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आईएसआई की नई चाल: फिलिस्तीन-कश्मीर को जोड़कर आतंकी भर्ती बढ़ाने की कोशिश, सुरक्षा एजेंसियाँ सतर्क

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आईएसआई की नई चाल: फिलिस्तीन-कश्मीर को जोड़कर आतंकी भर्ती बढ़ाने की कोशिश, सुरक्षा एजेंसियाँ सतर्क

सारांश

आईएसआई ने एक नया दाँव खेला है — हमास की अंतरराष्ट्रीय पहचान को कश्मीर की कथा से जोड़कर घाटी के युवाओं को फिर से उकसाने की कोशिश। अनुच्छेद 370 के बाद कमज़ोर पड़े पाकिस्तानी प्रचार को 'वैश्विक प्रतिरोध' का चेहरा देने की यह रणनीति, सुरक्षा एजेंसियों के अनुसार, परिचालन खतरों से भी बड़ा वैचारिक संकट है।

मुख्य बातें

5 फरवरी 2025 को रावलकोट में हमास , जैश-ए-मोहम्मद और लश्कर-ए-तैयबा के सदस्यों की बैठक हुई, जिसका शीर्षक था 'कश्मीर एकजुटता और हमास ऑपरेशन अल-अक्सा फ्लड'।
आईएसआई फिलिस्तीन और कश्मीर के मुद्दों को एक 'प्रतिरोध आंदोलन' के रूप में पेश कर जम्मू-कश्मीर में भर्ती बढ़ाने की कोशिश कर रही है।
बैठक की तस्वीरें और वीडियो कश्मीर से जुड़े सोशल मीडिया समूहों में फैलाई जा रही हैं।
इंटेलिजेंस ब्यूरो (आईबी) के अनुसार, यह वैचारिक अभियान परिचालन बदलावों से कहीं अधिक खतरनाक हो सकता है।
अनुच्छेद 370 हटाए जाने के बाद आतंकी भर्ती में गिरावट और कई OGW नेटवर्क के ध्वस्त होने से आईएसआई को नई रणनीति अपनाने पर मजबूर होना पड़ा है।
अधिकारियों के अनुसार, पाकिस्तान का पारंपरिक प्रचार तंत्र जम्मू-कश्मीर में तेज़ी से अपना प्रभाव खो रहा है।

सुरक्षा एजेंसियों के अनुसार, पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई ने एक नई वैचारिक रणनीति अपनाई है — फिलिस्तीन के मुद्दे को कश्मीर से जोड़कर घाटी के युवाओं को पुनः आतंकी संगठनों की ओर आकर्षित करने का प्रयास। जाँच एजेंसियों का कहना है कि इस अभियान के तहत हमास, जैश-ए-मोहम्मद और लश्कर-ए-तैयबा को एक साझा मंच पर लाया जा रहा है, जो परिचालन बदलावों से कहीं अधिक खतरनाक वैचारिक खतरा पैदा कर सकता है।

रावलकोट बैठक: तीन संगठन, एक एजेंडा

5 फरवरी 2025 को रावलकोट में हमास, जैश-ए-मोहम्मद और लश्कर-ए-तैयबा के सदस्यों के बीच एक महत्वपूर्ण बैठक आयोजित की गई थी। इस बैठक का शीर्षक था — 'कश्मीर एकजुटता और हमास ऑपरेशन अल-अक्सा फ्लड'। सुरक्षा सूत्रों के अनुसार, इस बैठक में ड्रोन के इस्तेमाल जैसे परिचालन मुद्दों पर भी चर्चा हुई, लेकिन मूल उद्देश्य फिलिस्तीन और कश्मीर के संघर्षों को एक 'प्रतिरोध आंदोलन' के रूप में एकीकृत रूप से प्रस्तुत करना था।

इंटेलिजेंस ब्यूरो (आईबी) के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि इन बैठकों की तस्वीरें और वीडियो अब कश्मीर से जुड़े सोशल मीडिया समूहों में फैलाई जा रही हैं, ताकि स्थानीय लोगों में यह भावना पैदा की जा सके कि उनका मुद्दा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी उठाया जा रहा है।

आईएसआई की बदलती रणनीति का कारण

अधिकारियों के अनुसार, अनुच्छेद 370 हटाए जाने के बाद जम्मू-कश्मीर में आतंकी भर्ती में उल्लेखनीय गिरावट आई है और कई ओवरग्राउंड वर्कर (OGW) नेटवर्क ध्वस्त किए जा चुके हैं। इससे आईएसआई समर्थित तत्वों के लिए घाटी में काम करना कठिन हो गया है।

एक अन्य अधिकारी ने कहा कि पाकिस्तान का पारंपरिक प्रचार तंत्र अब कमज़ोर पड़ रहा है, क्योंकि घाटी के लोगों को यह समझ आ रहा है कि हिंसा का रास्ता उनके लिए लाभकारी नहीं है। ऐसे में आईएसआई को हमास के 'ब्रांड' की ज़रूरत पड़ रही है, जो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अधिक पहचाना जाता है।

