मौलाना मदनी का कड़ा बयान: मुसलमानों को दोयम दर्जे का नागरिक बनाने वाले देश के असली दुश्मन
सारांश
मुख्य बातें
जमीयत उलेमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना महमूद असद मदनी ने 31 अक्टूबर को नूंह, मेवात, हरियाणा में आयोजित संगठन की कार्यकारिणी समिति की बैठक में कहा कि जो लोग मुसलमानों को उनके अपने देश में 'पराया' और 'दोयम दर्जे का नागरिक' बनाने की कोशिश कर रहे हैं, वे वास्तव में देश के दुश्मन हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि भारत में मुसलमान किसी की दया पर नहीं, बल्कि अपने पूर्वजों की आज़ादी की लड़ाई में दी गई कुर्बानियों के बल पर जी रहे हैं।
बैठक का संदर्भ और उपस्थित प्रमुख हस्तियाँ
यह दो दिवसीय बैठक 30 और 31 अक्टूबर को डीएलडी स्प्रिंगफील्ड, पीपाका, नूंह, मेवात, हरियाणा में आयोजित की गई। इसमें दारुल उलूम देवबंद के मोहतमिम मौलाना अबुल कासिम नोमानी, जमीयत उलेमा-ए-हिंद के उपाध्यक्ष मौलाना मुहम्मद सलमान बिजनौरी, स्थायी समिति के अध्यक्ष मौलाना रहमतुल्लाह मीर कश्मीरी और नायब अमीर-ए-हिंद मौलाना मुहम्मद सलमान मंसूरपुरी सहित अनेक प्रमुख धर्मगुरुओं ने भाग लिया। महासचिव मौलाना मुहम्मद हकीमुद्दीन कासमी ने सचिवीय रिपोर्ट प्रस्तुत की।
बैठक में इस्लामोफोबिया, समान नागरिक संहिता (UCC), वक्फ संपत्तियों, फिलिस्तीन की स्थिति और संगठनात्मक कार्यक्रमों पर विस्तृत विचार-विमर्श हुआ। इसके बाद कई महत्वपूर्ण प्रस्ताव पारित किए गए।
मुख्य बयान और आरोप
मौलाना मदनी ने कहा कि देश इस समय एक नाज़ुक दौर से गुज़र रहा है, जहाँ लोकतांत्रिक भावना और संवैधानिक मूल्यों को कमज़ोर करने के प्रयास हो रहे हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि नफ़रत और भेदभाव का माहौल केवल मुसलमानों और अन्य अल्पसंख्यकों को नहीं, बल्कि दलितों, वंचित वर्गों और कानून के शासन की पूरी व्यवस्था को भी प्रभावित कर रहा है।
उन्होंने यह भी कहा कि आज यह सवाल गंभीरता से उठ रहा है कि क्या भारत में मुसलमान होना अपराध बना दिया गया है। उनके अनुसार, नफ़रत भरे बयानों को महज़ चुनावी हथकंडा मानना अब उचित नहीं, क्योंकि देश को एक ऐसे वैचारिक संघर्ष की ओर धकेला जा रहा है जिसकी बुनियाद धार्मिक भेदभाव पर टिकी है।
नफ़रती भाषणों के आँकड़े और कानूनी चिंताएँ
मौलाना मदनी ने दावा किया कि पिछले एक वर्ष में नफ़रत भरे भाषणों और बयानों की 1,600 से अधिक प्रमाणित घटनाएँ दर्ज की गई हैं। उन्होंने कहा कि इनमें से कथित तौर पर 87 प्रतिशत मामलों में प्राथमिकी (FIR) तक दर्ज नहीं हुई। उनके अनुसार, यह स्थिति कानून लागू करने वाली एजेंसियों की जवाबदेही और न्याय व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करती है।
गौरतलब है कि यह बैठक ऐसे समय में हुई जब देश में वक्फ संशोधन विधेयक और UCC को लेकर बहस तेज़ है और कई मुस्लिम संगठन अपनी आपत्तियाँ दर्ज करा रहे हैं।
'बुलडोजर न्याय' पर कड़ी आलोचना
तथाकथित 'बुलडोजर न्याय' की निंदा करते हुए मौलाना मदनी ने कहा कि प्रशासन न्यायपालिका के अधिकारों में हस्तक्षेप कर खुद जज और जल्लाद दोनों की भूमिका निभा रहा है। उनके शब्दों में, 'बुलडोजर किसी ईंट-गारे की इमारत पर नहीं, बल्कि देश के संविधान, कानून के शासन और न्यायिक गरिमा के सीने पर चलता है।'
उन्होंने स्पष्ट किया कि न्यायिक प्रक्रिया की अनदेखी कर किसी नागरिक की संपत्ति ध्वस्त करना केवल एक इमारत को नुकसान नहीं, बल्कि संविधान के बुनियादी सिद्धांतों का उल्लंघन है।
घोषणा-पत्र और आगे का संकल्प
बैठक में पारित घोषणा-पत्र में कहा गया कि जमीयत उलेमा-ए-हिंद हमेशा राष्ट्रीय एकता और आपसी सम्मान की पक्षधर रही है और हर प्रकार की सांप्रदायिकता को देश के लिए हानिकारक मानती है। संगठन ने किसानों, विद्यार्थियों, दलितों और अन्य अल्पसंख्यक समुदायों के अधिकारों के लिए आवाज़ उठाने का संकल्प दोहराया।
घोषणा-पत्र में नई पीढ़ी से आह्वान किया गया कि वह निराशा और भय के बजाय साहस और दृढ़ संकल्प की विरासत को आगे बढ़ाए और सत्य व न्याय के लिए हमेशा डटी रहे। यह बैठक जमीयत के भावी संगठनात्मक कार्यक्रमों की दिशा तय करने की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है।