गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित करे सरकार: नाखुदा मस्जिद के इमाम मौलाना शफीक कासमी का बड़ा बयान
सारांश
मुख्य बातें
कोलकाता के नाखुदा मस्जिद के इमाम मौलाना मोहम्मद शफीक कासमी ने शनिवार, 16 मई 2026 को केंद्र सरकार से माँग की कि गाय को राष्ट्रीय पशु का दर्जा दिया जाए। उनका कहना है कि इस एक कदम से हिंदू-मुस्लिम दोनों समुदायों के बीच गाय से जुड़े तमाम विवाद स्वतः सुलझ जाएँगे और देश में शांति का माहौल बनेगा।
मौलाना का मूल तर्क
मौलाना कासमी ने कहा कि अगर गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित किया जाता है, तो मुस्लिम समुदाय स्वेच्छा से गाय का बहिष्कार कर देगा और इससे कुर्बानी पर रोक के साथ-साथ बीफ के निर्यात-आयात का सिलसिला भी थम जाएगा। उन्होंने यह भी माँग की कि मंदिरों में होने वाली पशु बलि पर भी समान रूप से अंकुश लगाया जाए — उनके शब्दों में, 'दोहरा रवैया' किसी भी सूरत में स्वीकार्य नहीं है।
उन्होंने कहा कि एक ओर जहाँ गाय की कुर्बानी को लेकर विवाद उठाए जाते हैं, वहीं भारत बीफ निर्यात के मामले में विश्व में दूसरे स्थान पर है और स्लॉटरहाउस से अथाह कमाई हो रही है। यह विरोधाभास, उनके अनुसार, न्यायसंगत नहीं है।
केंद्र सरकार के सर्कुलर का संदर्भ
मौलाना ने बताया कि गायों की कुर्बानी के संदर्भ में हाल ही में केंद्र सरकार की ओर से एक सर्कुलर जारी किया गया है। उन्होंने कहा कि इस विषय पर 1950 में ही कानून बनाया जा चुका था और उसी के आलोक में यह सर्कुलर आया है। उनके अनुसार, इस सर्कुलर के बाद गायों की कुर्बानी पहले से अधिक कठिन हो जाएगी।
आर्थिक पहलू और किसानों पर असर
मौलाना कासमी ने एक दिलचस्प आर्थिक तर्क भी रखा। उन्होंने कहा कि हिंदू किसान जब गाय दूध देने के काबिल नहीं रहती, तो उसे मुस्लिम खरीदारों को बेचते हैं। सामान्यतः ₹15,000–₹20,000 की गाय बकरीद के मौके पर ₹70,000 से ₹1 लाख तक में बिकती है, जिससे किसान एक गाय बेचकर चार गाय खरीद सकते हैं।
उनका तर्क है कि अगर मुस्लिम गाय खरीदना बंद कर दें, तो किसानों के पास बूढ़ी और दूध न देने वाली गायों को रखने का कोई आर्थिक विकल्प नहीं बचेगा। परिणामस्वरूप वे इन्हें खेतों और सड़कों पर छोड़ देंगे, जिससे फसलों को नुकसान और सड़क दुर्घटनाओं में वृद्धि होगी।
अकबर के ऐतिहासिक फरमान का हवाला
मौलाना ने मुगल बादशाह अकबर के एक ऐतिहासिक प्रसंग का उल्लेख किया। उनके अनुसार, जब अकबर ने मुस्लिमों को गाय न खाने का फरमान जारी किया, तो छह महीने के भीतर ही हिंदू प्रतिनिधि खुद उनके पास आए और गाय की बढ़ती संख्या से फसलों की बर्बादी और सड़क दुर्घटनाओं की समस्या गिनाकर उस फरमान को वापस लेने की गुज़ारिश की।
प्रकृति के नियम का दार्शनिक तर्क
मौलाना ने कहा कि यह प्रकृति का नियम है — जिस जानवर को जितना अधिक खाया जाता है, उसकी आबादी उतनी ही तेज़ी से बढ़ती है। उन्होंने मुर्गी और बकरे का उदाहरण देते हुए कहा कि इनकी माँग अधिक होने के कारण इनकी संख्या भी बहुत अधिक है। इसके विपरीत, शेर को कोई नहीं खाता और आज वह संरक्षण की सूची में है। इसी तर्क के आधार पर उन्होंने कहा कि गाय की माँग घटने से उसकी संख्या भी अनियंत्रित रूप से बढ़ेगी।
मौलाना कासमी के इस बयान ने धार्मिक, आर्थिक और पर्यावरणीय — तीनों आयामों पर बहस छेड़ दी है। अब देखना होगा कि केंद्र सरकार और विभिन्न सामाजिक संगठन इस माँग पर क्या रुख अपनाते हैं।