टीएमसी नाम-चिह्न फ्रीज: ममता बनर्जी ने सुप्रीम कोर्ट में तत्काल सुनवाई की माँग की
सारांश
मुख्य बातें
तृणमूल कांग्रेस (TMC) प्रमुख ममता बनर्जी ने 21 सितंबर 2026 को सर्वोच्च न्यायालय में अपनी याचिका को तत्काल सूचीबद्ध करने की माँग की, जिसमें भारतीय चुनाव आयोग (ECI) के उस अंतरिम फैसले को चुनौती दी गई है जिसके तहत पार्टी के नाम 'ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस' और उसके आरक्षित फूल और घास चुनाव चिह्न को फ्रीज कर दिया गया था। यह विवाद TMC के दो प्रतिद्वंद्वी गुटों के बीच पार्टी की वैधता और संगठनात्मक नियंत्रण को लेकर उपजे गहरे संकट की पृष्ठभूमि में उभरा है।
सर्वोच्च न्यायालय में क्या हुआ
ममता बनर्जी की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) के समक्ष याचिका को शीघ्र सूचीबद्ध करने का अनुरोध किया। सिब्बल ने तर्क दिया कि चुनाव आयोग ने उपचुनाव की अधिसूचना जारी करने के बाद ही चुनाव चिह्न को फ्रीज किया, जिससे उनके मुवक्किल को अनुचित नुकसान हो रहा है।
CJI संजीव खन्ना ने सिब्बल को आश्वस्त किया कि मामले को सूचीबद्ध करने पर विचार किया जाएगा, लेकिन साथ ही स्पष्ट किया कि विरोधी पक्ष को भी अपना पक्ष रखने का अवसर मिलेगा। CJI ने कहा, 'दोनों पक्षों को कुछ न कुछ कहना होगा। जब मामला लिस्ट हो जाए, तब बहस कीजिएगा।'
चुनाव आयोग का अंतरिम आदेश और पृष्ठभूमि
ECI ने गुरुवार को एक अंतरिम आदेश जारी कर दोनों गुटों को TMC के वर्तमान नाम और चुनाव चिह्न के इस्तेमाल से रोक दिया। आयोग ने पाया कि दो प्रतिद्वंद्वी गुट मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल होने का दावा कर रहे थे और इस विवाद को 'चुनाव चिह्न (आरक्षण और आवंटन) आदेश, 1968' के पैरा 15 के तहत निपटाना आवश्यक था।
आयोग ने आगामी उपचुनावों के लिए दोनों गुटों को अलग-अलग पहचान दी। ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले गुट को 'ममता ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस' नाम और फुटबॉल खिलाड़ी का चिह्न आवंटित किया गया, जबकि विरोधी गुट को 'डेमोक्रेटिक तृणमूल कांग्रेस' नाम और लिफाफा चिह्न दिया गया।
पश्चिम बंगाल उपचुनावों पर असर
ECI का यह अंतरिम आदेश पश्चिम बंगाल में 6 अक्टूबर 2026 को होने वाले उपचुनावों पर सीधे लागू होता है, जिनमें नंदीग्राम और रेजीनगर विधानसभा क्षेत्र शामिल हैं। गौरतलब है कि नंदीग्राम वही सीट है जहाँ से ममता बनर्जी 2021 में चुनाव हार गई थीं, जिससे इस क्षेत्र का राजनीतिक महत्त्व और भी बढ़ जाता है।
ममता के नेतृत्व वाले गुट ने ECI के फैसले को मानने से इनकार किया है और याचिका में माँग की है कि अंतिम निर्णय आने तक पार्टी के स्थापित नाम और चिह्न पर रोक न लगाई जाए।
संसद तक पहुँचा विवाद — दलबदल और अयोग्यता
यह संकट केवल राज्य स्तर तक सीमित नहीं रहा। निलंबित विधायक ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व वाले विरोधी गुट ने TMC के संगठनात्मक और विधायी ढाँचे पर नियंत्रण का दावा किया है। इसके अलावा TMC के 20 बागी लोकसभा सांसदों ने अलग होकर 'नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया' के साथ गठबंधन किया और एक स्वतंत्र संसदीय समूह के रूप में मान्यता माँगी है।
ममता गुट ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला की दलबदल विरोधी याचिकाओं पर निर्णय में देरी को भी चुनौती दी थी। 25 अगस्त 2026 को सर्वोच्च न्यायालय ने TMC के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी की याचिका पर 20 बागी सांसदों को नोटिस जारी किए। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को बताया कि अयोग्यता कार्यवाही में सांसदों को पहले ही नोटिस भेजे जा चुके हैं।
बागी गुट का दावा है कि उसके पास TMC के दो-तिहाई से अधिक लोकसभा सांसदों का समर्थन है, जो दलबदल विरोधी कानून के तहत विलय के लिए आवश्यक संख्या है। यह कानूनी और संसदीय लड़ाई अब एक साथ तीन मोर्चों — चुनाव आयोग, सर्वोच्च न्यायालय और संसद — पर लड़ी जा रही है।
आगे क्या होगा
सर्वोच्च न्यायालय के सूचीबद्ध करने के आश्वासन के बाद अब नज़रें इस बात पर हैं कि क्या अदालत उपचुनाव की तारीख से पहले कोई अंतरिम राहत देती है। 6 अक्टूबर की समयसीमा को देखते हुए ममता गुट के पास बेहद कम वक्त है। ECI के अंतिम आदेश और सर्वोच्च न्यायालय के फैसले, दोनों मिलकर यह तय करेंगे कि भारत की सबसे प्रमुख क्षेत्रीय पार्टियों में से एक का भविष्य किस दिशा में जाता है।