केरल हाई कोर्ट ने 16 वर्षीय यौन उत्पीड़न पीड़िता की 27 सप्ताह की गर्भावस्था समाप्त करने की दी अनुमति
सारांश
मुख्य बातें
केरल उच्च न्यायालय ने 23 अक्टूबर 2026 को यौन उत्पीड़न की शिकार एक 16 वर्षीय नाबालिग पीड़िता की 27 सप्ताह की गर्भावस्था को चिकित्सीय रूप से समाप्त करने की अनुमति प्रदान कर दी। न्यायालय ने नाबालिग द्वारा झेले गए गहरे मनोवैज्ञानिक आघात और मानसिक पीड़ा को आधार बनाते हुए यह महत्वपूर्ण आदेश जारी किया। यह मामला कोच्चि स्थित केरल उच्च न्यायालय में लड़की की माँ द्वारा दायर याचिका के माध्यम से सामने आया था।
मामले की पृष्ठभूमि
पीड़िता की माँ ने न्यायालय में याचिका दायर करते हुए अनुरोध किया था कि उनकी बेटी की गर्भावस्था को समाप्त करने की अनुमति दी जाए। उन्होंने स्पष्ट किया कि गर्भावस्था जारी रखने से नाबालिग को और अधिक मानसिक आघात पहुँचेगा। न्यायालय ने माँ और पीड़िता दोनों के इस पक्ष को स्वीकार किया कि वे गर्भावस्था को आगे नहीं बढ़ाना चाहतीं।
गौरतलब है कि 27 सप्ताह की गर्भावस्था एक उन्नत अवस्था मानी जाती है, जिसमें मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेगनेंसी (MTP) अधिनियम के तहत न्यायिक हस्तक्षेप और सावधानीपूर्वक चिकित्सीय मूल्यांकन अनिवार्य होता है।
विशेषज्ञ मेडिकल बोर्ड की भूमिका
न्यायालय के निर्देश पर गठित एक विशेषज्ञ मेडिकल बोर्ड ने पीड़िता की विस्तृत जाँच की और अपनी रिपोर्ट अदालत को सौंपी। बोर्ड ने अपनी रिपोर्ट में स्पष्ट रूप से सिफारिश की कि गर्भावस्था को समाप्त किया जा सकता है। इस मेडिकल रिपोर्ट और MTP अधिनियम के प्रावधानों पर समग्र विचार करने के बाद न्यायालय ने प्रक्रिया की अनुमति प्रदान की।
न्यायालय के विशेष निर्देश
केरल उच्च न्यायालय ने अनुमति देने के साथ-साथ कई सुरक्षा उपाय भी सुनिश्चित किए। न्यायालय ने निर्देश दिया कि यह प्रक्रिया आवश्यक चिकित्सीय देखभाल और सहमति के साथ पूरी की जाए। केरल राज्य सरकार को आदेश दिया गया कि सभी आवश्यक चिकित्सीय इंतजाम बिना किसी देरी के किए जाएँ।
न्यायालय ने इस संभावना पर भी ध्यान दिया कि प्रक्रिया के दौरान शिशु जीवित जन्म ले सकता है। ऐसी स्थिति के लिए सरकार को निर्देश दिया गया कि नवजात को तत्काल नियोनेटल केयर (नवजात शिशु देखभाल) और विशेष चिकित्सीय उपचार उपलब्ध कराया जाए।
कानूनी और सामाजिक महत्व
यह मामला उन जटिल कानूनी और चिकित्सीय प्रश्नों को रेखांकित करता है जो तब उत्पन्न होते हैं जब यौन उत्पीड़न की शिकार कोई नाबालिग लड़की गर्भावस्था की उन्नत अवस्था में उसे समाप्त करने की माँग करती है। यह ऐसे समय में आया है जब देश में नाबालिग पीड़िताओं के प्रजनन अधिकारों को लेकर न्यायिक संवेदनशीलता और सक्रियता पर चर्चा बढ़ रही है।
न्यायालय के निर्देशों में राज्य सरकार की जिम्मेदारी भी स्पष्ट रूप से तय की गई है कि पूरी प्रक्रिया के दौरान किसी भी परिस्थिति से निपटने के लिए उचित चिकित्सीय देखभाल सुलभ रहे। आगे की कानूनी प्रक्रिया और चिकित्सीय देखभाल राज्य की निगरानी में पूरी की जाएगी।