झारखंड छात्र आंदोलन 20वें दिन: जेएसएससी-सीजीएल रद्द और सीबीआई जांच की मांग पर सरकार अड़ी
सारांश
मुख्य बातें
रांची में जेपीएससी और जेएसएससी भर्ती परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं के विरुद्ध चल रहा छात्र आंदोलन बुधवार, 12 अगस्त 2026 को अपने 20वें दिन में प्रवेश कर गया, और गतिरोध बरकरार है। विधानसभा घेराव, पुलिस कार्रवाई तथा कई दौर की वार्ताओं के बाद भी झारखंड सरकार और आंदोलनकारी छात्रों के बीच दो प्रमुख मांगों पर कोई सहमति नहीं बन सकी है।
दो मांगें, दो मोर्चे
छात्रों की पहली मांग वर्ष 2024 में आयोजित जेएसएससी-सीजीएल परीक्षा को रद्द करने की है। इस परीक्षा के जरिए 2,000 से अधिक पदों पर नियुक्तियाँ पहले ही हो चुकी हैं और चयनित अभ्यर्थी विभिन्न सरकारी पदों पर कार्यरत हैं। दूसरी मांग है कि जेपीएससी और जेएसएससी की सभी विवादित परीक्षाओं में कथित गड़बड़ियों की सीबीआई से जांच कराई जाए।
सरकार का रुख और न्यायिक पृष्ठभूमि
राज्य सरकार का तर्क है कि जेएसएससी-सीजीएल परीक्षा को अब रद्द करना व्यावहारिक रूप से संभव नहीं है। परीक्षा में गड़बड़ी की शिकायतों की जांच पहले ही हो चुकी है, और इस प्रक्रिया में झारखंड उच्च न्यायालय तथा सर्वोच्च न्यायालय तक न्यायिक हस्तक्षेप हुआ है। अदालती आदेशों के बाद ही नियुक्तियों का मार्ग प्रशस्त हुआ था। सरकार की ओर से यह भी स्पष्ट किया गया है कि जेएसएससी-सीजीएल से जुड़ी शिकायतों की जांच राज्य की सीआईडी द्वारा की जा रही है।
सीबीआई जांच की मांग पर भी सरकार सहमत नहीं है। इसके बदले राज्य सरकार ने सेवानिवृत्त न्यायाधीश की अध्यक्षता में एक उच्चस्तरीय जांच समिति गठित करने का प्रस्ताव रखा है, जिसे छात्रों ने अस्वीकार कर दिया है।
छात्रों की आपत्तियाँ और अभय तिवारी प्रकरण
आंदोलनकारी छात्र सीआईडी जांच की निष्पक्षता पर सवाल उठा रहे हैं। उनका आरोप है कि सीआईडी ने कथित अनियमितताओं से जुड़े पर्याप्त साक्ष्य अदालत के समक्ष प्रभावी ढंग से नहीं रखे, जिससे नियुक्तियों को आगे बढ़ने का रास्ता मिला।
छात्र परीक्षा आउटसोर्सिंग एजेंसी टीडीएपीएल से जुड़े अभय तिवारी की गिरफ्तारी को भी अपने आरोपों के समर्थन में प्रमुखता से उठा रहे हैं। उनका दावा है कि तिवारी एजेंसी में मार्केटिंग मैनेजर था और बाद में उसी परीक्षा के माध्यम से ब्लॉक सप्लाई ऑफिसर के पद पर चयनित हो गया। हालाँकि, किसी व्यक्ति की गिरफ्तारी अपने आप में पूरी परीक्षा को रद्द करने या व्यापक अनियमितता का न्यायिक प्रमाण नहीं मानी जा सकती — इस संदर्भ में जांच और न्यायिक निष्कर्ष ही निर्णायक होंगे।
छात्रों का तर्क: भरोसे की बहाली
छात्रों का कहना है कि वे राज्य एजेंसियों की जांच पर पहले भरोसा कर चुके हैं और परिणाम संतोषजनक नहीं रहे। उनके लिए सीबीआई जांच केवल एक प्रशासनिक मांग नहीं, बल्कि झारखंड की भर्ती प्रक्रिया में सार्वजनिक विश्वास बहाल करने का एकमात्र माध्यम है।
आगे क्या
यह ऐसे समय में आया है जब झारखंड में बेरोजगार युवाओं की सरकारी नौकरियों के प्रति आकांक्षाएँ उच्चतम स्तर पर हैं और राज्य में भर्ती परीक्षाओं की विश्वसनीयता पहले से ही सवालों के घेरे में है। गतिरोध जारी रहने पर आंदोलन के और तीव्र होने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।