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करवा चौथ व्रत 2026: पंडित शिप्रा सचदेव ने बताए ज़रूरी नियम, इन गलतियों से बचें

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करवा चौथ व्रत 2026: पंडित शिप्रा सचदेव ने बताए ज़रूरी नियम, इन गलतियों से बचें

सारांश

करवा चौथ पर क्या करें, क्या न करें — पंडित शिप्रा सचदेव ने स्पष्ट किया कि इस दिन चाकू-कैंची से लेकर नदी पार करने तक सब वर्जित है। सरगी से शुरू होकर चंद्र-अर्घ्य पर समाप्त इस निर्जला व्रत की विधि और बायना की परंपरा की पूरी जानकारी।

मुख्य बातें

करवा चौथ का व्रत पूर्णतः निर्जला होता है और सरगी सूर्योदय से पहले तारों की छाँव में खाई जाती है।
व्रत का पारण रात में चंद्रमा को अर्घ्य देने के बाद पति के हाथों से जल ग्रहण कर किया जाता है।
इस दिन चाकू, कैंची और सुई-धागे का प्रयोग तथा नदी पार करना वर्जित माना गया है।
पूजा विशेष रूप से प्रदोष काल में माता गौरी की उपासना के साथ सम्पन्न की जाती है।
बायना — मटकी, फल और मेवे से सजी थाली — सास या वरिष्ठ सुहागन को दी जाती है; स्वयं ग्रहण नहीं किया जाता।

करवा चौथ का पावन पर्व सुहागन महिलाओं के लिए सर्वाधिक महत्वपूर्ण व्रतों में से एक है। इस व्रत को लेकर महिलाओं में गहरी आस्था और उत्साह होता है, परंतु इसे विधिवत रखने के लिए कुछ नियमों का पालन अनिवार्य माना जाता है। प्रसिद्ध ज्योतिषाचार्य पंडित शिप्रा सचदेव ने करवा चौथ व्रत से जुड़े नियमों, पूजा-विधि और सावधानियों की विस्तृत जानकारी साझा की है।

व्रत का संकल्प और सरगी की परंपरा

पंडित शिप्रा सचदेव के अनुसार, करवा चौथ का व्रत सुहागन महिलाएं अपने पति की दीर्घायु और सुखी वैवाहिक जीवन की कामना से रखती हैं। यह व्रत पूरी तरह निर्जला होता है, अर्थात इस दौरान जल ग्रहण करना भी वर्जित है। व्रत का शुभारंभ सरगी खाकर किया जाता है, जो सूर्योदय से पूर्व तारों की छाँव में — यानी जब तक आकाश में तारे दिखाई दें — तब तक ग्रहण कर ली जाती है। इसके साथ ही व्रत का संकल्प भी लिया जाता है।

व्रत पारण की विधि

दिनभर के निर्जला उपवास के पश्चात व्रत का पारण रात में चंद्रमा को अर्घ्य देने के बाद किया जाता है। चंद्रदर्शन कर अर्घ्य अर्पित करने के उपरांत महिलाएं पति के हाथों से जल ग्रहण कर अपना व्रत तोड़ती हैं। यह परंपरा पति-पत्नी के रिश्ते की गहराई का प्रतीक मानी जाती है।

इन कार्यों से करें परहेज़

पंडित शिप्रा सचदेव ने बताया कि करवा चौथ के दिन कटिंग और सिलाई जैसे कार्यों से विशेष रूप से बचना चाहिए। चाकू, कैंची और सुई-धागे का प्रयोग इस दिन वर्जित माना गया है। इसके अतिरिक्त, जब तक व्रत पूर्ण न हो जाए, तब तक नदी पार करने से भी परहेज़ करना चाहिए।

