केरल कांग्रेस में गुटबाजी: CM सतीशन की कार्यशैली पर वेणुगोपाल खेमे ने उठाए सवाल, KPCC बैठक की माँग
सारांश
मुख्य बातें
केरल में सत्तारूढ़ यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (UDF) सरकार के शुरुआती महीनों में ही कांग्रेस की आंतरिक गुटबाजी एक बार फिर सतह पर आ गई है। मुख्यमंत्री वी.डी. सतीशन की कार्यशैली और पार्टी संगठन पर उनके बढ़ते प्रभाव को लेकर अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी (AICC) के महासचिव (संगठन) के.सी. वेणुगोपाल के समर्थक नेताओं ने खुलकर असंतोष जताया है। 4 जुलाई 2026 को तिरुवनंतपुरम से उभरी इस खींचतान ने राज्य की राजनीति में हलचल मचा दी है।
विवाद की जड़: नीतिगत फैसलों में पार्टी की अनदेखी
वेणुगोपाल खेमे के नेताओं का आरोप है कि राज्य सरकार कई महत्वपूर्ण नीतिगत और प्रशासनिक निर्णय केरल प्रदेश कांग्रेस कमेटी (KPCC) से पर्याप्त परामर्श किए बिना ले रही है। इन नेताओं ने KPCC नेतृत्व की तत्काल बैठक बुलाने की माँग की है।
शिकायतों में विशेष रूप से राज्य निर्वाचन आयुक्त और देवस्वम प्लीडर की नियुक्तियों का उल्लेख है। इसके अलावा हाल के वित्त विधेयक में कम अल्कोहल वाले पेय पदार्थों को अनुमति देने संबंधी प्रावधान को भी विवाद का केंद्र बताया जा रहा है। आरोप है कि इन मुद्दों पर पार्टी मंचों को विश्वास में नहीं लिया गया।
उल्लेखनीय है कि विधानसभा में विपक्ष ने जिन फैसलों को लेकर सरकार को घेरा, कांग्रेस के कई नेताओं का कहना है कि उन्हें भी उन निर्णयों की पूर्व जानकारी नहीं थी — यह स्थिति पार्टी के भीतर संवाद की कमी को उजागर करती है।
सतीशन बनाम वेणुगोपाल: दो शक्ति केंद्रों की टकराहट
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, केरल कांग्रेस में फिलहाल दो प्रमुख शक्ति केंद्र हैं — मुख्यमंत्री वी.डी. सतीशन और AICC महासचिव के.सी. वेणुगोपाल। वरिष्ठ नेता रमेश चेन्निथला का भी एक स्वतंत्र समर्थन आधार बना हुआ है।
विश्लेषकों का मानना है कि मुख्यमंत्री पद की दौड़ में वेणुगोपाल पर बढ़त हासिल करने के बाद सतीशन की राजनीतिक स्थिति और मजबूत हुई है। विधानसभा में उनके प्रभावी प्रदर्शन और प्रशासन संचालन में दिखाई गई आत्मविश्वासपूर्ण भूमिका ने उनकी साख को और बढ़ाया है।
वेणुगोपाल खेमे को आशंका है कि यदि समय रहते संतुलन नहीं बनाया गया तो सतीशन राज्य सरकार और कांग्रेस संगठन — दोनों में निर्विवाद शक्ति केंद्र बन सकते हैं।
KPCC अध्यक्ष पद की रिक्तता और नियुक्तियों की होड़
विवाद का एक अहम संगठनात्मक पहलू यह भी है कि KPCC अध्यक्ष सनी जोसेफ के राज्य मंत्रिमंडल में शामिल होने के बाद पार्टी के पास फिलहाल कोई पूर्णकालिक प्रदेश अध्यक्ष नहीं है। इस रिक्तता ने अगले KPCC अध्यक्ष की नियुक्ति को लेकर खेमेबाजी और तेज कर दी है।
सूत्रों के अनुसार, वेणुगोपाल गुट राज्य के विभिन्न निगमों और बोर्डों में होने वाली नियुक्तियों को सतीशन के बढ़ते प्रभाव को संतुलित करने के अवसर के रूप में देख रहा है।
सतीशन का रुख और आगे की राह
मुख्यमंत्री सतीशन ने स्पष्ट संकेत दिए हैं कि वह सरकार के दैनिक कामकाज में अनावश्यक हस्तक्षेप स्वीकार नहीं करेंगे। उनके इस दृढ़ रुख से दोनों गुटों के बीच तनाव और गहरा हो गया है।
गौरतलब है कि केरल कांग्रेस में गुटीय संघर्ष कोई नई परिघटना नहीं है — नेतृत्व बदलते रहे हैं, लेकिन आंतरिक खींचतान लगातार बनी रही है। यह ऐसे समय में आया है जब UDF सरकार अपने शुरुआती कार्यकाल में जनता के बीच अपनी पहचान स्थापित करने की कोशिश कर रही है।
आने वाले दिनों में होने वाली KPCC नेतृत्व की बैठक को राजनीतिक हलकों में काफी अहम और संभावित रूप से विवादपूर्ण माना जा रहा है — इसका नतीजा केरल कांग्रेस के आंतरिक समीकरणों को नए सिरे से परिभाषित कर सकता है।