TMC नाम-चुनाव चिह्न विवाद: सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग से माँगी समय-सीमा, 28 सितंबर को अगली सुनवाई
सारांश
मुख्य बातें
सर्वोच्च न्यायालय ने 24 सितंबर 2026 को भारत के चुनाव आयोग (ECI) को निर्देश दिया कि वह तृणमूल कांग्रेस (TMC) के नाम और 'फूल और घास' आरक्षित चुनाव चिह्न को लेकर चल रहे विवाद में अंतिम फैसला करने की एक व्यावहारिक समय-सीमा तय करे। कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि यह मामला अनिश्चित काल तक नहीं खींचा जाना चाहिए और अगली सुनवाई 28 सितंबर 2026 के लिए निर्धारित की।
मामले की पृष्ठभूमि
यह विवाद तब शुरू हुआ जब ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व वाले विरोधी गुट ने ECI के समक्ष 'ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस' के नाम और संगठनात्मक ढाँचे पर अपना दावा पेश किया। आयोग ने 'चुनाव चिह्न (आरक्षण और आवंटन) आदेश, 1968' के पैराग्राफ 15 के तहत एक अंतरिम आदेश पारित करते हुए दोनों गुटों को पार्टी के स्थापित नाम और चुनाव चिह्न के उपयोग से अस्थायी रूप से रोक दिया।
इसके बाद ECI ने ममता बनर्जी के गुट को 'ममता ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस' नाम और 'फुटबॉल खिलाड़ी' चुनाव चिह्न आवंटित किया। वहीं, विरोधी गुट को 'डेमोक्रेटिक तृणमूल कांग्रेस' नाम और 'लिफाफा' चुनाव चिह्न दिया गया। यह अंतरिम व्यवस्था नंदीग्राम और रेजीनगर विधानसभा क्षेत्रों में 6 अक्टूबर 2026 को होने वाले उपचुनावों पर लागू होती है।
सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी
भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) की अगुवाई वाली पीठ, जिसमें जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना शामिल हैं, ने ECI के वकील से कहा — 'हमें एक उचित समय-सीमा बताएं जिसमें पार्टियों को अपने सबूत पेश करने का निष्पक्ष मौका मिले, लेकिन मामला लंबा न खिंचे और आपको भी सोचने-समझने के लिए पर्याप्त समय मिले। कुछ व्यावहारिक होना चाहिए।'
कोर्ट ने ECI को प्रस्तावित समय-सीमा अगली सुनवाई में पेश करने का निर्देश दिया। गौरतलब है कि यह मामला ऐसे समय में शीर्ष अदालत पहुँचा है जब कोलकाता नगर निगम समेत कई स्थानीय निकाय चुनाव भी क्षितिज पर हैं।
ममता गुट के तर्क
ममता बनर्जी की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने कहा कि याचिका में उपचुनावों पर रोक की माँग नहीं है, बल्कि यह सुनिश्चित करने का आग्रह है कि ECI विवाद का शीघ्र निपटारा करे। उन्होंने ECI के अंतरिम आदेश के समय पर सवाल उठाते हुए कहा कि विवाद जुलाई 2026 में ही आयोग के पास पहुँच गया था, किंतु नाम और चुनाव चिह्न को फ्रीज करने का फैसला उपचुनाव प्रक्रिया शुरू होने के बाद लिया गया।
सिब्बल ने तर्क दिया — 'क्या चुनाव आयोग मामलों में देरी कर सकता है और फिर चुनाव के बीच आदेश जारी कर सकता है, यह जानते हुए कि मेरे पास कोई उपाय नहीं बचेगा? आपने यह आदेश चुनाव के बीच जारी किया है।' उन्होंने यह भी कहा कि ममता बनर्जी के गुट ने जुलाई में ही अपना जवाब दाखिल कर दिया था, लेकिन कार्यवाही जारी रहते हुए विरोधी गुट को अतिरिक्त समय दिया गया।
सिब्बल ने अनुरोध किया कि इस विवाद का निपटारा अक्टूबर 2026 तक हो जाए, क्योंकि इसके बाद कोलकाता नगर निगम सहित अन्य स्थानीय निकाय चुनाव होने हैं।
विरोधी गुट के तर्क
विरोधी गुट की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने कहा कि उनका पक्ष ECI के समक्ष कार्यवाही में सहयोग करने को तैयार है — 'हम सहयोग करेंगे क्योंकि हमें चुनाव चिह्न चाहिए।' हालाँकि, उन्होंने अक्टूबर की समय-सीमा का विरोध करते हुए पर्याप्त समय की माँग रखी।
उसी पक्ष के वरिष्ठ अधिवक्ता नीरज किशन कौल ने कहा कि इस विवाद में तथ्यों से जुड़े जटिल सवाल शामिल हैं, जिनके लिए हलफनामों और विस्तृत साक्ष्यों की आवश्यकता होगी। उनके अनुसार — 'लोकतंत्र की सेहत के लिए, हमें जल्द फैसले में कोई दिक्कत नहीं है, लेकिन यह कहना कि इसे 10 या 20 दिनों में किया जाए, शायद सही नहीं होगा।' कौल ने यह भी तर्क दिया कि ECI के पास किसी राजनीतिक पार्टी के नाम और चुनाव चिह्न के विवाद की सुनवाई के दौरान अंतरिम निर्देश जारी करने की व्यापक शक्ति है।
संसद तक फैला विवाद और आगे की राह
यह संगठनात्मक टकराव संसद तक भी पहुँचा, जहाँ TMC के 20 बागी लोकसभा सांसदों ने अलग होकर 'नेशनलिस्ट सिटिजन पार्टी ऑफ इंडिया' (NCPI) के साथ गठबंधन किया और एक अलग संसदीय समूह के रूप में मान्यता का दावा किया। ममता बनर्जी के गुट ने दलबदल विरोधी कानून के तहत इन सांसदों के खिलाफ अयोग्यता याचिकाओं पर निर्णय में हुई देरी को भी चुनौती दी थी।
अब सबकी निगाहें 28 सितंबर 2026 की सुनवाई पर टिकी हैं, जब ECI सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष अपनी प्रस्तावित समय-सीमा प्रस्तुत करेगा — और यह तय होगा कि 6 अक्टूबर के उपचुनाव से पहले पार्टी के असल चुनाव चिह्न का सवाल सुलझ पाएगा या नहीं।