24 अगस्त 2026
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मेडिकल डिवाइसेस रूल्स 2017 में बड़ा संशोधन: आउटसोर्स स्टरलाइजेशन पर लोन लाइसेंस की अनिवार्यता खत्म, EU भी मान्यता सूची में

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मेडिकल डिवाइसेस रूल्स 2017 में बड़ा संशोधन: आउटसोर्स स्टरलाइजेशन पर लोन लाइसेंस की अनिवार्यता खत्म, EU भी मान्यता सूची में

सारांश

स्वास्थ्य मंत्रालय ने मेडिकल डिवाइसेस रूल्स 2017 में दो बड़े बदलाव किए — आउटसोर्स स्टरलाइजेशन के लिए अलग लोन लाइसेंस की अनिवार्यता खत्म और EU को क्लिनिकल जाँच छूट की मान्यता सूची में शामिल किया। इससे निर्माताओं पर बोझ घटेगा और मरीजों को उन्नत तकनीक तेज़ी से मिल सकेगी।

मुख्य बातें

स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय ने मेडिकल डिवाइसेस रूल्स, 2017 में 24 अगस्त 2026 को दो प्रमुख संशोधनों को अंतिम रूप दिया।
नियम 44 के तहत, वैध-लाइसेंसधारी सुविधा से स्टरलाइजेशन आउटसोर्स करने वाले निर्माताओं को अब अलग लोन लाइसेंस लेने की आवश्यकता नहीं होगी।
नई लेबलिंग आवश्यकताओं के अनुपालन के लिए निर्माताओं को छह महीने की ट्रांजिशन अवधि दी गई है।
नियम 63 में संशोधन कर यूरोपीय संघ (EU) को क्लिनिकल जाँच छूट की मान्यता प्राप्त सख्त रेगुलेटरी क्षेत्राधिकारों की सूची में जोड़ा गया — जिसमें पहले से अमेरिका, UK, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा और जापान शामिल थे।
इन सुधारों से अनुपालन लागत, प्रशासनिक दोहराव और रेगुलेटरी समय-सीमा में कमी आने की उम्मीद है।

स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय ने 24 अगस्त 2026 को मेडिकल डिवाइसेस रूल्स, 2017 में दो अहम संशोधनों को अंतिम रूप दिया है, जिनका उद्देश्य मेडिकल डिवाइस क्षेत्र में रेगुलेटरी अनुपालन को सरल बनाना, कारोबारी बोझ घटाना और भारतीय मरीजों तक उन्नत चिकित्सा तकनीक की पहुँच तेज़ करना है। ये बदलाव सभी संबंधित पक्षों के साथ व्यापक परामर्श के बाद लागू किए गए हैं।

मुख्य संशोधन: नियम 44 में बदलाव

मेडिकल डिवाइसेस रूल्स, 2017 के नियम 44 में किए गए संशोधन के तहत, जो निर्माता किसी वैध-लाइसेंसधारी तृतीय-पक्ष सुविधा से उत्पाद स्टरलाइजेशन का कार्य आउटसोर्स करते हैं, उन्हें अब इस गतिविधि के लिए अलग से 'लोन लाइसेंस' लेने की आवश्यकता नहीं होगी। अब तक यह प्रक्रिया उन निर्माताओं के लिए विशेष रूप से बोझिल थी जिनके पास इन-हाउस स्टरलाइजेशन सुविधाएँ उपलब्ध नहीं हैं।

इस बदलाव से दोहराव, प्रशासनिक जटिलता, अनुपालन लागत और उससे जुड़ी समय-सीमाओं में उल्लेखनीय कमी आने की उम्मीद है। साथ ही, आउटसोर्स स्टरलाइजेशन के लिए आवश्यक ट्रेसेबिलिटी तंत्र को बनाए रखा जाएगा, ताकि रेगुलेटरी निगरानी में कोई कमी न आए।

छह महीने की ट्रांजिशन अवधि

संशोधित प्रावधान नई लेबलिंग आवश्यकताओं के अनुपालन के लिए निर्माताओं को छह महीने की ट्रांजिशन अवधि प्रदान करता है। इस दौरान निर्माता अपनी लेबलिंग, पैकेजिंग और संबंधित प्रक्रियाओं में आवश्यक बदलाव कर सकेंगे। यह कदम उद्योग को अचानक अनुपालन दबाव से बचाने के लिए उठाया गया है।

नियम 63: यूरोपीय संघ को मान्यता सूची में शामिल किया

नियम 63 में संशोधन कर यूरोपीय संघ (EU) को उन मान्यता प्राप्त सख्त रेगुलेटरी क्षेत्राधिकारों की सूची में जोड़ा गया है, जिनके अनुमोदन के आधार पर भारत में बिना प्रेडिकेट डिवाइस वाले मेडिकल डिवाइस के लिए क्लिनिकल जाँच की अनिवार्यता से छूट मिल सकती है। इस सूची में पहले से अमेरिका, यूनाइटेड किंगडम, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा और जापान शामिल थे।

यह ऐसे समय में आया है जब भारत अपने मेडिकल डिवाइस क्षेत्र को वैश्विक मानकों के अनुरूप ढालने की कोशिश कर रहा है। EU की मान्यता से यूरोप में पहले से स्वीकृत उपकरण भारत में तेज़ी से उपलब्ध हो सकेंगे, जिससे मरीजों को उन्नत चिकित्सा तकनीक तक समयबद्ध पहुँच सुनिश्चित होगी।

