केरल स्वास्थ्य मंत्री मुरलीधरन का पलटवार: सीपीआई(एम) की तीन पूर्व मंत्रियों पर सवाल, इस्तीफे से साफ इनकार
सारांश
मुख्य बातें
केरल के स्वास्थ्य मंत्री के. मुरलीधरन ने शुक्रवार, 23 अक्टूबर 2026 को तिरुवनंतपुरम में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) [सीपीआई(एम)] की तीन पूर्व महिला स्वास्थ्य मंत्रियों की आलोचना का तीखा जवाब दिया और स्पष्ट शब्दों में कहा कि वे अपने पद से इस्तीफा नहीं देंगे। राज्य में स्पाइनल मस्कुलर एट्रोफी (SMA) की दवाओं को लेकर छिड़ा राजनीतिक विवाद अब स्वास्थ्य विभाग के प्रबंधन और पिछली सरकार के रिकॉर्ड के व्यापक सवालों में तब्दील हो गया है।
विवाद की पृष्ठभूमि
एक दिन पहले गुरुवार, 22 अक्टूबर को सीपीआई(एम) की वरिष्ठ नेत्री एवं पूर्व स्वास्थ्य मंत्री पीके श्रीमती, केके शैलजा और वीणा जॉर्ज ने संयुक्त रूप से मौजूदा सरकार की स्वास्थ्य नीति की आलोचना की थी। तीनों ने 'केवल क्लीनिकल ट्रायल के लिए' चिह्नित दवाओं के वितरण पर सवाल उठाते हुए मरीजों की सुरक्षा पर चिंता जताई थी।
पीके श्रीमती ने आरोप लगाया कि सरकार की कथित गैर-जिम्मेदाराना नीति से SMA के मरीजों को जीवनरक्षक दवाएँ पाने में कठिनाई हो रही है। उन्होंने यह भी दावा किया कि वाम लोकतांत्रिक मोर्चा (एलडीएफ) सरकार के दस वर्षीय कार्यकाल में दवाएँ मुफ्त उपलब्ध कराई जाती थीं और दवाओं की कमी की कोई शिकायत नहीं मिली थी। साथ ही उन्होंने आरोप लगाया कि केरल मेडिकल सर्विसेज कॉर्पोरेशन की स्थापित खरीद प्रक्रिया को नजरअंदाज किया गया, जिससे कथित तौर पर भ्रष्टाचार और वितरण संबंधी समस्याएँ उत्पन्न हुईं।
मुरलीधरन का जवाब
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता मुरलीधरन ने पलटवार करते हुए पिछली एलडीएफ सरकार के कार्यकाल पर गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने कहा कि वह समय बीत चुका है जब ऑपरेशन के दौरान मरीजों के शरीर में कथित रूप से सर्जिकल कैंची छूट जाती थी। उन्होंने आरोप लगाया कि एक पूर्व मंत्री के कार्यकाल में संक्रमण के कारण बच्चों की मौत हुई, जबकि दूसरी पूर्व मंत्री के कार्यकाल में निपाह वायरस प्रकोप के दौरान लोगों की जान गई।
तीसरी पूर्व मंत्री पर उन्होंने अपने साथ मारपीट होने का झूठा दावा करने का आरोप लगाया। मुरलीधरन ने कहा, 'कांग्रेस पार्टी ने मुझे मंत्री बनाया है' — और यह भी कि उनकी ही पार्टी द्वारा उपेक्षित की गई तीनों नेता अब उनके खिलाफ एकजुट हो गई हैं।
दवा विवाद: क्या है असली मुद्दा
SMA यानी स्पाइनल मस्कुलर एट्रोफी एक दुर्लभ और गंभीर आनुवंशिक बीमारी है जिसमें जीवनरक्षक दवाएँ अत्यंत महँगी होती हैं। विवाद का केंद्रबिंदु यह है कि सरकार आयातित दवा के बजाय भारतीय कंपनी नैटको द्वारा निर्मित किफायती जेनेरिक दवा रिसडिप्लाम का उपयोग कर रही है।
मुरलीधरन ने साफ किया कि सरकार भारत में निर्मित दवा का उपयोग जारी रखेगी। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि कुछ टेलीविजन चैनलों की रिपोर्टों ने इस विवाद को बढ़ावा दिया है, और कभी-कभी विदेशी दवा कंपनियाँ भी ऐसी खबरों के पीछे हो सकती हैं।
विशेषज्ञ की राय
प्रसिद्ध न्यूरोसर्जन एवं केरल विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति बी. इकबाल ने स्वास्थ्य विभाग के फैसले का समर्थन किया है। उन्होंने नैटको निर्मित जेनेरिक दवा रिसडिप्लाम को इलाज को अधिक किफायती बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम बताया। गौरतलब है कि यह ऐसे समय में आया है जब दुर्लभ बीमारियों की दवाओं की पहुँच और सामर्थ्य पूरे देश में एक बड़ा नीतिगत सवाल बनी हुई है।
आगे क्या होगा
यह राजनीतिक टकराव केरल में कांग्रेस के नेतृत्व वाली संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चा (यूडीएफ) सरकार और विपक्षी एलडीएफ के बीच स्वास्थ्य नीति को लेकर गहरे मतभेदों को उजागर करता है। मुरलीधरन ने स्पष्ट संकेत दिए हैं कि वे इस मुद्दे पर पीछे हटने के मूड में नहीं हैं। दवा खरीद प्रक्रिया, मरीजों की सुरक्षा और पिछली सरकार के स्वास्थ्य रिकॉर्ड को लेकर यह विवाद आने वाले दिनों में और तेज होने की संभावना है।