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TMC नाम और 'फूल-घास' चिन्ह फ्रीज: चुनाव आयोग ने ममता व अरूप रॉय दोनों गुटों को दिया 18 सितंबर तक अल्टीमेटम

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TMC नाम और 'फूल-घास' चिन्ह फ्रीज: चुनाव आयोग ने ममता व अरूप रॉय दोनों गुटों को दिया 18 सितंबर तक अल्टीमेटम

सारांश

चुनाव आयोग ने तृणमूल कांग्रेस के नाम और 'फूल-घास' चिन्ह को फ्रीज कर ममता बनर्जी और अरूप रॉय दोनों गुटों को एक बड़ा झटका दिया है। 18 सितंबर तक नए नाम और चिन्ह देने की समय-सीमा तय की गई है — पश्चिम बंगाल की राजनीति में उथल-पुथल अब और गहरी हो गई है।

मुख्य बातें

चुनाव आयोग (ECI) ने 17 सितंबर 2026 को AITMC के नाम और 'फूल-घास' चुनाव चिन्ह को अंतरिम रूप से फ्रीज किया।
न ममता बनर्जी गुट और न अरूप रॉय गुट अकेले 'एआईटीएमसी' नाम का उपयोग कर सकेगा।
दोनों पक्षों को 18 सितंबर, सुबह 11 बजे तक नए नाम और पसंदीदा चुनाव चिन्हों के विकल्प आयोग को सौंपने हैं।
दोनों गुटों को आयोग की मुक्त चिन्हों (फ्री सिंबल्स) की सूची में से अलग-अलग चिन्ह आवंटित किए जाएंगे।
आयोग ने 12 सितंबर और 17 सितंबर दोनों को दोनों पक्षों की सुनवाई की; अंतरिम निर्णय अतिरिक्त दस्तावेजों के आधार पर लिया गया।
आगामी उपचुनावों में दोनों गुट अलग-अलग नाम और चिन्ह के साथ चुनावी मैदान में उतरेंगे।

चुनाव आयोग (ECI) ने 17 सितंबर 2026 को अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस (AITMC) के नाम और उसके आरक्षित चुनाव चिन्ह 'फूल-घास' को अंतरिम रूप से फ्रीज कर दिया है। आयोग के इस फैसले के बाद न तो ममता बनर्जी नीत गुट और न ही अरूप रॉय नीत गुट अकेले 'एआईटीएमसी' नाम का उपयोग कर सकेगा। दोनों पक्षों को 18 सितंबर, सुबह 11 बजे तक अपने नए नाम और पसंदीदा चुनाव चिन्हों के विकल्प आयोग को सौंपने का निर्देश दिया गया है।

मुख्य घटनाक्रम

चुनाव आयोग ने 17 सितंबर को नई दिल्ली में दोनों गुटों के प्रतिनिधियों से अलग-अलग मुलाकात कर अंतिम दौर की सुनवाई पूरी की। ऋतब्रत बनर्जी और अरूप रॉय के नेतृत्व वाले बागी गुट के प्रतिनिधियों को दोपहर 3 बजे बुलाया गया था, जबकि ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी के नेतृत्व वाले गुट की सुनवाई शाम 4 बजे हुई।

इससे पूर्व 12 सितंबर को भी आयोग ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनी थीं, लेकिन तब अतिरिक्त दस्तावेज मांगते हुए निर्णय टाल दिया गया था। उन्हीं दस्तावेजों और अंतिम दलीलों के आधार पर यह अंतरिम फैसला लिया गया है।

आयोग का आदेश — क्या कहा गया

आयोग के आदेश के अनुसार दोनों गुटों को पार्टी के मूल नाम और चुनाव चिन्ह के उपयोग की अनुमति नहीं होगी। हालाँकि, दोनों पक्ष अपने नए नाम के साथ मूल पार्टी 'एआईटीएमसी' से अपने संबंध का उल्लेख कर सकते हैं।

नए चुनाव चिन्हों के लिए दोनों गुटों को चुनाव आयोग द्वारा अधिसूचित मुक्त चिन्हों (फ्री सिंबल्स) की सूची में से अलग-अलग विकल्प चुनने होंगे, जो आयोग द्वारा आवंटित किए जाएंगे।

विवाद की पृष्ठभूमि

तृणमूल कांग्रेस के नाम और चुनाव चिन्ह को लेकर दोनों गुटों के बीच लंबे समय से टकराव जारी है। दोनों पक्ष स्वयं को पार्टी का वैध प्रतिनिधि बता रहे हैं — एक ओर ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी का खेमा है, तो दूसरी ओर बागी विधायक ऋतब्रत बनर्जी और अरूप रॉय का गुट पार्टी संगठन तथा चुनाव चिन्ह पर अपना दावा ठोक रहा है।