वैचारिक खतरा: परिचालन बदलावों से भी बड़ा

सुरक्षा विशेषज्ञों और अधिकारियों का मानना है कि जैश और लश्कर द्वारा अपनाए जा रहे परिचालन बदलावों की तुलना में यह वैचारिक अभियान कहीं अधिक दीर्घकालिक खतरा उत्पन्न कर सकता है। अधिकारी ने कहा, 'संभावना है कि कुछ लोग इस प्रचार के जाल में फंस जाएं और हमास के नाम को जोड़कर चलाया जा रहा यह अभियान भर्ती बढ़ाने में मददगार साबित हो।'

यह ऐसे समय में आया है जब हमास-जैश-लश्कर गठजोड़ कश्मीर में हमलों के तरीकों में बदलाव की कोशिश भी कर रहा है। हालाँकि, अधिकारियों के अनुसार, हमास-शैली के हमलों को अपनाने की चर्चा तो है, लेकिन असली दाँव वैचारिक पुनर्जागरण पर लगाया गया है।

अनुच्छेद 370 के बाद कश्मीर में बदलाव

अनुच्छेद 370 हटाए जाने के बाद जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद में कमी और पर्यटन में वृद्धि दोनों दर्ज की गई हैं। सुरक्षा एजेंसियों के अनुसार, नई भर्तियों की संख्या में भी उल्लेखनीय गिरावट आई है, जो आईएसआई के लिए बड़ी चुनौती बन गई है।

गौरतलब है कि यह पहली बार नहीं है जब पाकिस्तान ने कश्मीर के मुद्दे को किसी अंतरराष्ट्रीय संघर्ष से जोड़ने की कोशिश की हो — लेकिन हमास जैसे संगठन को सीधे इस अभियान में शामिल करना एक नया और चिंताजनक आयाम है। आने वाले समय में भारतीय सुरक्षा एजेंसियाँ इस वैचारिक प्रचार अभियान की काट के लिए अपनी रणनीति और पुख्ता करने की दिशा में काम कर रही हैं।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन इस वैचारिक घेराबंदी की काट के लिए दीर्घकालिक और बहुआयामी नीति की ज़रूरत है।
RashtraPress
31 अक्टूबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

आईएसआई की फिलिस्तीन-कश्मीर को जोड़ने की रणनीति क्या है?
सुरक्षा एजेंसियों के अनुसार, आईएसआई हमास की अंतरराष्ट्रीय पहचान का इस्तेमाल कश्मीर के मुद्दे को 'वैश्विक प्रतिरोध आंदोलन' के रूप में पेश करने के लिए कर रही है। इसका उद्देश्य घाटी के युवाओं को यह विश्वास दिलाना है कि उनका संघर्ष अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी समर्थित है, ताकि आतंकी भर्ती बढ़ाई जा सके।
रावलकोट में 5 फरवरी 2025 को क्या हुआ था?
5 फरवरी 2025 को रावलकोट में हमास, जैश-ए-मोहम्मद और लश्कर-ए-तैयबा के सदस्यों की एक बैठक हुई थी, जिसका शीर्षक 'कश्मीर एकजुटता और हमास ऑपरेशन अल-अक्सा फ्लड' था। इस बैठक में ड्रोन के इस्तेमाल जैसे परिचालन मुद्दों के साथ-साथ दोनों संघर्षों को एक साझा आंदोलन के रूप में प्रस्तुत करने की रणनीति पर चर्चा हुई।
अनुच्छेद 370 हटने के बाद कश्मीर में आतंकवाद पर क्या असर पड़ा?
अनुच्छेद 370 हटाए जाने के बाद जम्मू-कश्मीर में आतंकी भर्ती में उल्लेखनीय गिरावट आई है और कई ओवरग्राउंड वर्कर (OGW) नेटवर्क ध्वस्त किए जा चुके हैं। इसके साथ ही पर्यटन में वृद्धि और आतंकवाद में कमी भी दर्ज की गई है, जिससे पाकिस्तान का पारंपरिक प्रचार तंत्र कमज़ोर पड़ा है।
यह वैचारिक अभियान परिचालन खतरों से अधिक खतरनाक क्यों माना जा रहा है?
इंटेलिजेंस ब्यूरो के अधिकारियों के अनुसार, जैश और लश्कर के परिचालन बदलावों की तुलना में यह वैचारिक प्रचार अभियान दीर्घकालिक रूप से अधिक नुकसानदेह हो सकता है। इसका कारण यह है कि यह सीधे युवाओं की मानसिकता को प्रभावित करने और उन्हें संगठनों की ओर आकर्षित करने का प्रयास करता है।
आईएसआई को हमास की ज़रूरत क्यों पड़ रही है?
अधिकारियों के अनुसार, अनुच्छेद 370 हटाए जाने के बाद पाकिस्तान का कश्मीर-केंद्रित प्रचार काफी कमज़ोर पड़ गया है और घाटी में बहुत कम लोग उसे स्वीकार कर रहे हैं। ऐसे में आईएसआई को हमास की अंतरराष्ट्रीय पहचान का उपयोग कर कश्मीर के मुद्दे को नया 'वैश्विक आयाम' देने की ज़रूरत महसूस हो रही है।
राष्ट्र प्रेस
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