केंद्र की नई एथेनॉल खरीद नीति से महाराष्ट्र का शुगर उद्योग संकट में, ₹40,000 करोड़ के निवेश पर खतरा
सारांश
मुख्य बातें
केंद्र सरकार की नई एथेनॉल खरीद नीति ने महाराष्ट्र के चीनी उद्योग में हड़कंप मचा दिया है। 16 अक्टूबर 2026 को जारी ताज़ा दिशा-निर्देशों के तहत तेल विपणन कंपनियों (OMC) ने गन्ने के रस, शुगर सिरप और बी-हेवी मोलासेस से उत्पादित एथेनॉल की खरीद पर पूरी तरह रोक लगा दी है। उद्योग जगत का कहना है कि इस फैसले से राज्य में एथेनॉल क्षेत्र में लगे लगभग ₹40,000 करोड़ के निवेश पर सीधा संकट आ गया है।
नई नीति में क्या बदला
आगामी एथेनॉल आपूर्ति वर्ष (1 नवंबर 2026 से 31 अक्टूबर 2027) के लिए सरकार के 1,100 करोड़ लीटर एथेनॉल खरीद लक्ष्य में अब गन्ना-आधारित स्रोतों को शामिल नहीं किया गया है। नई व्यवस्था के तहत केवल सी-हेवी मोलासेस से बने एथेनॉल की ही खरीद की जाएगी।
उद्योग से जुड़े विशेषज्ञों का कहना है कि मौजूदा बाज़ार कीमतों पर केवल सी-हेवी मोलासेस से एथेनॉल उत्पादन आर्थिक रूप से व्यवहार्य नहीं है। यह ऐसे समय में आया है जब देशभर की चीनी मिलें और डिस्टिलरियाँ सरकारी प्रोत्साहन पर भरोसा करके अरबों रुपये के विस्तार में जुटी थीं।
निवेश का पैमाना और उद्योग की स्थिति
महाराष्ट्र राज्य सहकारी चीनी कारखाना महासंघ के आंकड़ों के अनुसार, राज्य की चीनी मिलों की कुल स्थापित एथेनॉल उत्पादन क्षमता लगभग 3,750 मिलियन लीटर है। 2025-26 सीजन में उन्होंने 1,250 मिलियन लीटर एथेनॉल की आपूर्ति की, जो उनकी कुल क्षमता का मात्र 30 प्रतिशत है।
महाराष्ट्र में 16 स्वतंत्र और अनाज-आधारित डिस्टिलरियाँ हैं, जिनकी संयुक्त वार्षिक उत्पादन क्षमता लगभग 56 करोड़ लीटर है। एक प्रमुख सहकारी चीनी मिल के अध्यक्ष के अनुसार, देश की कुल स्थापित एथेनॉल उत्पादन क्षमता लगभग 2,000 करोड़ लीटर है, जिसमें 848 करोड़ लीटर क्षमता अनाज-आधारित संयंत्रों की है। एथेनॉल क्षेत्र में कुल निवेश लगभग ₹1 लाख करोड़ तक पहुँच चुका है।
उन्होंने बताया कि 60 किलोलीटर प्रतिदिन क्षमता वाली अनाज-आधारित डिस्टिलरी स्थापित करने में ₹120 से ₹135 करोड़ की लागत आती है, जबकि 30 किलोलीटर प्रतिदिन क्षमता के छोटे संयंत्र के लिए ₹50 से ₹60 करोड़ के निवेश की ज़रूरत होती है।
उद्योग नेताओं की प्रतिक्रिया
नेशनल फेडरेशन ऑफ कोऑपरेटिव शुगर फैक्ट्रीज के अध्यक्ष और महाराष्ट्र के पूर्व सहकारिता मंत्री हर्षवर्धन पाटिल ने कहा, 'केंद्र सरकार के प्रोत्साहन पर देशभर की चीनी मिलों ने डिस्टिलरी का विस्तार किया और एथेनॉल परियोजनाएं स्थापित कीं, जिससे लगभग ₹1 लाख करोड़ का निवेश आकर्षित हुआ। एथेनॉल मिश्रण कार्यक्रम ने देश को ₹2 लाख करोड़ की विदेशी मुद्रा बचाने में मदद की और किसानों को ₹1.75 लाख करोड़ का लाभ पहुंचाया। अब यह पूरी एथेनॉल-आधारित अर्थव्यवस्था संकट में पड़ सकती है और बैंकों के लिए ₹1 लाख करोड़ तक के एनपीए का जोखिम पैदा हो सकता है।'
शुगर मिल्स एसोसिएशन के अध्यक्ष बी.बी. थोंबरे ने कहा कि केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने पिछले 25 वर्षों में एथेनॉल-आधारित अर्थव्यवस्था को विकसित करने के लिए लगातार प्रयास किए हैं। थोंबरे के अनुसार, 'सूखा और चीनी की कमी जैसी स्थितियाँ अस्थायी होती हैं। सरकार को देश के एथेनॉल क्षेत्र के दीर्घकालिक हितों को ध्यान में रखते हुए सहयोगात्मक और प्रोत्साहन-आधारित नीति अपनानी चाहिए थी।'
महाराष्ट्र सरकार का आकलन
मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस की अध्यक्षता वाली उच्च स्तरीय मंत्रिस्तरीय समिति का अनुमान है कि 2026-27 चीनी सत्र में महाराष्ट्र में लगभग 9.9 करोड़ टन गन्ना पेराई के लिए उपलब्ध होगा। 15 लाख टन चीनी को एथेनॉल उत्पादन की ओर मोड़ने के बाद राज्य में चीनी उत्पादन 96 लाख टन रहने का अनुमान है।
आगे का रास्ता और उद्योग की माँगें
उद्योग प्रतिनिधियों का कहना है कि खरीद प्रतिबंधों के कारण हाल ही में स्थापित एथेनॉल संयंत्र और चीनी मिलें अस्तित्व के संकट का सामना कर सकती हैं। भारी पूंजी निवेश के बाद अब उनके सामने ऋण की मूल राशि और ब्याज चुकाने की चुनौती खड़ी हो गई है।
गौरतलब है कि सहकारी चीनी मिलों ने सरकार से माँग की है कि उन्हें अपनी डिस्टिलरियों को मल्टी-फीड इकाइयों में बदलने के लिए सहायता दी जाए, ताकि मक्का और अन्य अनाजों का उपयोग कर पूरे वर्ष उत्पादन जारी रखा जा सके। केंद्र सरकार की ओर से इस माँग पर अभी तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है।