7 अक्टूबर 2026
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कुमाऊं में महिला SHG ने शुरू की रेशम धागे की कताई, ₹4,500/किलो भाव से आय की राह

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कुमाऊं में महिला SHG ने शुरू की रेशम धागे की कताई, ₹4,500/किलो भाव से आय की राह

सारांश

उत्तराखंड में पहली बार — कुमाऊं रेशम विभाग ने कोकून से सीधे धागे तक का सफर तय करते हुए 14 महिलाओं को ₹4,500/किलो की दर पर रोज़गार दिया। 'माँ दुर्गा न्यू रेशम SHG' की यह छोटी शुरुआत 'ब्रांड उत्तराखंड' के लिए बड़े बदलाव की नींव बन सकती है।

मुख्य बातें

कुमाऊं मंडल रेशम विभाग ने हल्द्वानी के राजकीय रेशम फार्म, पनियाली में पहली बार महिला SHG से रेशम धागे की कताई शुरू कराई।
'माँ दुर्गा न्यू रेशम स्वयं सहायता समूह' में अब तक 14 महिलाएँ जुड़ चुकी हैं और समूह को करीब ₹25,000 की आय हो चुकी है।
तैयार रेशम धागे का मूल्य फिलहाल ₹4,500 प्रति किलो ; बिक्री उत्तराखंड कोऑपरेटिव फेडरेशन के शोरूम से।
महिलाओं को केंद्रीय रेशम बोर्ड, देहरादून के सहयोग से पाँच दिवसीय प्रशिक्षण दिया जा रहा है।
पहल का विचार 2019 में आया था; व्यावहारिक शुरुआत 2025 में हुई।
विभाग की योजना इसे ग्रामीण क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर विस्तार देने की है।

कुमाऊं मंडल रेशम विभाग ने हल्द्वानी के राजकीय रेशम फार्म, पनियाली में पहली बार महिला स्वयं सहायता समूह (SHG) के ज़रिए रेशम धागे की कताई का काम शुरू कराया है। 7 अक्टूबर 2026 तक 14 महिलाएँ इस पहल से जुड़ चुकी हैं और कम समय में समूह को करीब ₹25,000 की आय हो चुकी है। यह कदम उत्तराखंड के रेशम क्षेत्र को केवल कोकून उत्पादन से आगे ले जाने और 'ब्रांड उत्तराखंड' को बाज़ार में नई पहचान दिलाने की दिशा में अहम माना जा रहा है।

पहल की पृष्ठभूमि और मुख्य घटनाक्रम

रेशम विभाग (कुमाऊं मंडल) के उपनिदेशक हेमचंद्र के अनुसार, इस पहल का विचार वर्ष 2019 में उस समय आया जब वे ऊधमसिंह नगर में तैनात थे। वर्ष 2025 में इसकी व्यावहारिक शुरुआत हुई, जब एक-दो महिलाओं ने कताई का काम शुरू किया। आय मिलने के बाद समूह में महिलाओं की संख्या बढ़कर 14 हो गई है।

'माँ दुर्गा न्यू रेशम स्वयं सहायता समूह' के नाम से पंजीकृत यह समूह पनियाली रेशम फार्म में विभाग के मार्गदर्शन में काम कर रहा है। तैयार धागे की मार्केटिंग की ज़िम्मेदारी उत्तराखंड कोऑपरेटिव फेडरेशन, देहरादून को दी गई है, जिससे महिलाओं को बाज़ार ढूँढने की परेशानी नहीं होगी।

धागे का मूल्य और महिलाओं की कमाई

हेमचंद्र ने बताया कि फिलहाल तैयार रेशम धागे को ₹4,500 प्रति किलो की दर से बाज़ार में खरीदा जा रहा है। उन्होंने आगे इस मूल्य में बढ़ोतरी की संभावना भी जताई। धागे की बिक्री उत्तराखंड को-ऑपरेटिव फेडरेशन के शोरूम के माध्यम से हो रही है।

गौरतलब है कि इससे पहले हल्द्वानी क्षेत्र में रेशम विभाग की ओर से स्वयं सहायता समूहों को रेशम कोयों से हस्तनिर्मित सजावटी सामान, ज्वेलरी और अन्य उत्पाद बनाने का प्रशिक्षण दिया गया था। यह पहल उसी शृंखला का विस्तार है, लेकिन इस बार कच्चे माल को मूल्यवर्धित उत्पाद में बदलने का सीधा प्रयास है।

प्रशिक्षण की प्रक्रिया

रेशम विभाग के वैज्ञानिक राहुल पाल के अनुसार, महिलाओं को पाँच दिवसीय प्रशिक्षण दिया जा रहा है, जिसमें उत्तराखंड के वेस्ट कोकून और टसर से धागा तैयार करने की पूरी प्रक्रिया सिखाई जाती है। प्रशिक्षण में कोकून उबालने, कताई, गुणवत्ता नियंत्रण और सामान्य गलतियों से बचने के तरीके शामिल हैं।