गौरतलब है कि यह ऐसे समय में आया है जब पश्चिम बंगाल में आगामी उपचुनावों की तैयारियाँ चल रही हैं, जिससे इस विवाद का राजनीतिक महत्त्व और भी बढ़ गया है। यह वैसी ही स्थिति है जो अतीत में शिवसेना और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) के विभाजन के समय उत्पन्न हुई थी, जब चुनाव आयोग को नाम और चिन्ह पर अंतरिम आदेश देना पड़ा था।

आम जनता और राजनीति पर असर

चुनाव आयोग के इस फैसले के बाद पश्चिम बंगाल की राजनीति में हलचल तेज हो गई है। आगामी उपचुनावों में दोनों गुट अब अलग-अलग नाम और चुनाव चिन्ह के साथ मैदान में उतरेंगे, जिससे मतदाताओं में भ्रम की स्थिति पैदा हो सकती है।

विशेषज्ञों का मानना है कि पार्टी का विभाजन वोट-बैंक को बाँट सकता है और इसका सीधा फायदा भारतीय जनता पार्टी (BJP) तथा वामपंथी दलों को मिल सकता है।

क्या होगा आगे

सभी की नज़रें अब 18 सितंबर पर टिकी हैं, जब दोनों गुटों को अपने-अपने नए नाम और चुनाव चिन्ह के विकल्प चुनाव आयोग को सौंपने हैं। आयोग इसके बाद अंतिम आवंटन करेगा। यह देखना बाकी है कि दोनों गुट किस नाम और चिन्ह को अपनी राजनीतिक पहचान बनाते हैं और पश्चिम बंगाल की राजनीति में इसके दूरगामी नतीजे क्या होंगे।

संपादकीय दृष्टिकोण

जैसा शिवसेना और NCP के साथ हुआ। चुनाव आयोग का अंतरिम आदेश तकनीकी रूप से निष्पक्ष है, लेकिन असली सवाल यह है कि 'फूल-घास' जैसे परिचित चिन्ह के बिना दोनों गुट मतदाताओं में अपनी साख कैसे बनाए रखेंगे। पश्चिम बंगाल के उपचुनावों में यही वोट-विभाजन BJP के लिए अनायास अवसर बन सकता है। मुख्यधारा की कवरेज जो चूक रही है वह यह है कि इस विवाद का असर केवल पार्टी पर नहीं, बल्कि उन लाखों मतदाताओं पर भी होगा जो 'फूल-घास' के नाम पर दशकों से वोट देते आए हैं।
RashtraPress
17 सितंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

चुनाव आयोग ने तृणमूल कांग्रेस का नाम और चुनाव चिन्ह क्यों फ्रीज किया?
चुनाव आयोग ने AITMC पर दो गुटों — ममता बनर्जी नीत गुट और अरूप रॉय-ऋतब्रत बनर्जी नीत बागी गुट — के बीच जारी दावे के विवाद को देखते हुए अंतरिम रूप से पार्टी का नाम और 'फूल-घास' चुनाव चिन्ह फ्रीज किया है। यह कदम तब तक के लिए है जब तक दोनों गुट अपने नए नाम और चुनाव चिन्ह नहीं चुन लेते।
18 सितंबर की समय-सीमा का क्या मतलब है?
चुनाव आयोग ने दोनों गुटों को 18 सितंबर, सुबह 11 बजे तक अपने-अपने नए नाम और पसंदीदा मुक्त चुनाव चिन्हों के विकल्प आयोग को सौंपने का निर्देश दिया है। इसके आधार पर आयोग दोनों को अलग-अलग पहचान आवंटित करेगा।
क्या दोनों गुट अपने नाम में 'तृणमूल कांग्रेस' का ज़िक्र कर सकते हैं?
हाँ, चुनाव आयोग के आदेश के अनुसार दोनों गुट अपने नए नाम के साथ मूल पार्टी 'एआईटीएमसी' से अपने संबंध का उल्लेख कर सकते हैं। हालाँकि, मूल नाम का एकल रूप में उपयोग किसी को भी नहीं करने दिया जाएगा।
इस फैसले का पश्चिम बंगाल के आगामी उपचुनावों पर क्या असर होगा?
आगामी उपचुनावों में दोनों गुट अब अलग-अलग नाम और चुनाव चिन्ह के साथ मैदान में उतरेंगे। इससे TMC का पारंपरिक वोट-बैंक विभाजित हो सकता है, जिसका संभावित फायदा विपक्षी दलों को मिल सकता है।
तृणमूल कांग्रेस विभाजन विवाद की शुरुआत कब और कैसे हुई?
पार्टी में दरार तब से स्पष्ट हुई जब बागी विधायक ऋतब्रत बनर्जी और अरूप रॉय के नेतृत्व में एक गुट ने खुद को असली AITMC का प्रतिनिधि बताते हुए पार्टी के नाम और चुनाव चिन्ह पर दावा ठोका। चुनाव आयोग ने 12 सितंबर को पहली सुनवाई की और 17 सितंबर को अंतिम सुनवाई के बाद यह अंतरिम आदेश जारी किया।
राष्ट्र प्रेस
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