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मनीषा भनवाला बनीं वर्ल्ड रेसलिंग चैंपियन, दिवंगत पिता की सीख को दिया स्वर्णिम सफलता का श्रेय

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मनीषा भनवाला बनीं वर्ल्ड रेसलिंग चैंपियन, दिवंगत पिता की सीख को दिया स्वर्णिम सफलता का श्रेय

सारांश

मनीषा भनवाला ने अस्ताना में वह कर दिखाया जो पहले कोई भारतीय महिला पहलवान नहीं कर सकी — सीनियर वर्ल्ड रेसलिंग चैंपियनशिप में स्वर्ण। एशियन गेम्स की निराशा से उठकर, पिता की सीख को ढाल बनाकर, 23 साल की इस पहलवान ने इतिहास लिख दिया।

मुख्य बातें

मनीषा भनवाला सीनियर वर्ल्ड रेसलिंग चैंपियनशिप में स्वर्ण पदक जीतने वाली पहली भारतीय महिला पहलवान बनीं।
उन्होंने कजाकिस्तान के अस्ताना में 59 किलोग्राम भार वर्ग में यह ऐतिहासिक जीत दर्ज की।
फाइनल तक के सफर में उन्होंने कनाडा की लॉरेंस ब्यूरेगार्ड को 6-2 और मंगोलिया की बोलोरतुया खुरेलखु को पराजित किया।
भारत ने इस चैंपियनशिप में कुल 4 पदक जीते — 1 स्वर्ण (मनीषा), 2 रजत (काजल ढोचक, नीलम सिरोही), 1 कांस्य (तनु शर्मा)।
मनीषा ने यह उपलब्धि अपने दिवंगत पिता सुरेश भनवाला को समर्पित की, जिनकी सीख 'काम शुरू करो तो पूरा करो' उनके करियर की प्रेरणा रही है।
लॉस एंजिल्स ओलंपिक 2028 में 59 किग्रा वर्ग न होने पर मनीषा 57 किग्रा में प्रतिस्पर्धा की तैयारी में हैं।

मनीषा भनवाला ने कजाकिस्तान के अस्ताना में आयोजित सीनियर वर्ल्ड रेसलिंग चैंपियनशिप में 59 किलोग्राम भार वर्ग में स्वर्ण पदक जीतकर इतिहास रच दिया — वह इस प्रतिष्ठित प्रतियोगिता में गोल्ड मेडल हासिल करने वाली पहली भारतीय महिला पहलवान बन गई हैं। 31 अक्टूबर को नई दिल्ली में रेसलिंग फेडरेशन ऑफ इंडिया (WFI) द्वारा आयोजित मीडिया बातचीत में 23 वर्षीय मनीषा ने यह ऐतिहासिक उपलब्धि अपने दिवंगत पिता सुरेश भनवाला को समर्पित की।

पिता की सीख जो बनी जीत की बुनियाद

मनीषा ने बताया कि उनके पिता ने बचपन से ही उनके भीतर एक अटल विश्वास भर दिया था। उन्होंने कहा, 'मेरे पिता ने मुझे बचपन से ही एक बात सिखाई थी — अगर कोई काम शुरू करो, तो उसे पूरा करो। यह बात मेरे खून में बस गई है। अगर आप किसी काम को पूरा करने का इरादा नहीं रखते, तो उसे शुरू ही न करें। मेरे लिए कुश्ती ही पहला और आखिरी विकल्प है।' उन्होंने यह भी कहा कि पिता के निधन के बाद भी वह उनसे मन-ही-मन बातें करती हैं और उनकी उपस्थिति हर पल महसूस करती हैं।

फाइनल तक का सफर और ऐतिहासिक जीत

मनीषा ने इस चैंपियनशिप में अपना सफर दमदार अंदाज़ में तय किया। प्री-क्वार्टर फाइनल में उन्होंने कनाडा की लॉरेंस ब्यूरेगार्ड को 6-2 से पराजित किया, और सेमीफाइनल में मंगोलिया की बोलोरतुया खुरेलखु को मात देकर फाइनल में जगह बनाई। फाइनल मुकाबले में शानदार वापसी करते हुए उन्होंने 59 किग्रा भार वर्ग में स्वर्ण पदक अपने नाम किया — एक ऐसा कारनामा जो इससे पहले कोई भारतीय महिला पहलवान सीनियर विश्व स्तर पर नहीं कर सकी थी।

भारत का चार पदकों के साथ समापन

इस चैंपियनशिप में भारत ने कुल चार पदक जीते। मनीषा के ऐतिहासिक स्वर्ण के अलावा, काजल ढोचक और नीलम सिरोही ने रजत पदक हासिल किए, जबकि तनु शर्मा ने महिलाओं के 72 किग्रा वर्ग में कांस्य पदक जीता। यह भारतीय कुश्ती के लिए एक उल्लेखनीय प्रदर्शन रहा, विशेष रूप से तब जब टीम एशियन गेम्स में अपेक्षित परिणाम नहीं दे पाई थी।