प्रशिक्षण में केंद्रीय रेशम बोर्ड के देहरादून केंद्र का सहयोग भी लिया गया है। विभाग का स्पष्ट लक्ष्य है कि महिलाएँ उच्च गुणवत्ता का धागा तैयार करें, जिससे बाज़ार में माँग बने और उनकी आमदनी में इज़ाफा हो।

महिलाओं की प्रतिक्रिया

समूह की सदस्य विमल जीना ने बताया कि उपनिदेशक हेमचंद्र के सहयोग से ही महिलाएँ इस काम तक पहुँच पाई हैं। एक अन्य सदस्य सुनीता ने कहा कि रेशम धागा तैयार करने के काम से महिलाओं को आय मिल रही है और स्वरोजगार का नया अवसर पैदा हुआ है।

आगे की योजना

रेशम विभाग की योजना इस पहल को बड़े पैमाने पर विस्तार देने की है, ताकि उत्तराखंड के दूर-दराज के ग्रामीण इलाकों की महिलाओं को भी घर के पास स्थायी रोज़गार और आय का साधन मिल सके। हेमचंद्र ने इसे उत्तराखंड के रेशम क्षेत्र में एक नया अध्याय बताया है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन इसका संकेत बड़ा है — उत्तराखंड का रेशम विभाग वैल्यू चेन में ऊपर चढ़ने की कोशिश कर रहा है, कोकून बेचने से धागा बनाने तक। असली परीक्षा यह है कि क्या ₹4,500 प्रति किलो का मूल्य टिकाऊ है और क्या कोऑपरेटिव मार्केटिंग मॉडल खरीदारों की निरंतर माँग सुनिश्चित कर सकता है। पहाड़ी राज्यों में SHG-आधारित ग्रामीण उद्योगों का इतिहास बताता है कि प्रशिक्षण और बाज़ार-संपर्क तो मिलता है, लेकिन विस्तार के साथ गुणवत्ता नियंत्रण और आय की स्थिरता बनाए रखना चुनौती बनती है। 14 महिलाओं से शुरू हुई यह कोशिश तभी 'ब्रांड उत्तराखंड' की असल पहचान बनेगी जब इसे नीतिगत बजट और दीर्घकालिक खरीद प्रतिबद्धता का समर्थन मिले।
RashtraPress
7 अक्टूबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

कुमाऊं में रेशम धागा कताई की यह नई पहल क्या है?
कुमाऊं मंडल रेशम विभाग ने हल्द्वानी के राजकीय रेशम फार्म, पनियाली में पहली बार महिला स्वयं सहायता समूह के ज़रिए रेशम धागे की कताई शुरू कराई है। 'माँ दुर्गा न्यू रेशम SHG' नाम के इस समूह में 14 महिलाएँ जुड़ी हैं और तैयार धागे की बिक्री उत्तराखंड कोऑपरेटिव फेडरेशन के शोरूम से हो रही है।
इस पहल से महिलाओं को कितनी आय हो रही है?
समूह को कम समय में करीब ₹25,000 की आय हो चुकी है। तैयार रेशम धागे का फिलहाल ₹4,500 प्रति किलो मूल्य मिल रहा है और रेशम विभाग के उपनिदेशक हेमचंद्र ने आगे इसमें बढ़ोतरी की संभावना जताई है।
महिलाओं को रेशम धागा कताई का प्रशिक्षण कैसे दिया जाता है?
रेशम विभाग के वैज्ञानिक राहुल पाल के अनुसार, महिलाओं को पाँच दिवसीय प्रशिक्षण दिया जाता है जिसमें वेस्ट कोकून और टसर से धागा तैयार करने की पूरी प्रक्रिया शामिल है। केंद्रीय रेशम बोर्ड के देहरादून केंद्र का सहयोग भी इस प्रशिक्षण में लिया गया है।
तैयार रेशम धागे की मार्केटिंग कैसे होती है?
तैयार धागे की बिक्री उत्तराखंड कोऑपरेटिव फेडरेशन, देहरादून के शोरूम के माध्यम से की जा रही है। इससे महिलाओं को बाज़ार ढूँढने की ज़रूरत नहीं पड़ती और उन्हें उनके श्रम का उचित मूल्य सीधे मिलता है।
इस पहल का भविष्य में क्या विस्तार होगा?
रेशम विभाग की योजना इस पहल को उत्तराखंड के दूर-दराज के ग्रामीण क्षेत्रों तक बड़े पैमाने पर विस्तारित करने की है। इसका उद्देश्य ग्रामीण महिलाओं को घर के पास स्थायी रोज़गार और 'ब्रांड उत्तराखंड' के रेशम को राष्ट्रीय बाज़ार में नई पहचान दिलाना है।
राष्ट्र प्रेस
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