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मानसिक स्वास्थ्य कलंक नहीं, जागरूकता का विषय है — यूनिसेफ ने तोड़े 7 बड़े मिथक

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मानसिक स्वास्थ्य कलंक नहीं, जागरूकता का विषय है — यूनिसेफ ने तोड़े 7 बड़े मिथक

सारांश

यूनिसेफ के अनुसार दुनिया भर में 14% किशोर मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ रहे हैं और आधी से अधिक समस्याएँ 14 साल तक शुरू हो जाती हैं। फिर भी समाज में फैले 7 बड़े मिथक लोगों को मदद लेने से रोकते हैं — इन्हें तोड़ना अब ज़रूरी है।

मुख्य बातें

यूनिसेफ ने मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े 7 प्रमुख मिथकों और उनके तथ्य-आधारित खंडन सार्वजनिक किए हैं।
दुनिया भर में लगभग 14 प्रतिशत किशोर मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं से प्रभावित हैं।
मानसिक स्वास्थ्य की आधी से अधिक समस्याएँ 14 वर्ष की आयु तक शुरू हो जाती हैं।
10 से 19 वर्ष की आयु में आत्महत्या मृत्यु के प्रमुख कारणों में शामिल है।
मज़बूत पारिवारिक रिश्ते, सकारात्मक स्कूली माहौल और भावनात्मक कौशल मानसिक समस्याओं से बचाव में सहायक हैं।
मदद माँगना कमज़ोरी नहीं, बल्कि साहस और आत्मजागरूकता का प्रमाण है।

मानसिक स्वास्थ्य आज भी भारतीय समाज में सर्वाधिक कलंकित विषयों में से एक बना हुआ है। जानकारी के अभाव में लोग इसे व्यक्तिगत कमज़ोरी मान लेते हैं या चुपचाप नज़रअंदाज़ कर देते हैं। संयुक्त राष्ट्र बाल कोष (यूनिसेफ) ने इस सामाजिक भ्रम को दूर करने के लिए 7 प्रचलित मिथकों और उनके तथ्य-आधारित खंडन सामने रखे हैं, ताकि किशोर और युवा बिना झिझक मदद ले सकें।

मिथक और सच: एक नज़र में

पहला मिथक: मानसिक स्वास्थ्य समस्या केवल कमज़ोर बुद्धि वाले लोगों को होती है।
सच: मानसिक बीमारी किसी भी व्यक्ति को हो सकती है — चाहे उसकी बुद्धिमत्ता, सामाजिक प्रतिष्ठा या आर्थिक स्थिति कुछ भी हो। यह शारीरिक बीमारी की तरह है और किसी की समझदारी पर सवाल नहीं उठाती।

दूसरा मिथक: मानसिक स्वास्थ्य का ध्यान तभी रखना चाहिए जब कोई समस्या उत्पन्न हो जाए।
सच: विशेषज्ञों के अनुसार, प्रत्येक व्यक्ति को अपने मानसिक स्वास्थ्य का ख़याल उसी तरह रखना चाहिए जैसे शारीरिक स्वास्थ्य का। स्वस्थ दिनचर्या और सकारात्मक आदतें मानसिक रूप से भी सेहतमंद बनाए रखती हैं।

किशोरों में मानसिक स्वास्थ्य की वास्तविकता

तीसरा मिथक: किशोरों में खराब मानसिक स्वास्थ्य कोई बड़ी समस्या नहीं, यह महज़ हार्मोनल बदलाव है।
सच: यूनिसेफ के आँकड़ों के अनुसार, दुनिया भर में लगभग 14 प्रतिशत किशोर मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ रहे हैं। 10 से 19 वर्ष की आयु में आत्महत्या मृत्यु के प्रमुख कारणों में शामिल है। चिंताजनक तथ्य यह है कि मानसिक स्वास्थ्य की आधी से अधिक समस्याएँ 14 वर्ष की उम्र तक ही शुरू हो जाती हैं।

यह ऐसे समय में और भी महत्त्वपूर्ण हो जाता है जब शैक्षणिक दबाव, सोशल मीडिया और पारिवारिक अपेक्षाएँ किशोरों पर एक साथ असर डाल रही हैं। गौरतलब है कि मूड स्विंग्स और गंभीर मानसिक विकार के बीच का अंतर पहचानना अभिभावकों और शिक्षकों दोनों के लिए ज़रूरी है।

बचाव और सहयोग संभव है

चौथा मिथक: मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं से बचाव नहीं किया जा सकता।
सच: विशेषज्ञ बताते हैं कि मज़बूत पारिवारिक रिश्ते, सकारात्मक स्कूली माहौल, भावनात्मक कौशल का विकास और नियमित दिनचर्या मानसिक समस्याओं से बचाव में प्रभावी भूमिका निभाते हैं।

