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झारखंड हाईकोर्ट ने JPSC और फूड सेफ्टी ऑफिसर नियुक्तियां रद्द करने पर लगाई अंतरिम रोक, 15 सितंबर को अगली सुनवाई

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झारखंड हाईकोर्ट ने JPSC और फूड सेफ्टी ऑफिसर नियुक्तियां रद्द करने पर लगाई अंतरिम रोक, 15 सितंबर को अगली सुनवाई

सारांश

झारखंड हाईकोर्ट ने JPSC और फूड सेफ्टी ऑफिसर नियुक्तियाँ रद्द करने पर रोक लगाकर राज्य सरकार से कड़े सवाल पूछे हैं — दोषी और निर्दोष अभ्यर्थियों में फर्क किए बिना, बिना सुनवाई के सैकड़ों नौकरियाँ खत्म करने का यह तरीका कानूनी कसौटी पर खरा नहीं उतरा।

मुख्य बातें

झारखंड हाईकोर्ट ने 21 अगस्त 2025 को 11वीं से 13वीं जेपीएससी और फूड सेफ्टी ऑफिसर नियुक्तियाँ रद्द करने पर अंतरिम रोक लगाई।
राज्य सरकार ने भर्ती प्रक्रिया में गड़बड़ी का हवाला देते हुए 22 परीक्षाओं को एक साथ रद्द किया था।
न्यायमूर्ति दीपक रोशन ने कहा — बिना प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन किए नियमित नियुक्तियाँ समाप्त नहीं की जा सकतीं।
अदालत ने स्पष्ट किया कि सरकार के पास यह दिखाने की कोई सामग्री नहीं कि कौन-से अभ्यर्थी भ्रष्टाचार में शामिल हैं।
याचिकाकर्ताओं को ट्रायल कोर्ट के अंतिम फैसले का पालन करने की अंडरटेकिंग देनी होगी।
अगली सुनवाई 15 सितंबर को; सरकार से जाँच रिपोर्ट और साक्ष्य तलब।

झारखंड हाईकोर्ट ने 21 अगस्त 2025 को राज्य सरकार द्वारा 11वीं से 13वीं जेपीएससी संयुक्त सिविल सेवा परीक्षा और फूड सेफ्टी ऑफिसर भर्ती की नियुक्तियाँ रद्द करने के फैसले पर अंतरिम रोक लगा दी है। तीन याचिकाओं पर सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति दीपक रोशन की अदालत ने स्पष्ट किया कि बिना प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन किए नियमित नियुक्तियाँ समाप्त नहीं की जा सकतीं। मामले की अगली सुनवाई 15 सितंबर को निर्धारित की गई है।

मामले की पृष्ठभूमि

झारखंड सरकार ने विभिन्न पदों से जुड़ी 22 परीक्षाओं को एक साथ रद्द करने का फैसला लिया था। सरकार का तर्क था कि भर्ती प्रक्रिया में बड़े पैमाने पर अनियमितता हुई है, जिसके आधार पर नागरिकों की शिकायतों पर सीआईडी ने गहन जाँच शुरू की और कुछ गिरफ्तारियाँ भी हुईं। इसी आधार पर सरकार ने पूरी भर्ती प्रक्रिया रद्द करने का निर्णय लिया।

हाईकोर्ट की प्रमुख टिप्पणियाँ

अदालत ने अपने अंतरिम आदेश में कई महत्वपूर्ण कानूनी बिंदु उठाए। फूड सेफ्टी ऑफिसर नियुक्तियों के संदर्भ में अदालत ने कहा कि सरकार के पास अभी तक यह दर्शाने के लिए कोई ठोस सामग्री नहीं है कि कौन-कौन से अभ्यर्थी भ्रष्टाचार में शामिल हैं। अदालत ने यह भी कहा कि सरकार की अधिसूचना में ऐसे कदम को उचित ठहराने वाले तथ्य दिखाई नहीं देते।

जेपीएससी से जुड़े मामलों में अदालत ने पहली नज़र में माना कि याचिकाकर्ताओं को बिना किसी विधिक प्रक्रिया के सेवा से हटा दिया गया है और ऐसी स्थिति में अंतरिम संरक्षण देना न्यायहित में आवश्यक था। अदालत ने 'बैलेंस ऑफ कन्वीनियंस' और 'पब्लिक इंटरेस्ट' को भी अपने फैसले का आधार बनाया।

