गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित करे सरकार: नाखुदा मस्जिद के इमाम मौलाना शफीक कासमी का बड़ा बयान

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गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित करे सरकार: नाखुदा मस्जिद के इमाम मौलाना शफीक कासमी का बड़ा बयान

सारांश

कोलकाता के नाखुदा मस्जिद के इमाम मौलाना शफीक कासमी ने गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित करने की माँग करते हुए कहा कि मुस्लिम समुदाय गाय का स्वेच्छा से बहिष्कार करे — लेकिन साथ में मंदिरों की पशु बलि और बीफ निर्यात पर भी एकसमान कानून बने। उनका तर्क है कि जिस जानवर को जितना खाया जाता है, वह उतना ही बढ़ता है।

मुख्य बातें

मौलाना मोहम्मद शफीक कासमी ( नाखुदा मस्जिद, कोलकाता ) ने 16 मई 2026 को केंद्र सरकार से गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित करने की माँग की।
उन्होंने कहा कि मुस्लिम समुदाय गाय का स्वैच्छिक बहिष्कार करे, लेकिन मंदिरों में पशु बलि और बीफ निर्यात पर भी समान रूप से रोक लगे।
आर्थिक तर्क: बकरीद पर ₹15,000–₹20,000 की गाय ₹70,000–₹1 लाख में बिकती है; मुस्लिम खरीद बंद होने पर किसान गाय सड़क पर छोड़ेंगे।
मौलाना ने अकबर बादशाह के उस ऐतिहासिक फरमान का हवाला दिया जिसे स्वयं हिंदू प्रतिनिधियों ने फसल नुकसान के कारण वापस लेने को कहा था।
केंद्र सरकार ने हाल ही में गायों की कुर्बानी पर एक सर्कुलर जारी किया है, जिसका आधार 1950 का कानून बताया गया है।

कोलकाता के नाखुदा मस्जिद के इमाम मौलाना मोहम्मद शफीक कासमी ने शनिवार, 16 मई 2026 को केंद्र सरकार से माँग की कि गाय को राष्ट्रीय पशु का दर्जा दिया जाए। उनका कहना है कि इस एक कदम से हिंदू-मुस्लिम दोनों समुदायों के बीच गाय से जुड़े तमाम विवाद स्वतः सुलझ जाएँगे और देश में शांति का माहौल बनेगा।

मौलाना का मूल तर्क

मौलाना कासमी ने कहा कि अगर गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित किया जाता है, तो मुस्लिम समुदाय स्वेच्छा से गाय का बहिष्कार कर देगा और इससे कुर्बानी पर रोक के साथ-साथ बीफ के निर्यात-आयात का सिलसिला भी थम जाएगा। उन्होंने यह भी माँग की कि मंदिरों में होने वाली पशु बलि पर भी समान रूप से अंकुश लगाया जाए — उनके शब्दों में, 'दोहरा रवैया' किसी भी सूरत में स्वीकार्य नहीं है।

उन्होंने कहा कि एक ओर जहाँ गाय की कुर्बानी को लेकर विवाद उठाए जाते हैं, वहीं भारत बीफ निर्यात के मामले में विश्व में दूसरे स्थान पर है और स्लॉटरहाउस से अथाह कमाई हो रही है। यह विरोधाभास, उनके अनुसार, न्यायसंगत नहीं है।

केंद्र सरकार के सर्कुलर का संदर्भ

मौलाना ने बताया कि गायों की कुर्बानी के संदर्भ में हाल ही में केंद्र सरकार की ओर से एक सर्कुलर जारी किया गया है। उन्होंने कहा कि इस विषय पर 1950 में ही कानून बनाया जा चुका था और उसी के आलोक में यह सर्कुलर आया है। उनके अनुसार, इस सर्कुलर के बाद गायों की कुर्बानी पहले से अधिक कठिन हो जाएगी।

आर्थिक पहलू और किसानों पर असर

मौलाना कासमी ने एक दिलचस्प आर्थिक तर्क भी रखा। उन्होंने कहा कि हिंदू किसान जब गाय दूध देने के काबिल नहीं रहती, तो उसे मुस्लिम खरीदारों को बेचते हैं। सामान्यतः ₹15,000–₹20,000 की गाय बकरीद के मौके पर ₹70,000 से ₹1 लाख तक में बिकती है, जिससे किसान एक गाय बेचकर चार गाय खरीद सकते हैं।

उनका तर्क है कि अगर मुस्लिम गाय खरीदना बंद कर दें, तो किसानों के पास बूढ़ी और दूध न देने वाली गायों को रखने का कोई आर्थिक विकल्प नहीं बचेगा। परिणामस्वरूप वे इन्हें खेतों और सड़कों पर छोड़ देंगे, जिससे फसलों को नुकसान और सड़क दुर्घटनाओं में वृद्धि होगी।

