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जेपीएससी-जेएसएससी घोटाला: स्ट्रांग रूम से कॉपियां निकालकर होटलों में लिखवाईं, सॉफ्टवेयर से बदले नतीजे

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जेपीएससी-जेएसएससी घोटाला: स्ट्रांग रूम से कॉपियां निकालकर होटलों में लिखवाईं, सॉफ्टवेयर से बदले नतीजे

सारांश

झारखंड के जेपीएससी-जेएसएससी घोटाले में सीआईडी जांच ने परतें उघाड़ी हैं — सॉफ्टवेयर से डेटा बदलना, स्ट्रांग रूम से कॉपियां निकालकर होटलों में लिखवाना और प्रोफेसरों से अंक बढ़वाना। यह महज धांधली नहीं, बल्कि एक सुनियोजित सिंडिकेट का खेल है।

मुख्य बातें

जेपीएससी और जेएसएससी परीक्षाओं में सॉफ्टवेयर के ज़रिए डेटाबेस में हेरफेर कर 'सेटिंग' वाले उम्मीदवारों के उत्तर बदले जाते थे।
टीडीपीएल और पिकर टेक्नोलॉजी प्राइवेट लिमिटेड ने मिलकर वर्ष 2025 में विशेष सॉफ्टवेयर और पोर्टल तैयार कराया था।
जेपीएससी कार्यालय के स्ट्रांग रूम से उत्तरपुस्तिकाएं निकालकर होटलों और किराए के फ्लैटों में विशेषज्ञों से लिखवाई जाती थीं और फिर गुप्त रूप से वापस रख दी जाती थीं।
मुख्य अभियुक्त अभय तिवारी ने स्वीकार किया कि उसने कॉपियां लिखवाने और अंक बढ़वाने के लिए ₹40 लाख दिए।
पंजाब, हरियाणा और लखनऊ से विशेषज्ञ बुलाए जाते थे; कॉलेज और विश्वविद्यालय के प्रोफेसरों से भी अंक बढ़वाए जाते थे।
सीआईडी अब सर्वर लॉग्स, तकनीकी साक्ष्यों और वित्तीय लेन-देन के आधार पर जांच जारी रखे हुए है।

झारखंड में जेपीएससी और जेएसएससी की प्रतियोगी परीक्षाओं में धांधली का जो जाल बुना गया, वह अब तक के सबसे संगठित परीक्षा घोटालों में से एक साबित हो रहा है। सीआईडी की विशेष जांच टीम द्वारा गिरफ्तार परीक्षा संचालन एजेंसियों के कर्मियों, निदेशकों और बिचौलियों के बयानों से खुलासा हुआ है कि सुनियोजित सॉफ्टवेयर के ज़रिए डेटाबेस में हेरफेर से लेकर अति सुरक्षित स्ट्रांग रूम से उत्तरपुस्तिकाएं बाहर निकालकर होटलों में विशेषज्ञों से लिखवाने तक का पूरा सिंडिकेट सक्रिय था।

सॉफ्टवेयर और पोर्टल से की गई डेटा में हेरफेर

जांच में सामने आया है कि वेंडर एजेंसी मेसर्स टीएसआर डेटा प्रोसेसिंग प्राइवेट लिमिटेड (टीडीपीएल) के कर्मी हेमंत वर्मा ने सीआईडी के समक्ष स्वीकार किया कि यह खेल उत्तर प्रदेश विधानसभा में हुई आरओ और एआरओ परीक्षा की धांधली की तर्ज पर ही झारखंड में भी दोहराया गया। वर्ष 2025 में टीडीपीएल के निदेशकों ने पिकर टेक्नोलॉजी प्राइवेट लिमिटेड के साथ मिलकर जेपीएससी परीक्षाओं के लिए एक विशेष सॉफ्टवेयर और पोर्टल तैयार कराया था।

आरोपियों के बयानों के अनुसार, इस सॉफ्टवेयर की मदद से परीक्षा से पहले ही 'सेटिंग' वाले उम्मीदवारों को चिन्हित कर लिया जाता था और उनके उत्तरों को सीधे डेटाबेस में बदल दिया जाता था। यह तकनीकी हेरफेर इस घोटाले की सबसे खतरनाक परत है।

स्ट्रांग रूम से कॉपियां निकालने का तरीका

मुख्य परीक्षा की उत्तरपुस्तिकाओं से छेड़छाड़ का खुलासा हेमंत वर्मा के बयान से हुआ। बयान के अनुसार, परीक्षा समाप्त होने के बाद जब उत्तरपुस्तिकाएं जेपीएससी कार्यालय के स्ट्रांग रूम में जमा करा दी जाती थीं, तब वहां से 'सेटिंग' वाले अभ्यर्थियों की खाली कॉपियां बाहर निकाली जाती थीं।

टीडीपीएल के निदेशक रामवीर सिंह, सत्यपाल सिंह, प्रदीप कुमार सिंह और मोहम्मद उस्मानी इन कॉपियों को विभिन्न होटलों और किराए के फ्लैटों तक पहुंचाते थे। वहां विशेषज्ञों और संबंधित परीक्षार्थियों की मौजूदगी में उत्तर भरवाए जाते थे और फिर कॉपियों को बेहद गुप्त तरीके से दोबारा स्ट्रांग रूम में रख दिया जाता था।

