबसे ज्यादा उन ईमानदार अभ्यर्थियों को चुकानी पड़ती है जिनका कोई दोष नहीं। अदालत का सवाल — 'क्या दोषी और निर्दोष को अलग किया जा सकता है' — असल में उस प्रशासनिक विफलता की स्वीकारोक्ति है जिसने पूरी प्रक्रिया को संदिग्ध बना दिया। सीआईडी जाँच और सीलबंद रिपोर्ट के बावजूद, नियुक्त अभ्यर्थियों को व्यक्तिगत सुनवाई के बिना सामूहिक रूप से हटाना 'प्राकृतिक न्याय' के सिद्धांत के विरुद्ध है — और यही बिंदु इस फैसले को देशव्यापी मिसाल बनाने की क्षमता रखता है।
RashtraPress
12 अक्टूबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

झारखंड हाईकोर्ट ने जेपीएससी मामले में क्या फैसला सुनाया?
अदालत ने अभी कोई अंतिम फैसला नहीं सुनाया है — 12 अक्टूबर 2026 को सुनवाई पूरी करने के बाद न्यायमूर्ति दीपक रोशन ने फैसला सुरक्षित रख लिया। सभी पक्षों को गुरुवार तक लिखित नोट दाखिल करने का निर्देश दिया गया है।
जेपीएससी की कौन-सी तीन परीक्षाओं की नियुक्तियाँ विवाद में हैं?
विवाद में जेपीएससी द्वारा आयोजित 11वीं-13वीं संयुक्त सिविल सेवा परीक्षा, बाल विकास परियोजना पदाधिकारी (सीडीपीओ) परीक्षा और फूड सेफ्टी ऑफिसर परीक्षा शामिल हैं। राज्य सरकार ने इन तीनों परीक्षाओं के माध्यम से की गई नियुक्तियाँ रद्द करने का आदेश जारी किया था।
टीडीपीएल पर क्या आरोप हैं?
हस्तक्षेपकर्ता के अधिवक्ता ने अदालत में आरोप लगाया कि परीक्षा आयोजित करने वाली एजेंसी टीडीपीएल के माध्यम से कथित तौर पर ₹50-50 लाख लेकर कई अभ्यर्थियों को उत्तीर्ण कराया गया। सीआईडी जाँच में इस संदर्भ में कई गिरफ्तारियाँ भी हो चुकी हैं।
प्रार्थियों का मुख्य तर्क क्या है?
प्रार्थियों का कहना है कि नियुक्तियाँ हो जाने के बाद उन्हें रद्द करने के लिए निर्धारित कानूनी प्रक्रिया का पालन जरूरी है और सफल अभ्यर्थियों को सामूहिक अधिसूचना से नहीं हटाया जा सकता। उनका तर्क यह भी है कि एजेंसी टीडीपीएल की संलिप्तता अभी सिद्ध नहीं हुई और यह जाँच का विषय है।
इस मामले में अदालत का केंद्रीय प्रश्न क्या है?
झारखंड हाईकोर्ट का मुख्य सवाल यह है कि क्या परीक्षा प्रणाली इतनी दूषित हो चुकी है कि दोषी और निर्दोष अभ्यर्थियों के बीच अंतर करना संभव नहीं रहा। अदालत ने स्पष्ट किया कि इस पहलू पर तथ्यों का विश्लेषण करने के बाद ही आदेश पारित किया जाएगा।
राष्ट्र प्रेस
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