केंद्रीय कानूनी सवाल

अदालत के समक्ष मूल प्रश्न यह है कि यदि भर्ती प्रक्रिया में अनियमितता हुई है, तो क्या उस प्रक्रिया में शामिल प्रत्येक अभ्यर्थी को बिना व्यक्तिगत जाँच और सुनवाई के नियुक्ति से हटाया जा सकता है? अदालत ने परीक्षा में गड़बड़ी की संभावना से इनकार नहीं किया, लेकिन यह भी स्पष्ट किया कि जाँच पूरी होने से पहले उन अभ्यर्थियों की नियुक्तियाँ रद्द नहीं की जा सकतीं जिनके खिलाफ व्यक्तिगत रूप से कोई आरोप सामने नहीं आया है।

याचिकाकर्ताओं पर शर्तें

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यह अंतरिम रोक नियुक्तियों को अंतिम रूप से वैध घोषित करने के समान नहीं है। याचिकाकर्ताओं को संबंधित आपराधिक मामले में ट्रायल कोर्ट के अंतिम फैसले का पालन करने के लिए शपथपत्र या अंडरटेकिंग देने को कहा गया है। यदि जाँच में कोई ऐसा निष्कर्ष सामने आता है जो कानूनी कार्रवाई की माँग करता है, तो सरकार कानून के अनुसार कदम उठा सकेगी।

आगे क्या होगा

हाईकोर्ट ने सरकार से जाँच की पूरी स्थिति और आगे की कार्रवाई का विस्तृत ब्यौरा माँगा है। 15 सितंबर की सुनवाई में सरकार की जाँच रिपोर्ट और उसके समर्थन में पेश किए जाने वाले साक्ष्य इस मामले की अगली दिशा तय करेंगे। झारखंड हाईकोर्ट के अधिवक्ता योगेंद्र यादव के अनुसार, फिलहाल सैकड़ों अधिकारियों की नौकरियाँ तत्काल बच गई हैं, लेकिन जाँच और न्यायिक प्रक्रिया के रास्ते बंद नहीं हुए हैं।

संपादकीय दृष्टिकोण

साक्ष्य जुटाएँ, दोषियों को अलग करें — और तब कार्रवाई करें। 15 सितंबर की सुनवाई यह तय करेगी कि सरकार के पास इस कसौटी पर खरा उतरने लायक ठोस सामग्री है या नहीं।
RashtraPress
21 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

झारखंड हाईकोर्ट ने JPSC नियुक्तियाँ रद्द करने पर रोक क्यों लगाई?
हाईकोर्ट ने पाया कि सरकार ने बिना प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन किए और बिना व्यक्तिगत जाँच के नियमित नियुक्तियाँ समाप्त कर दीं। अदालत के अनुसार, यह कानूनी प्रक्रिया के विरुद्ध है और याचिकाकर्ताओं को अंतरिम संरक्षण देना न्यायहित में आवश्यक था।
झारखंड सरकार ने 22 परीक्षाएँ एक साथ रद्द क्यों कीं?
सरकार का तर्क था कि भर्ती प्रक्रिया में बड़े पैमाने पर अनियमितता हुई है। नागरिकों की शिकायतों पर सीआईडी ने जाँच शुरू की और कुछ गिरफ्तारियाँ भी हुईं, जिसके आधार पर पूरी भर्ती प्रक्रिया रद्द करने का निर्णय लिया गया।
इस मामले में अदालत का केंद्रीय कानूनी सवाल क्या है?
अदालत का मूल प्रश्न यह है कि यदि भर्ती में गड़बड़ी हुई, तो क्या उन सभी अभ्यर्थियों की नियुक्ति रद्द की जा सकती है जिनके खिलाफ व्यक्तिगत रूप से कोई आरोप सिद्ध नहीं हुआ? अदालत के अनुसार, दोषी और निर्दोष के बीच अंतर किए बिना सामूहिक कार्रवाई कानूनी रूप से उचित नहीं है।
हाईकोर्ट के अंतरिम आदेश के बाद याचिकाकर्ताओं पर क्या शर्तें हैं?
याचिकाकर्ताओं को संबंधित आपराधिक मामले में ट्रायल कोर्ट के अंतिम फैसले का पालन करने के लिए शपथपत्र या अंडरटेकिंग देनी होगी। यदि जाँच में उनके खिलाफ कोई निष्कर्ष आता है तो सरकार कानून के अनुसार कार्रवाई कर सकेगी।
इस मामले में आगे क्या होगा?
अगली सुनवाई 15 सितंबर को होगी, जिसमें सरकार को जाँच की पूरी स्थिति और साक्ष्य अदालत के सामने पेश करने होंगे। सरकार की जाँच रिपोर्ट और उसमें पेश किए जाने वाले तथ्य इस मामले की आगे की दिशा तय करेंगे।
राष्ट्र प्रेस
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