उद्योग और मरीजों पर असर

इन सुधारों से आयातकों और निर्माताओं दोनों पर रेगुलेटरी बोझ घटने की उम्मीद है। निर्माताओं को अधिक ऑपरेशनल लचीलापन मिलेगा, जिससे मैन्युफैक्चरिंग प्रक्रियाएँ तेज़ और अधिक कुशल बनेंगी। गौरतलब है कि भारत का मेडिकल डिवाइस उद्योग तेज़ी से बढ़ रहा है और इन सुधारों को उसकी वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ाने की दिशा में अहम माना जा रहा है।

मंत्रालय के अनुसार, ये उपाय रेगुलेटरी पारदर्शिता और पूर्वानुमान क्षमता को बेहतर बनाएँगे, साथ ही मेडिकल डिवाइस की गुणवत्ता, सुरक्षा और प्रदर्शन के मानकों को बनाए रखेंगे।

आगे की राह

ये संशोधन भारत के मेडिकल डिवाइस रेगुलेटरी इकोसिस्टम को अंतरराष्ट्रीय मानकों के करीब लाने की व्यापक रणनीति का हिस्सा हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि EU को मान्यता सूची में शामिल करने और लोन लाइसेंस की अनिवार्यता हटाने से भारत में नवाचारी मेडिकल उपकरणों की उपलब्धता में उल्लेखनीय सुधार आएगा, जो अंततः स्वास्थ्य सेवा वितरण को मज़बूत करेगा।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन असली कसौटी क्रियान्वयन की होगी। आउटसोर्स स्टरलाइजेशन पर लोन लाइसेंस हटाना एक व्यावहारिक कदम है, मगर ट्रेसेबिलिटी तंत्र कितना मज़बूत रहेगा, यह स्पष्ट नहीं है। EU को मान्यता सूची में जोड़ना भारत के वैश्विक रेगुलेटरी एकीकरण की दिशा में सकारात्मक संकेत है, पर आलोचकों का कहना है कि छूट-आधारित दृष्टिकोण स्वदेशी क्लिनिकल डेटा संग्रह को कमज़ोर कर सकता है। यह देखना होगा कि क्या ये सुधार केवल प्रक्रियागत सरलीकरण तक सीमित रहते हैं, या भारत के मेडिकल डिवाइस उद्योग की वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मकता में वास्तविक बदलाव लाते हैं।
RashtraPress
24 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

मेडिकल डिवाइसेस रूल्स 2017 में क्या बदलाव किए गए हैं?
स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय ने दो प्रमुख बदलाव किए हैं — नियम 44 के तहत आउटसोर्स स्टरलाइजेशन के लिए अलग लोन लाइसेंस की अनिवार्यता समाप्त की गई है, और नियम 63 के तहत यूरोपीय संघ को क्लिनिकल जाँच छूट की मान्यता सूची में जोड़ा गया है। ये बदलाव रेगुलेटरी अनुपालन को सरल बनाने और कारोबारी बोझ घटाने के उद्देश्य से किए गए हैं।
लोन लाइसेंस की अनिवार्यता खत्म होने से निर्माताओं को क्या फ़ायदा होगा?
अब वे निर्माता जो किसी वैध-लाइसेंसधारी तृतीय-पक्ष सुविधा से स्टरलाइजेशन आउटसोर्स करते हैं, उन्हें इस कार्य के लिए अलग से लोन लाइसेंस नहीं लेना होगा। इससे दोहराव, प्रशासनिक जटिलता और अनुपालन लागत में कमी आएगी, विशेषकर उन निर्माताओं के लिए जिनके पास इन-हाउस स्टरलाइजेशन सुविधाएँ नहीं हैं।
यूरोपीय संघ को मान्यता सूची में शामिल करने का क्या महत्व है?
EU को मान्यता प्राप्त सख्त रेगुलेटरी क्षेत्राधिकारों की सूची में जोड़ने से EU में पहले से अनुमोदित मेडिकल डिवाइस भारत में क्लिनिकल जाँच की अनिवार्यता के बिना तेज़ी से उपलब्ध हो सकेंगे। इससे भारतीय मरीजों को उन्नत चिकित्सा तकनीक तक समयबद्ध पहुँच मिलेगी और आयातकों पर रेगुलेटरी बोझ घटेगा।
नई लेबलिंग आवश्यकताओं के लिए निर्माताओं को कितना समय मिलेगा?
संशोधित प्रावधान के तहत निर्माताओं को नई लेबलिंग आवश्यकताओं के अनुपालन के लिए छह महीने की ट्रांजिशन अवधि दी गई है। इस दौरान वे अपनी लेबलिंग, पैकेजिंग और संबंधित प्रक्रियाओं में आवश्यक बदलाव कर सकेंगे।
क्लिनिकल जाँच छूट की मान्यता सूची में पहले कौन-से देश शामिल थे?
EU के शामिल होने से पहले इस सूची में अमेरिका, यूनाइटेड किंगडम, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा और जापान शामिल थे। EU को जोड़े जाने के बाद यह सूची अब छह प्रमुख वैश्विक रेगुलेटरी क्षेत्राधिकारों को कवर करती है।
राष्ट्र प्रेस
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