अकबर के ऐतिहासिक फरमान का हवाला

मौलाना ने मुगल बादशाह अकबर के एक ऐतिहासिक प्रसंग का उल्लेख किया। उनके अनुसार, जब अकबर ने मुस्लिमों को गाय न खाने का फरमान जारी किया, तो छह महीने के भीतर ही हिंदू प्रतिनिधि खुद उनके पास आए और गाय की बढ़ती संख्या से फसलों की बर्बादी और सड़क दुर्घटनाओं की समस्या गिनाकर उस फरमान को वापस लेने की गुज़ारिश की।

प्रकृति के नियम का दार्शनिक तर्क

मौलाना ने कहा कि यह प्रकृति का नियम है — जिस जानवर को जितना अधिक खाया जाता है, उसकी आबादी उतनी ही तेज़ी से बढ़ती है। उन्होंने मुर्गी और बकरे का उदाहरण देते हुए कहा कि इनकी माँग अधिक होने के कारण इनकी संख्या भी बहुत अधिक है। इसके विपरीत, शेर को कोई नहीं खाता और आज वह संरक्षण की सूची में है। इसी तर्क के आधार पर उन्होंने कहा कि गाय की माँग घटने से उसकी संख्या भी अनियंत्रित रूप से बढ़ेगी।

मौलाना कासमी के इस बयान ने धार्मिक, आर्थिक और पर्यावरणीय — तीनों आयामों पर बहस छेड़ दी है। अब देखना होगा कि केंद्र सरकार और विभिन्न सामाजिक संगठन इस माँग पर क्या रुख अपनाते हैं।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन यह एक पुराने विरोधाभास को उजागर करता है — गाय की राजनीति और गाय की अर्थव्यवस्था एक-दूसरे के विरुद्ध खड़ी हैं। भारत बीफ निर्यात में विश्व में दूसरे स्थान पर है, फिर भी गाय के नाम पर हिंसा और भीड़ न्याय की घटनाएँ थमी नहीं हैं — यह नीतिगत असंगति किसी एक समुदाय की नहीं, पूरी व्यवस्था की विफलता है। उनकी माँग में एक व्यावहारिक चेतावनी भी छुपी है: गाय-आधारित ग्रामीण अर्थव्यवस्था उस 'अनौपचारिक बाज़ार' पर टिकी है जिसे नीति-निर्माता अक्सर नज़रअंदाज़ करते हैं। बिना समग्र पशु-प्रबंधन नीति के, राष्ट्रीय पशु का दर्जा समस्या सुलझाने की बजाय नई उलझनें पैदा कर सकता है।
RashtraPress
16 मई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

मौलाना शफीक कासमी ने गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित करने की माँग क्यों की?
मौलाना कासमी का कहना है कि गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित करने से कुर्बानी, बीफ निर्यात और सांप्रदायिक तनाव — सभी मुद्दे एकसाथ सुलझ जाएँगे। उनके अनुसार, मुस्लिम समुदाय तब स्वेच्छा से गाय का बहिष्कार करेगा, बशर्ते मंदिरों की पशु बलि पर भी समान कानून लागू हो।
केंद्र सरकार का गाय की कुर्बानी पर हालिया सर्कुलर क्या है?
मौलाना के अनुसार, केंद्र सरकार ने हाल ही में गायों की कुर्बानी के संदर्भ में एक सर्कुलर जारी किया है, जिसका आधार 1950 का कानून है। उनका कहना है कि इस सर्कुलर के बाद गायों की कुर्बानी पहले से कहीं अधिक कठिन हो जाएगी।
मौलाना ने बीफ निर्यात का मुद्दा क्यों उठाया?
मौलाना कासमी ने कहा कि एक ओर गाय की कुर्बानी पर आपत्ति जताई जाती है, वहीं भारत बीफ निर्यात में विश्व में दूसरे स्थान पर है और स्लॉटरहाउस से बड़े पैमाने पर कमाई हो रही है। उनके अनुसार यह दोहरा रवैया स्वीकार्य नहीं है और इस पर भी समान कानून बनना चाहिए।
अगर मुस्लिम गाय खरीदना बंद कर दें तो किसानों पर क्या असर होगा?
मौलाना के अनुसार, हिंदू किसान बूढ़ी गाय को बकरीद पर ₹70,000 से ₹1 लाख तक में बेचते हैं, जबकि उसकी सामान्य कीमत ₹15,000–₹20,000 होती है। यह खरीद बंद होने पर किसान इन गायों को सड़क या खेतों पर छोड़ देंगे, जिससे फसल नुकसान और सड़क दुर्घटनाएँ बढ़ेंगी।
मौलाना ने अकबर बादशाह का उदाहरण क्यों दिया?
मौलाना ने बताया कि अकबर ने जब मुस्लिमों को गाय न खाने का फरमान दिया, तो छह महीने बाद हिंदू प्रतिनिधि खुद आए और फसल नुकसान व सड़क दुर्घटनाओं का हवाला देकर फरमान वापस लेने की गुज़ारिश की। यह ऐतिहासिक प्रसंग उनके इस तर्क को पुष्ट करता है कि गाय की बढ़ती संख्या व्यावहारिक समस्याएँ पैदा करती है।
राष्ट्र प्रेस
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