पाँचवाँ मिथक: मानसिक समस्या होना कमज़ोरी की निशानी है।
सच: मानसिक समस्या का कमज़ोर इच्छाशक्ति या व्यक्तिगत कमज़ोरी से कोई संबंध नहीं है। मदद माँगना कमज़ोरी नहीं, बल्कि साहस और आत्मजागरूकता का प्रमाण है।

सामाजिक स्थिति और परवरिश से जुड़े भ्रम

छठा मिथक: अच्छे ग्रेड पाने वाले और लोकप्रिय किशोरों को मानसिक समस्या नहीं हो सकती।
सच: अवसाद (डिप्रेशन) और चिंता (एंग्ज़ायटी) किसी को भी हो सकती है। बाहर से सफल और खुशहाल दिखने वाला व्यक्ति भी भीतर से गहरे दबाव या मानसिक पीड़ा में हो सकता है।

सातवाँ मिथक: खराब परवरिश की वजह से ही किशोरों में मानसिक समस्याएँ होती हैं।
सच: मानसिक स्वास्थ्य समस्याएँ कई जटिल कारणों का परिणाम हो सकती हैं — जैसे गरीबी, हिंसा, बेरोज़गारी और पारिवारिक चुनौतियाँ। इसे केवल माता-पिता की विफलता मानना न सिर्फ गलत है, बल्कि समस्या को और गहरा करता है।

आगे की राह

इन मिथकों को तोड़ना केवल जागरूकता का काम नहीं, बल्कि एक सामाजिक ज़िम्मेदारी है। जब परिवार, स्कूल और समाज मिलकर मानसिक स्वास्थ्य को सामान्य बातचीत का हिस्सा बनाएँगे, तभी ज़रूरतमंद व्यक्ति बिना डर और शर्म के सहायता ले सकेगा। विशेषज्ञों का मानना है कि सही समय पर मदद लेना जीवन बचा सकता है।

संपादकीय दृष्टिकोण

फिर भी कलंक की दीवार टूटती नहीं दिखती — यह संरचनात्मक विफलता है, न कि सूचना की कमी। यूनिसेफ के आँकड़े बताते हैं कि 14% किशोर प्रभावित हैं, लेकिन स्कूल पाठ्यक्रम में मानसिक स्वास्थ्य शिक्षा अभी भी हाशिये पर है। असली सवाल यह है कि जागरूकता अभियान सोशल मीडिया पोस्ट से आगे बढ़कर परामर्श सेवाओं की सुलभता और बीमा कवरेज तक कब पहुँचेंगे। जब तक नीतिगत स्तर पर मानसिक स्वास्थ्य को शारीरिक स्वास्थ्य के बराबर दर्जा नहीं मिलता, मिथक तोड़ने की मुहिम अधूरी रहेगी।
RashtraPress
16 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

मानसिक स्वास्थ्य समस्या क्या केवल कमज़ोर लोगों को होती है?
नहीं, यह एक प्रचलित मिथक है। मानसिक बीमारी किसी भी व्यक्ति को हो सकती है — चाहे उसकी बुद्धिमत्ता, सामाजिक प्रतिष्ठा या आर्थिक स्थिति कुछ भी हो। यह शारीरिक बीमारी की तरह है और किसी की समझदारी या इच्छाशक्ति पर सवाल नहीं उठाती।
किशोरों में मानसिक स्वास्थ्य की स्थिति कितनी गंभीर है?
यूनिसेफ के आँकड़ों के अनुसार दुनिया भर में लगभग 14 प्रतिशत किशोर मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ रहे हैं। 10 से 19 वर्ष की आयु में आत्महत्या मृत्यु के प्रमुख कारणों में शामिल है और आधी से अधिक मानसिक समस्याएँ 14 वर्ष की उम्र तक शुरू हो जाती हैं।
क्या मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं से बचाव संभव है?
हाँ, विशेषज्ञों के अनुसार कई प्रभावी तरीके हैं। मज़बूत पारिवारिक रिश्ते, सकारात्मक स्कूली माहौल, भावनात्मक कौशल का विकास और नियमित दिनचर्या मानसिक समस्याओं से बचाव में सहायक होते हैं।
क्या अच्छे ग्रेड वाले या सफल किशोरों को मानसिक समस्या हो सकती है?
हाँ, अवसाद और चिंता किसी को भी हो सकती है। बाहर से सफल और खुशहाल दिखने वाला व्यक्ति भी भीतर से गहरे दबाव या मानसिक पीड़ा में हो सकता है — सामाजिक स्थिति या शैक्षणिक सफलता इससे सुरक्षा नहीं देती।
किशोरों में मानसिक समस्याओं के लिए क्या केवल परवरिश ज़िम्मेदार है?
नहीं, यह एक भ्रामक धारणा है। मानसिक स्वास्थ्य समस्याएँ कई जटिल कारणों से उत्पन्न हो सकती हैं — जैसे गरीबी, हिंसा, बेरोज़गारी और पारिवारिक चुनौतियाँ। इसे केवल माता-पिता की विफलता मानना न सिर्फ गलत है, बल्कि समस्या को और गहरा करता है।
राष्ट्र प्रेस
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