जस्टिस अश्वनी कुमार मिश्रा की पंजाब-हरियाणा HC चीफ जस्टिस नियुक्ति पर केजरीवाल ने उठाए पारदर्शिता के सवाल
सारांश
मुख्य बातें
सर्वोच्च न्यायालय के कॉलेजियम ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के वरिष्ठ न्यायाधीश जस्टिस अश्वनी कुमार मिश्रा को पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश नियुक्त किए जाने की सिफारिश की है। इस सिफारिश के सामने आते ही आम आदमी पार्टी (AAP) के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल ने 9 अगस्त को एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर पोस्ट कर न्यायाधीशों की पदोन्नति प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी पर तीखे सवाल उठाए।
केजरीवाल ने क्या कहा
केजरीवाल ने अपनी एक्स पोस्ट में लिखा, 'ऐसा लगता है कि सुप्रीम कोर्ट जाने की बहुत जल्दी है। क्या जजों को सीनियरिटी को नजरअंदाज करके, बिना बारी के सुप्रीम कोर्ट में प्रमोट किया जाना चाहिए? इससे 'लेनदेन' की गुंजाइश बन सकती है।' उन्होंने यह भी पूछा कि किसी जज को उच्च पद पर भेजने से पहले किन कसौटियों पर परखा जाता है और क्या शासक के प्रति वफादारी उनमें से एक है।
पूर्व मुख्यमंत्री केजरीवाल ने आगे लिखा कि बिना बारी के और अपारदर्शी तरीके से पदोन्नति की अनुमति नहीं होनी चाहिए — 'खासकर उन मामलों में जहाँ कानून को ताक पर रखकर सरकार को खुश करने की कोशिश की जाती है।' उन्होंने चेताया कि अदालतों को किसी भी 'हथियार की तरह इस्तेमाल' होने से बचाना लोकतंत्र की रक्षा के लिए अनिवार्य है।
जस्टिस मिश्रा का परिचय
16 नवंबर 1968 को जन्मे न्यायमूर्ति मिश्रा ने दिल्ली विश्वविद्यालय के किरोड़ीमल कॉलेज से अर्थशास्त्र में बी.ए. (ऑनर्स) और कैंपस लॉ सेंटर से एलएलबी की उपाधि प्राप्त की। उन्होंने 8 मई 1993 को अधिवक्ता के रूप में पंजीकरण कराया और मुख्यतः दीवानी, संवैधानिक तथा सेवा कानून के क्षेत्र में वकालत की।
अपने करियर में उन्होंने नोएडा विकास प्राधिकरण, गाजियाबाद विकास प्राधिकरण, IFFCO, इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन और उत्तर प्रदेश विद्युत निगम सहित कई सार्वजनिक निकायों का प्रतिनिधित्व किया। 2013 में उन्हें वरिष्ठ अधिवक्ता नामित किया गया।
3 फरवरी 2014 को इलाहाबाद उच्च न्यायालय के अतिरिक्त न्यायाधीश के रूप में शपथ लेने के बाद 1 फरवरी 2016 को वे स्थायी न्यायाधीश बने। 20 जुलाई 2025 तक इलाहाबाद उच्च न्यायालय में सेवाएँ देने के बाद उनका तबादला पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय में हुआ। इससे पहले जून 2025 में ही राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने उन्हें उक्त न्यायालय का कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश नियुक्त किया था।
कॉलेजियम प्रक्रिया पर पृष्ठभूमि
गौरतलब है कि भारत में उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीशों की नियुक्ति सर्वोच्च न्यायालय के कॉलेजियम की सिफारिश पर होती है, जिसमें प्रधान न्यायाधीश सहित वरिष्ठतम न्यायाधीश शामिल होते हैं। आलोचकों का कहना है कि इस प्रक्रिया में सार्वजनिक जवाबदेही का अभाव है और वरिष्ठता के सिद्धांत को दरकिनार किए जाने के मामले समय-समय पर विवाद का कारण बनते रहे हैं।
यह ऐसे समय में आया है जब न्यायपालिका की स्वतंत्रता और कार्यपालिका से उसके संबंध पर राष्ट्रीय बहस तेज हो रही है। केजरीवाल की प्रतिक्रिया इस बहस को और व्यापक राजनीतिक आयाम देती है।
आगे क्या होगा
कॉलेजियम की सिफारिश के बाद केंद्र सरकार की मंजूरी और राष्ट्रपति द्वारा औपचारिक नियुक्ति की अधिसूचना जारी होना बाकी है। न्यायिक नियुक्तियों में पारदर्शिता की माँग को लेकर विपक्षी दलों की ओर से और प्रतिक्रियाएँ आने की संभावना है।