मेडिकल डिवाइसेस रूल्स 2017 में बड़ा संशोधन: आउटसोर्स स्टरलाइजेशन पर लोन लाइसेंस की अनिवार्यता खत्म, EU भी मान्यता सूची में
सारांश
मुख्य बातें
स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय ने 24 अगस्त 2026 को मेडिकल डिवाइसेस रूल्स, 2017 में दो अहम संशोधनों को अंतिम रूप दिया है, जिनका उद्देश्य मेडिकल डिवाइस क्षेत्र में रेगुलेटरी अनुपालन को सरल बनाना, कारोबारी बोझ घटाना और भारतीय मरीजों तक उन्नत चिकित्सा तकनीक की पहुँच तेज़ करना है। ये बदलाव सभी संबंधित पक्षों के साथ व्यापक परामर्श के बाद लागू किए गए हैं।
मुख्य संशोधन: नियम 44 में बदलाव
मेडिकल डिवाइसेस रूल्स, 2017 के नियम 44 में किए गए संशोधन के तहत, जो निर्माता किसी वैध-लाइसेंसधारी तृतीय-पक्ष सुविधा से उत्पाद स्टरलाइजेशन का कार्य आउटसोर्स करते हैं, उन्हें अब इस गतिविधि के लिए अलग से 'लोन लाइसेंस' लेने की आवश्यकता नहीं होगी। अब तक यह प्रक्रिया उन निर्माताओं के लिए विशेष रूप से बोझिल थी जिनके पास इन-हाउस स्टरलाइजेशन सुविधाएँ उपलब्ध नहीं हैं।
इस बदलाव से दोहराव, प्रशासनिक जटिलता, अनुपालन लागत और उससे जुड़ी समय-सीमाओं में उल्लेखनीय कमी आने की उम्मीद है। साथ ही, आउटसोर्स स्टरलाइजेशन के लिए आवश्यक ट्रेसेबिलिटी तंत्र को बनाए रखा जाएगा, ताकि रेगुलेटरी निगरानी में कोई कमी न आए।
छह महीने की ट्रांजिशन अवधि
संशोधित प्रावधान नई लेबलिंग आवश्यकताओं के अनुपालन के लिए निर्माताओं को छह महीने की ट्रांजिशन अवधि प्रदान करता है। इस दौरान निर्माता अपनी लेबलिंग, पैकेजिंग और संबंधित प्रक्रियाओं में आवश्यक बदलाव कर सकेंगे। यह कदम उद्योग को अचानक अनुपालन दबाव से बचाने के लिए उठाया गया है।
नियम 63: यूरोपीय संघ को मान्यता सूची में शामिल किया
नियम 63 में संशोधन कर यूरोपीय संघ (EU) को उन मान्यता प्राप्त सख्त रेगुलेटरी क्षेत्राधिकारों की सूची में जोड़ा गया है, जिनके अनुमोदन के आधार पर भारत में बिना प्रेडिकेट डिवाइस वाले मेडिकल डिवाइस के लिए क्लिनिकल जाँच की अनिवार्यता से छूट मिल सकती है। इस सूची में पहले से अमेरिका, यूनाइटेड किंगडम, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा और जापान शामिल थे।
यह ऐसे समय में आया है जब भारत अपने मेडिकल डिवाइस क्षेत्र को वैश्विक मानकों के अनुरूप ढालने की कोशिश कर रहा है। EU की मान्यता से यूरोप में पहले से स्वीकृत उपकरण भारत में तेज़ी से उपलब्ध हो सकेंगे, जिससे मरीजों को उन्नत चिकित्सा तकनीक तक समयबद्ध पहुँच सुनिश्चित होगी।
उद्योग और मरीजों पर असर
इन सुधारों से आयातकों और निर्माताओं दोनों पर रेगुलेटरी बोझ घटने की उम्मीद है। निर्माताओं को अधिक ऑपरेशनल लचीलापन मिलेगा, जिससे मैन्युफैक्चरिंग प्रक्रियाएँ तेज़ और अधिक कुशल बनेंगी। गौरतलब है कि भारत का मेडिकल डिवाइस उद्योग तेज़ी से बढ़ रहा है और इन सुधारों को उसकी वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ाने की दिशा में अहम माना जा रहा है।
मंत्रालय के अनुसार, ये उपाय रेगुलेटरी पारदर्शिता और पूर्वानुमान क्षमता को बेहतर बनाएँगे, साथ ही मेडिकल डिवाइस की गुणवत्ता, सुरक्षा और प्रदर्शन के मानकों को बनाए रखेंगे।
आगे की राह
ये संशोधन भारत के मेडिकल डिवाइस रेगुलेटरी इकोसिस्टम को अंतरराष्ट्रीय मानकों के करीब लाने की व्यापक रणनीति का हिस्सा हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि EU को मान्यता सूची में शामिल करने और लोन लाइसेंस की अनिवार्यता हटाने से भारत में नवाचारी मेडिकल उपकरणों की उपलब्धता में उल्लेखनीय सुधार आएगा, जो अंततः स्वास्थ्य सेवा वितरण को मज़बूत करेगा।