एशियन गेम्स की निराशा से विश्व खिताब तक

मनीषा ने स्वीकार किया कि एशियन गेम्स में पदक न जीत पाना उनके लिए बेहद निराशाजनक रहा। उन्होंने कहा, 'एशियन गेम्स में किस्मत ने साथ नहीं दिया। बस निराशा ही हाथ लगी। मैं अपने कोच से कुश्ती, अभ्यास और रिकवरी के बारे में लगातार बात करती रही। उन्होंने मुझे बताया कि अगला लक्ष्य विश्व चैंपियनशिप है। मुझे आज भी याद है कि उन्होंने कहा था कि भगवान ने मेरे लिए कुछ बहुत बड़ा सोच रखा है।' यह ऐसे समय में आया है जब भारतीय कुश्ती संघ घरेलू विवादों के बाद अंतरराष्ट्रीय मंच पर अपनी साख पुनर्स्थापित करने की कोशिश कर रहा है।

लॉस एंजिल्स ओलंपिक 2028 की तैयारी

लॉस एंजिल्स ओलंपिक 2028 में महिलाओं का 59 किग्रा वर्ग शामिल नहीं होगा, जो मनीषा के लिए एक बड़ी चुनौती है। हालाँकि उन्होंने इस स्थिति को सकारात्मक नज़रिए से देखा। उन्होंने कहा, 'मेरी 59 किग्रा कैटेगरी की कुछ लड़कियाँ लॉस एंजिल्स ओलंपिक के लिए 57 किग्रा वर्ग में चली जाएंगी। इसका एक फायदा यह है कि जिन लड़कियों से मैंने यहाँ मुकाबला किया, वे 2027 के क्वालिफाइंग इवेंट में भी 57 किग्रा वर्ग का ही हिस्सा होंगी। इसी कारण यह हमारे लिए एक प्लस प्वाइंट है।' गौरतलब है कि अस्ताना रवाना होने से पहले मनीषा ने एक सफेद टी-शर्ट पर अपने माता-पिता की तस्वीरें छपवाईं और वार्म-अप सत्र के दौरान उसे पहना — एक भावनात्मक कदम जो उनके भीतर के अटूट विश्वास को दर्शाता था। मनीषा का अगला लक्ष्य ओलंपिक पदक है, और इस स्वर्णिम जीत ने उस सफर की नींव और मज़बूत कर दी है।

संपादकीय दृष्टिकोण

फिर भी मनीषा जैसी एथलीटों ने व्यवस्था की खामियों को अपनी लगन से ढक दिया। असली सवाल यह है कि क्या भारतीय कुश्ती का ढाँचा इस प्रतिभा को 2028 ओलंपिक तक टिकाए रख सकता है, खासकर जब मनीषा को भार वर्ग बदलने की मजबूरी है। एक चैंपियन तैयार हो गई है — अब बारी संस्था की है।
RashtraPress
31 अक्टूबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

मनीषा भनवाला ने वर्ल्ड रेसलिंग चैंपियनशिप में कौन-सा पदक जीता?
मनीषा भनवाला ने कजाकिस्तान के अस्ताना में आयोजित सीनियर वर्ल्ड रेसलिंग चैंपियनशिप में 59 किलोग्राम भार वर्ग में स्वर्ण पदक जीता। वह यह उपलब्धि हासिल करने वाली पहली भारतीय महिला पहलवान बन गई हैं।
मनीषा भनवाला ने अपनी जीत का श्रेय किसे दिया?
मनीषा ने अपनी ऐतिहासिक जीत का श्रेय अपने दिवंगत पिता सुरेश भनवाला को दिया। उन्होंने कहा कि पिता की सीख 'अगर कोई काम शुरू करो, तो उसे पूरा करो' उनके व्यक्तित्व और करियर की नींव है।
इस चैंपियनशिप में भारत ने कुल कितने पदक जीते?
भारत ने इस चैंपियनशिप में कुल चार पदक जीते — मनीषा भनवाला का एक स्वर्ण, काजल ढोचक और नीलम सिरोही के दो रजत, तथा तनु शर्मा का महिलाओं के 72 किग्रा वर्ग में एक कांस्य पदक।
लॉस एंजिल्स ओलंपिक 2028 में मनीषा किस भार वर्ग में हिस्सा लेंगी?
लॉस एंजिल्स ओलंपिक 2028 में महिलाओं का 59 किग्रा वर्ग शामिल नहीं है, इसलिए मनीषा को 57 किग्रा वर्ग में उतरना होगा। उन्होंने कहा कि इससे उन्हें फायदा भी होगा क्योंकि उनकी मौजूदा प्रतिद्वंद्वी भी उसी वर्ग में आ जाएंगी।
मनीषा भनवाला ने फाइनल तक का सफर कैसे तय किया?
मनीषा ने प्री-क्वार्टर फाइनल में कनाडा की लॉरेंस ब्यूरेगार्ड को 6-2 से हराया और सेमीफाइनल में मंगोलिया की बोलोरतुया खुरेलखु को पराजित किया। इसके बाद फाइनल में शानदार वापसी करते हुए उन्होंने स्वर्ण पदक अपने नाम किया।
राष्ट्र प्रेस
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