मिडिल ईस्ट संघर्ष: 'हॉर्मूज' के बाद 'बाब-अल-मंदेब' पर बढ़ता संकट, इंडियन नेवी अलर्ट
सारांश
Key Takeaways
- स्ट्रेट ऑफ बाब-अल-मंदेब पर संकट मंडरा रहा है।
- हूती विद्रोही इज़राइल पर हमले कर रहे हैं।
- भारतीय नौसेना सतर्क है और सुरक्षा उपाय कर रही है।
- वैश्विक व्यापार पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है।
- अमेरिका की सैन्य उपस्थिति इस क्षेत्र में महत्वपूर्ण है।
नई दिल्ली, 31 मार्च (राष्ट्र प्रेस)। ईरान और अमेरिका के बीच चल रहा संघर्ष अब इज़राइल तक पहुंच चुका है, जिसमें ईरान समर्थित यमन के हूती विद्रोही भी शामिल हो गए हैं। हूतियों ने इज़राइल पर कई मिसाइल हमले किए हैं। स्ट्रेट ऑफ हॉर्मूज के बाधित होने से वैश्विक ऊर्जा संकट पहले से ही गहरा चुका है। अब एक नया संकट स्ट्रेट ऑफ बाब-अल-मंदेब पर उत्पन्न हो सकता है, जो रेड सी और अदन की खाड़ी के बीच एक महत्वपूर्ण चोक प्वाइंट है। इसी कारण भारतीय नौसेना सतर्क है। सरकारी अधिकारियों के अनुसार, इस समय उत्तरी अरब सागर में ओमान की खाड़ी और अदन की खाड़ी के आसपास भारतीय नौसेना के कई युद्धपोत तैनात हैं। एंटी-पायरेसी मिशन के तहत यहां हमेशा एक युद्धपोत मौजूद रहता है। वेस्ट एशिया संकट के दौरान भारतीय नौसेना लगातार भारतीय कच्चे तेल और एलपीजी टैंकरों को एस्कॉर्ट कर रही है। अधिकारियों के अनुसार, आवश्यकता पड़ने पर भारतीय ध्वज वाले जहाजों को अतिरिक्त सुरक्षा भी प्रदान की जा सकती है।
फिलहाल, हूतियों ने रेड सी में किसी जहाज पर हमला नहीं किया है, लेकिन भविष्य में ऐसा होना संभव है। ईरान पहले ही संकेत दे चुका है कि वह स्ट्रेट ऑफ बाब-अल-मंदेब को भी बाधित कर सकता है। वर्ष 2023-24 में जब रेड सी क्षेत्र में हूती हमले बढ़े थे, तब दुनिया की बड़ी शिपिंग कंपनियों ने इस मार्ग को जोखिमपूर्ण घोषित किया था।
बाब-अल-मंदेब लगभग 20 मील चौड़ा है और यह रेड सी को अदन की खाड़ी से जोड़ता है। यहां से करीब 12 प्रतिशत वैश्विक व्यापार गुजरता है। रक्षा विशेषज्ञ लेफ्टिनेंट जनरल संजय कुलकर्णी (सेवानिवृत्त) के अनुसार, हूती ऐसा प्रयास कर सकते हैं क्योंकि वे ईरान के प्रॉक्सी हैं। उनका कहना है कि वर्तमान में ईरान दबाव में है, और ऐसे में हूती उसकी मदद के लिए इस मार्ग को भी 'वेपोनाइज' करने की कोशिश कर सकते हैं। यदि ऐसा होता है, तो वैश्विक व्यापार पर गंभीर प्रभाव पड़ेगा, जिसमें भारत भी शामिल है—महंगाई बढ़ सकती है, उर्वरकों की कीमतें बढ़ सकती हैं, और निर्यात प्रभावित हो सकता है।
उन्होंने यह भी कहा कि जिबूती में अमेरिका के अलावा चीन, जापान और फ्रांस की सैन्य मौजूदगी है और भारत की भी सक्रियता वहां बनी हुई है, इसलिए इस क्षेत्र को बाधित करना इतना आसान नहीं होगा। हालाँकि, यदि हूती यमन से ऐसी गतिविधियाँ जारी रखते हैं, तो अमेरिका कड़े कदम उठा सकता है, जिससे क्षेत्र में गतिविधियाँ और कठिन हो जाएंगी।
यह क्षेत्र वैश्विक व्यापार के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। एक प्रमुख समुद्री मार्ग फारस की खाड़ी से स्ट्रेट ऑफ हॉर्मूज, ओमान की खाड़ी और अरब सागर होते हुए आगे जाता है। दूसरा मार्ग मेडिटेरेनियन सागर से स्वेज नहर, रेड सी और अदन की खाड़ी होते हुए अरब सागर तक आता है। यदि रेड सी और स्ट्रेट ऑफ बाब-अल-मंदेब भी प्रभावित होते हैं, तो स्थिति बेहद गंभीर हो सकती है।
यह इलाका पहले से ही पायरेसी के लिए कुख्यात रहा है। सोमालिया के समुद्री लुटेरे अक्सर यहां सक्रिय रहते हैं, क्योंकि यह व्यापार का सबसे छोटा और व्यस्त मार्ग है। यूरोप जाने वाला ऊर्जा व्यापार भी इसी मार्ग से होकर गुजरता है। यदि यह मार्ग बाधित होता है, तो जहाजों को अफ्रीका के दक्षिणी छोर 'केप ऑफ गुड होप' के रास्ते जाना पड़ेगा, जिससे समय और लागत में भारी वृद्धि होगी।
वेस्ट एशिया में जारी तनाव का असर भारत पर भी पड़ रहा है। भारत का ऊर्जा व्यापार जारी है, लेकिन सामान्य गति से नहीं। भारत का लगभग 80 प्रतिशत ऊर्जा आयात फारस की खाड़ी, स्ट्रेट ऑफ हॉर्मूज और ओमान की खाड़ी के रास्ते आता है। इसके अलावा, लगभग 90 प्रतिशत अन्य कार्गो व्यापार अदन की खाड़ी, रेड सी और स्वेज नहर के जरिए भारत तक पहुंचता है।
भारत अपनी जरूरत का लगभग 80 प्रतिशत कच्चा तेल आयात करता है, जिसमें इराक, सऊदी अरब, यूएई, रूस और अमेरिका प्रमुख स्रोत हैं। संघर्ष शुरू होने के बाद से अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी हो रही है। ओमान की खाड़ी और अदन की खाड़ी से होकर जहाज अरब सागर और फिर हिंद महासागर तक पहुंचते हैं। यही मार्ग यूरोप, मिडिल ईस्ट और वेस्ट एशिया को दक्षिण-पूर्व एशिया और पूर्वी देशों से जोड़ता है।