TMC चुनाव चिह्न विवाद: ऋतब्रत बनर्जी बोले — 'लोकतंत्र में तानाशाही और वंशवाद की कोई जगह नहीं'
सारांश
मुख्य बातें
पश्चिम बंगाल विधानसभा में विपक्ष के नेता ऋतब्रत बनर्जी ने 18 सितंबर 2026 को कोलकाता में तृणमूल कांग्रेस (TMC) के नाम और चुनाव चिह्न को फ्रीज करने के चुनाव आयोग (ECI) के अंतरिम आदेश पर तीखी प्रतिक्रिया दी। बनर्जी ने कहा कि यह फैसला साबित करता है कि राजनीतिक दलों को न तो निजी संस्था की तरह संचालित किया जा सकता है और न ही उनका उत्तराधिकार वंशवाद के आधार पर तय होता है।
मुख्य घटनाक्रम
चुनाव आयोग ने अपने अंतरिम आदेश में कहा कि 'ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस' के भीतर दो विरोधी गुट उभर आए हैं — एक का नेतृत्व ममता बनर्जी कर रही हैं और दूसरे का अरूप रॉय। दोनों गुट स्वयं को ही असली पार्टी घोषित कर रहे हैं। आयोग ने चुनाव चिह्न (आरक्षण और आवंटन) आदेश, 1968 के पैरा 15 के तहत विवाद सुलझने तक दोनों पक्षों को नए नाम और चिह्न चुनने का निर्देश दिया है।
आयोग ने अपने आदेश में स्पष्ट किया, 'रिकॉर्ड पर मौजूद सभी जानकारियों पर उचित विचार करने के बाद आयोग का मानना है कि ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस में दो विरोधी गुट हैं — एक का नेतृत्व ममता बनर्जी कर रही हैं और दूसरे का अरूप रॉय। दोनों गुट अब खुद को ही असली पार्टी बता रहे हैं।'
ऋतब्रत बनर्जी की प्रतिक्रिया
ऋतब्रत बनर्जी ने कहा, 'प्लेन से उतरते ही हमें पता चला कि चुनाव चिह्न और पार्टी का नाम फ्रीज कर दिया गया है। हालांकि, एक बात साफ है — लोकतंत्र में तानाशाही के लिए कोई जगह नहीं है।' उन्होंने आगे कहा कि चुनाव आयोग के इस आदेश से यह भी स्पष्ट हो गया कि 'राजनीतिक दल कोई प्राइवेट लिमिटेड कंपनी नहीं होती और न ही किसी राजनीतिक दल का कोई वारिस हो सकता है।'
गौरतलब है कि यह बयान उस पार्टी आंतरिक संकट की पृष्ठभूमि में आया है जिसमें ममता बनर्जी और अरूप रॉय गुट के बीच संगठनात्मक वर्चस्व को लेकर खींचतान जारी है।
उपचुनावों पर असर
आयोग के इस अंतरिम फैसले का सबसे तत्काल असर पश्चिम बंगाल में 6 अक्टूबर को प्रस्तावित विधानसभा उपचुनावों पर पड़ेगा। नंदीग्राम और रेजीनगर निर्वाचन क्षेत्रों में होने वाले इन उपचुनावों में TMC के विरोधी गुटों को अब नए नाम और चिह्न के साथ मैदान में उतरना होगा, जो मतदाताओं के बीच भ्रम की स्थिति पैदा कर सकता है।
यह ऐसे समय में आया है जब पश्चिम बंगाल की राजनीति में TMC पहले से ही विपक्षी दबाव का सामना कर रही है। चुनाव चिह्न और नाम की पहचान किसी दल की चुनावी सफलता के लिए निर्णायक मानी जाती है।
कानूनी और राजनीतिक पृष्ठभूमि
चुनाव आयोग ने 1968 के चुनाव चिह्न आदेश के तहत यह कदम उठाया है, जो आयोग को पार्टी विभाजन की स्थिति में दोनों गुटों से अलग नाम और चिह्न लेने का अधिकार देता है। यह पहला अवसर नहीं है जब किसी बड़े दल के साथ ऐसा हुआ हो — इससे पहले शिवसेना और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) के विभाजन के दौरान भी आयोग ने इसी प्रावधान का उपयोग किया था।
आलोचकों का कहना है कि TMC का यह संकट पार्टी के भीतर लोकतांत्रिक संरचना की कमज़ोरी को उजागर करता है, जहाँ शीर्ष नेतृत्व के इर्द-गिर्द निर्णय केंद्रित रहे हैं।
क्या होगा आगे
अब दोनों गुटों को आयोग के समक्ष अपना दावा मज़बूत करने के लिए दस्तावेज़ और समर्थन प्रस्तुत करने होंगे। अंतिम फैसला आने तक दोनों धड़े अस्थायी नाम और चिह्न के साथ 6 अक्टूबर के उपचुनाव लड़ेंगे। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह विवाद TMC की चुनावी साख और संगठनात्मक एकता दोनों के लिए कड़ी परीक्षा है।