रांची के होटल और किराए के फ्लैट बने अड्डे

मामले के मुख्य अभियुक्तों में से एक अभय तिवारी ने सीआईडी के समक्ष स्वीकार किया कि सहायक वन संरक्षक और वन क्षेत्र अधिकारी की प्रारंभिक परीक्षा समाप्त होने के बाद मुख्य परीक्षा की तैयारी के नाम पर रांची के हरिओम टावर में एक कमरा किराए पर लिया गया था। गिरोह के एजेंट सतपाल और मिश्रा पंजाब, हरियाणा और लखनऊ से विशेषज्ञों को बुलाते थे।

इन विशेषज्ञों से अभ्यर्थियों की उत्तरपुस्तिकाएं लिखवाई जाती थीं। इसके अलावा, उत्तर लिखे जाने के बाद अंक बढ़वाने के लिए विभिन्न कॉलेजों और विश्वविद्यालयों के प्रोफेसरों से भी संपर्क किया जाता था। अभय तिवारी के कबूलनामे के अनुसार, उसने अपने अभ्यर्थियों के अंक बढ़वाने और कॉपियां लिखवाने के एवज में ₹40 लाख दिए थे।

जांच की मौजूदा स्थिति

फिलहाल सीआईडी तकनीकी साक्ष्यों, सर्वर लॉग्स और वित्तीय लेन-देन के आधार पर इस पूरे सिंडिकेट की जांच आगे बढ़ा रही है। गौरतलब है कि यह ऐसे समय में सामने आया है जब देशभर में सरकारी भर्ती परीक्षाओं की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। आने वाले दिनों में और गिरफ्तारियां और खुलासे संभव हैं, क्योंकि सर्वर लॉग्स की फॉरेंसिक जांच अभी जारी है।

संपादकीय दृष्टिकोण

पोर्टल और सर्वर — जो बताता है कि घोटालेबाज़ अब डिजिटल युग में भी कदम रख चुके हैं। स्ट्रांग रूम की सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल उठते हैं: यदि अति सुरक्षित कक्ष से भी कॉपियां निकाली जा सकती हैं, तो प्रक्रियागत सुधार के बिना डिजिटलीकरण अकेला पर्याप्त नहीं है। जब तक परीक्षा संचालन में तीसरे पक्ष की स्वतंत्र निगरानी और रियल-टाइम ऑडिट अनिवार्य नहीं होती, ऐसे सिंडिकेट नई तकनीक के साथ नए रूप में लौटते रहेंगे।
RashtraPress
31 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

जेपीएससी-जेएसएससी घोटाले में क्या हुआ?
झारखंड में जेपीएससी और जेएसएससी परीक्षाओं में एक सुनियोजित सिंडिकेट ने सॉफ्टवेयर के ज़रिए डेटाबेस में हेरफेर की और स्ट्रांग रूम से उत्तरपुस्तिकाएं निकालकर होटलों में विशेषज्ञों से लिखवाईं। सीआईडी जांच में गिरफ्तार एजेंसी कर्मियों और बिचौलियों के बयानों से यह खुलासा हुआ है।
इस घोटाले में कौन-कौन सी एजेंसियां शामिल हैं?
जांच में वेंडर एजेंसी मेसर्स टीएसआर डेटा प्रोसेसिंग प्राइवेट लिमिटेड (टीडीपीएल) और पिकर टेक्नोलॉजी प्राइवेट लिमिटेड का नाम सामने आया है। टीडीपीएल के निदेशक रामवीर सिंह, सत्यपाल सिंह, प्रदीप कुमार सिंह और मोहम्मद उस्मानी पर कॉपियां होटलों तक पहुंचाने का आरोप है।
स्ट्रांग रूम से कॉपियां कैसे निकाली जाती थीं?
आरोपियों के बयानों के अनुसार, परीक्षा समाप्त होने के बाद जेपीएससी कार्यालय के स्ट्रांग रूम में जमा उत्तरपुस्तिकाओं में से 'सेटिंग' वाले अभ्यर्थियों की कॉपियां बाहर निकाली जाती थीं। इन्हें होटलों और किराए के फ्लैटों में विशेषज्ञों से भरवाकर गुप्त तरीके से वापस स्ट्रांग रूम में रख दिया जाता था।
अभय तिवारी ने क्या स्वीकार किया है?
मुख्य अभियुक्त अभय तिवारी ने सीआईडी के समक्ष स्वीकार किया कि उसने अपने अभ्यर्थियों की कॉपियां लिखवाने और अंक बढ़वाने के एवज में ₹40 लाख दिए। उसने यह भी बताया कि रांची के हरिओम टावर में कमरा किराए पर लिया गया था जहां यह काम होता था।
सीआईडी जांच अब किस दिशा में जा रही है?
सीआईडी फिलहाल सर्वर लॉग्स, तकनीकी साक्ष्यों और वित्तीय लेन-देन की फॉरेंसिक जांच कर रही है। आने वाले दिनों में और गिरफ्तारियों की संभावना है, क्योंकि पूरे सिंडिकेट के तार अभी पूरी तरह उजागर होने बाकी हैं।
राष्ट्र प्रेस
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