भोजशाला हाईकोर्ट फैसले पर वारिस पठान का विरोध: 'वक्फ कानून और प्लेसेस ऑफ वर्शिप एक्ट को नजरअंदाज किया गया'
सारांश
मुख्य बातें
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के भोजशाला संबंधी फैसले पर ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) के नेता वारिस पठान ने 15 मई को कड़ी आपत्ति जताई। पठान ने इस निर्णय को 'गलत और निराशाजनक' करार देते हुए कहा कि फैसले में वक्फ कानून और प्लेसेस ऑफ वर्शिप एक्ट दोनों को दरकिनार कर दिया गया। मुस्लिम पक्ष ने सर्वोच्च न्यायालय में अपील की तैयारी की घोषणा की है।
मुख्य आपत्तियाँ: कानूनी आधार पर सवाल
वारिस पठान ने कहा कि फैसले में कई महत्वपूर्ण पहलुओं को बिना समुचित विचार किए ही नजरअंदाज कर दिया गया। उनके अनुसार, वक्फ कानून को फैसले में स्थान नहीं दिया गया और प्लेसेस ऑफ वर्शिप एक्ट की अनदेखी की गई — जो उपासना स्थलों की धार्मिक पहचान को 1947 की स्थिति में बनाए रखने का प्रावधान करता है।
पठान ने राम मंदिर मामले का उल्लेख करते हुए कहा कि वहाँ भी आस्था को कानूनी आधार से ऊपर रखकर फैसला दिया गया था, और अब भोजशाला मामले में भी वही प्रवृत्ति दिख रही है। उन्होंने कहा, 'हमें सुप्रीम कोर्ट से उम्मीद है।'
कमाल मौलाना वेलफेयर सोसायटी का रुख
कमाल मौलाना वेलफेयर सोसायटी के अब्दुल समद ने स्पष्ट किया कि मुस्लिम समुदाय हर शुक्रवार भोजशाला में नमाज अदा करना जारी रखेगा। उन्होंने कहा कि जो तर्क हाईकोर्ट में नहीं सुने गए, वे सुप्रीम कोर्ट के समक्ष रखे जाएंगे।
समद ने यह भी कहा कि जब से मस्जिद का निर्माण हुआ है, तब से वहाँ नमाज पढ़ी जा रही है और यह संवैधानिक अधिकार के अंतर्गत है। उन्होंने 2003 के प्रशासनिक आदेश का हवाला देते हुए कहा कि उस आदेश में मंगलवार को सूर्योदय से सूर्यास्त तक हिंदू समाज को केवल 'विजिटर' के रूप में प्रवेश की अनुमति थी, पूजा-पाठ की नहीं — फिर भी वहाँ कथित तौर पर अवैध रूप से धार्मिक गतिविधियाँ होती रहीं।
काजी सैयद निसार अली की प्रतिक्रिया
काजी सैयद निसार अली ने कहा कि हाईकोर्ट का फैसला एक पक्ष के पक्ष में गया है, परंतु यह अंतिम फैसला नहीं है। उन्होंने भारतीय न्यायपालिका पर भरोसा जताते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट न्याय सुनिश्चित करेगा और किसी के साथ अन्याय नहीं होगा।
भोजशाला विवाद: पृष्ठभूमि
भोजशाला, जो धार, मध्य प्रदेश में स्थित है, हिंदू पक्ष के लिए माँ वाग्देवी (सरस्वती) का मंदिर है, जबकि मुस्लिम पक्ष इसे कमाल मौलाना मस्जिद मानता है। यह विवाद दशकों पुराना है। गौरतलब है कि यह मामला उन कई धार्मिक-ऐतिहासिक स्थलों के विवादों में से एक है जो भारतीय अदालतों में लंबित हैं।
आगे की राह: सुप्रीम कोर्ट
मुस्लिम पक्ष के सभी प्रमुख प्रतिनिधियों ने एकमत से सर्वोच्च न्यायालय में अपील करने की घोषणा की है। यह मामला अब देश की सर्वोच्च अदालत में जाएगा, जहाँ वक्फ कानून, प्लेसेस ऑफ वर्शिप एक्ट और संवैधानिक अधिकारों से जुड़े तर्क नए सिरे से प्रस्तुत किए जाएंगे।