ममता बनर्जी ने सीजेपी नेताओं की तत्काल रिहाई की मांग की, हिरासत को बताया 'राज्य-प्रायोजित आतंकवाद'
सारांश
मुख्य बातें
तृणमूल कांग्रेस (TMC) प्रमुख और पश्चिम बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने 20 अक्टूबर 2026 को 'कॉकरोच जनता पार्टी' (सीजेपी) के नेताओं आशुतोष रांका और सौरव दास की तत्काल रिहाई की माँग की है। नई दिल्ली के जंतर-मंतर पर कथित अनधिकृत प्रवेश के मामले में उनकी न्यायिक हिरासत दो दिन और बढ़ाए जाने के बाद बनर्जी ने एक्स पर पोस्ट करते हुए इसे 'राज्य-प्रायोजित आतंकवाद' करार दिया।
मामले का पृष्ठभूमि
आशुतोष रांका और सौरव दास को 14 अक्टूबर 2026 को पाँच दिन की न्यायिक हिरासत में भेजा गया था। उन पर आरोप है कि उन्होंने जंतर-मंतर पर कथित तौर पर अनधिकृत रूप से प्रवेश किया, जबकि यह स्थल अब आधिकारिक रूप से विरोध-प्रदर्शन के लिए मान्यता-प्राप्त नहीं है। सोमवार को पाँच दिन की हिरासत समाप्त होने के बाद दोनों नेताओं को मंदिर मार्ग पुलिस स्टेशन में स्पेशल एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट (एसईएम) के सामने पेश किया गया।
न्यायिक हिरासत विस्तार और कानूनी विवाद
दिल्ली पुलिस ने दोनों की हिरासत और बढ़ाने की माँग की, जिसे एसईएम अदालत ने दो दिन के लिए स्वीकार कर लिया। सीजेपी की कानूनी मामलों की प्रमुख रत्ना सिंह ने इस पर कड़ा ऐतराज जताया। उन्होंने एक्स पर लिखा, 'न्यायिक हिरासत बढ़ाने का कोई कारण नहीं है। आज भी सरकारी वकील की ओर से कानून के संबंध में कोई दलील नहीं दी गई। उनकी सभी दलीलें केवल अटकलें थीं।' सिंह ने पूरी कार्यवाही को 'समय की बर्बादी' बताते हुए दोनों नेताओं की तत्काल रिहाई की माँग दोहराई।
ममता बनर्जी का तीखा बयान
बनर्जी ने एक्स पर अपनी पोस्ट में लिखा, 'मैं आशुतोष और सौरव की हिरासत बढ़ाने के पीछे के हताश इरादों को समझ सकती हूँ। यह एक खतरनाक वायरस है, जिसका इस्तेमाल रोज़ाना लोकतंत्र पर हमला करने के लिए किया जा रहा है। जेन जी को प्रताड़ित करना बंद करें। जो लोग आज सत्ता में हैं, वे कल सत्ता में नहीं रहेंगे।' उन्होंने स्वतंत्रता सेनानियों का उल्लेख करते हुए कहा कि जब हमारे पूर्वज औपनिवेशिक शासकों के खिलाफ खड़े हुए थे, तब भी उन्हें अत्याचारों का सामना करना पड़ा था, फिर भी वे डटे रहे।
बनर्जी ने आगे जोड़ा, 'अगर आप लोकतंत्र में यकीन रखते हैं, तो आशुतोष और सौरव को तुरंत रिहा करें।' उन्होंने कोलकाता से लेकर दिल्ली और मुंबई तक अत्याचारों का ज़िक्र करते हुए इसे पुलिस-प्रायोजित दमन करार दिया। यह ऐसे समय में आया है जब विपक्षी दलों और नागरिक समाज संगठनों के साथ केंद्र सरकार के टकराव की घटनाएँ बढ़ रही हैं।
राजनीतिक संदर्भ और व्यापक असर
गौरतलब है कि जंतर-मंतर को लेकर दिल्ली पुलिस और विरोध-प्रदर्शनकारियों के बीच टकराव नई बात नहीं है। यह स्थल दशकों से नागरिक अधिकारों और राजनीतिक प्रदर्शनों का केंद्र रहा है, लेकिन अनुमति नियमों को लेकर समय-समय पर विवाद होते रहे हैं। आलोचकों का कहना है कि हिरासत बढ़ाने की प्रक्रिया में कानूनी आधार की कमी लोकतांत्रिक असहमति को दबाने का प्रयास दर्शाती है, जबकि पुलिस का कहना है कि प्रवेश नियमों का उल्लंघन स्पष्ट था।
आगे क्या होगा
सीजेपी की कानूनी टीम अदालत में चुनौती देने की तैयारी में है। रत्ना सिंह ने संकेत दिया है कि अभियोजन पक्ष के कमज़ोर तर्कों के मद्देनज़र उच्च न्यायालय का दरवाज़ा खटखटाया जा सकता है। इस मामले पर राष्ट्रीय राजनीतिक नज़रें टिकी हुई हैं और आने वाले दिनों में इस पर और तेज़ प्रतिक्रियाएँ सामने आने की संभावना है।