प्रदोष काल में पूजा और माता गौरी की उपासना

ज्योतिषाचार्य के अनुसार, करवा चौथ की पूजा विशेष रूप से प्रदोष काल में सम्पन्न की जाती है, और इस दौरान माता गौरी की उपासना का विशेष धार्मिक महत्व होता है। पूजा में माता गौरी के स्वरूप की स्थापना की जाती है। कई स्थानों पर दस सुहागन महिलाएं एकत्रित होकर करवा माता की कथा सुनती हैं और सामूहिक पूजा करती हैं — इसे अत्यंत शुभ माना जाता है।

बायना निकालने की परंपरा

पंडित शिप्रा सचदेव ने बायना की परंपरा के विषय में भी विस्तार से बताया। बायना का शाब्दिक अर्थ है 'घुमाना'। एक थाली में मटकी, फल, मेवा और अन्य पूजन सामग्री रखकर उसे घुमाया जाता है। यह बायना घर की सास अथवा किसी अन्य वरिष्ठ सुहागन महिला को भेंट किया जाता है। उल्लेखनीय है कि इस बायना का स्वयं सेवन नहीं किया जाता। करवा चौथ की यह परंपराएं पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आ रही हैं और सनातन धर्म में सुहाग की रक्षा का प्रतीक मानी जाती हैं।

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि यह उस सांस्कृतिक संरचना का हिस्सा है जो पीढ़ियों से सुहागन स्त्री की पहचान को पारिवारिक कर्तव्य से जोड़ती आई है। विशेषज्ञों की सलाह जहाँ श्रद्धालुओं को विधि-सम्मत मार्गदर्शन देती है, वहीं समाज के एक हिस्से में यह बहस भी जारी है कि क्या ऐसे व्रत केवल एकपक्षीय हैं। मुख्यधारा की कवरेज अक्सर इस सांस्कृतिक-सामाजिक द्वंद्व को नज़रअंदाज़ करती है। संतुलित पत्रकारिता के लिए यह जरूरी है कि परंपरा के साथ-साथ उसके विकसित होते स्वरूप को भी रेखांकित किया जाए।
RashtraPress
29 अक्टूबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

करवा चौथ का व्रत कैसे शुरू किया जाता है?
करवा चौथ का व्रत सूर्योदय से पहले तारों की छाँव में सरगी खाकर शुरू किया जाता है और उसी समय व्रत का संकल्प लिया जाता है। इसके बाद दिनभर निर्जला उपवास रखा जाता है।
करवा चौथ का व्रत कब और कैसे तोड़ा जाता है?
रात में चंद्रमा के दर्शन कर उन्हें अर्घ्य देने के बाद पति के हाथों से जल ग्रहण कर व्रत तोड़ा जाता है। चंद्र-अर्घ्य से पहले व्रत पूर्ण नहीं माना जाता।
करवा चौथ के दिन क्या नहीं करना चाहिए?
पंडित शिप्रा सचदेव के अनुसार इस दिन चाकू, कैंची और सुई-धागे का प्रयोग वर्जित है, अर्थात कटिंग और सिलाई जैसे काम नहीं करने चाहिए। साथ ही, व्रत पूर्ण होने तक नदी पार करने से भी बचना चाहिए।
करवा चौथ की पूजा किस समय और किस विधि से की जाती है?
करवा चौथ की पूजा प्रदोष काल में माता गौरी के स्वरूप की स्थापना कर की जाती है। कई स्थानों पर दस सुहागन महिलाएं एकत्रित होकर करवा माता की कथा सुनती हैं, जिसे शुभ माना जाता है।
करवा चौथ पर बायना क्या होता है और इसे कैसे निकाला जाता है?
बायना का अर्थ है 'घुमाना'। एक थाली में मटकी, फल, मेवा और पूजन सामग्री रखकर उसे घुमाया जाता है और सास या घर की किसी वरिष्ठ सुहागन महिला को भेंट किया जाता है। इस बायना का स्वयं सेवन नहीं किया जाता।
राष्ट्र प्रेस
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