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PM मोदी के जन्मदिन पर सहपाठी दौलत खान पठान ने सुनाई वडनगर की अनसुनी कहानियाँ

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PM मोदी के जन्मदिन पर सहपाठी दौलत खान पठान ने सुनाई वडनगर की अनसुनी कहानियाँ

सारांश

PM मोदी के 75वें जन्मदिन पर उनके वडनगर के सहपाठी दौलत खान पठान ने अनसुनी यादें साझा कीं — 1961 में RSS की ₹1 फीस जुटाने की जद्दोजहद से लेकर माँ हीराबा की गरीबी और साधु बनकर भारत भ्रमण तक, ये बचपन की कहानियाँ मोदी के व्यक्तित्व की गहरी परतें उघाड़ती हैं।

मुख्य बातें

दौलत खान पठान ने प्रेरणा स्कूल, वडनगर में कक्षा 4 से 7 तक नरेंद्र मोदी के साथ पढ़ाई की।
1961 में दोनों ने RSS में दाखिले के लिए ₹1 फीस जुटाने को एक-दूसरे की माँ को मनाया।
मोदी की माँ हीराबा बर्तन माँजकर एक आना प्रति बर्तन कमाती थीं; पारिवारिक गरीबी ने मोदी की सेवा-भावना को आकार दिया।
मोदी ने घर छोड़कर तीन वर्ष भिक्षा पर निर्भर रहते हुए साधु के रूप में सम्पूर्ण भारत का भ्रमण किया।
1977 की मोरबी बाढ़ में बरामद सोने के आभूषण पुलिस को सौंपकर मोदी ने ईमानदारी की मिसाल कायम की।
2009 में मुख्यमंत्री कार्यालय में मुलाकात के दौरान मोदी ने पठान को मज़ाक में 'आधा गुजरात' देने की पेशकश की।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 75वें जन्मदिन पर उनके बचपन के सहपाठी और जमीयत उलेमा ए हिंद के मेहसाणा इकाई के अध्यक्ष तथा बीएसएनएल से सेवानिवृत्त दौलत खान पठान ने गुजरात के वडनगर में बिताए बचपन के उन दिनों को साझा किया, जो आज भी उनकी स्मृति में जीवंत हैं। उन्होंने बताया कि नरेंद्र मोदी न केवल एक तेज़ विद्यार्थी थे, बल्कि समाज-सेवा के प्रति उनका समर्पण भाव बचपन से ही झलकता था।

वडनगर की गलियों में बनी दोस्ती

दौलत खान पठान वडनगर के पठान मोहल्ले में रहते थे, जहाँ 250 से 300 घर थे। उन्होंने बताया कि उन्होंने प्रेरणा स्कूल में कक्षा 4 से 7 तक नरेंद्र मोदी के साथ पढ़ाई की। दोनों के बीच न केवल पढ़ाई बल्कि वाद-विवाद प्रतियोगिताओं में भी गहरी प्रतिस्पर्धा और दोस्ती रही।

पठान ने बताया कि दोनों हर बुधवार को होने वाली साप्ताहिक डिबेट में नियमित रूप से शीर्ष स्थान प्राप्त करते थे। 1965 में तत्कालीन मुख्यमंत्री बलवंतराय मेहता पर आयोजित एक वाद-विवाद के बाद पठान ने मोदी को पुस्तकालय जाकर अखबार पढ़ने के लिए प्रेरित किया — एक आदत जो बाद में उनके राजनीतिक जागरण की नींव बनी।

एक रुपये की फीस और RSS में दाखिला

बचपन का एक अहम पल 1961 में आया, जब दोनों मित्र डॉ. वसंत पारिख के नेतृत्व में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) में शामिल होना चाहते थे, लेकिन दोनों के पास ₹1 की पंजीकरण फीस नहीं थी। नरेंद्र मोदी खुद पठान के घर गए ताकि उनकी माँ को फीस देने के लिए मना सकें, जबकि पठान मोदी की माँ हीराबा के पास गए और उनसे एक रुपया दिलवाया। इस तरह दोनों ने RSS में पंजीकरण करवाया।

यह प्रसंग दोनों के बीच की उस निश्छल दोस्ती को दर्शाता है जो सामाजिक और धार्मिक सीमाओं से परे थी। गौरतलब है कि दौलत खान पठान मुस्लिम समुदाय से हैं, और उनकी यह मित्रता वडनगर की सांप्रदायिक सौहार्द की मिसाल मानी जाती है।

गरीबी और सेवा के संस्कार

पठान ने बताया कि मोदी के परिवार की आर्थिक स्थिति अत्यंत कठिन थी। मोदी की माँ हीराबा कुएँ से पानी खींचकर और बर्तन माँजकर एक आना प्रति बर्तन कमाती थीं। यह देखकर युवा नरेंद्र के मन में देश-सेवा की भावना और गहरी होती गई।

डॉ. वसंत पारिख के मार्गदर्शन में मोदी और RSS के अन्य साथी चंपा, नवापुरा और सुल्तानपुरा जैसे सूखाग्रस्त गाँवों में ₹2 में 5 किलो बाजरे के भारी बोरे पहुँचाते थे। यह सामुदायिक सेवा का वह पाठ था जिसने उनके भावी जीवन की दिशा तय की।

घर छोड़ा, साधु बने, भारत घूमे

पठान के अनुसार, डॉ. पारिख और RSS के निस्वार्थ समर्पण से प्रेरित होकर नरेंद्र मोदी ने विवाह न करने का निर्णय लिया और अपने घर को छोड़कर तीन वर्षों तक साधु के रूप में भिक्षा पर निर्भर रहते हुए सम्पूर्ण भारत का भ्रमण किया। 1971 में गुजरात लौटने के बाद वे अहमदाबाद के खड़िया RSS कार्यालय में रहने लगे।

1975 की आपातकाल के दौरान उन्होंने जेल में बंद विपक्षी नेताओं की सेवा की और अपनी पहली पुस्तक 'संघर्ष मा गुजरात' लिखी। 1977 में मोरबी बाढ़ राहत कार्य के दौरान उन्होंने बरामद प्रत्येक सोने का आभूषण पुलिस को सौंपा, जिससे उन्हें व्यापक सम्मान मिला।

2009 में मुलाकात और 'आधा गुजरात' वाला मज़ाक

कई दशकों के अंतराल के बाद 2009 में गुजरात के मुख्यमंत्री कार्यालय में एक बैठक के दौरान मोदी ने पठान के साथ बचपन की उन यादों को स्नेहपूर्वक ताज़ा किया। उन्होंने मज़ाक में पठान को सेवानिवृत्ति पर 'आधा गुजरात' देने की पेशकश की। हालाँकि पारिवारिक जिम्मेदारियों के कारण पठान भारतीय जनता पार्टी (BJP) की सक्रिय राजनीति में शामिल नहीं हो सके।

पठान ने यह भी बताया कि 1990 में मोदी ने अपने बड़े भाई सोमभाई का स्थानांतरण रद्द कराने के लिए तत्कालीन स्वास्थ्य मंत्री अशोक भट्ट से बात की थी, जो सार्वजनिक कर्तव्य और पारिवारिक मामलों के बीच उनके स्पष्ट अंतर को दर्शाता है। पठान के अनुसार मोदी ने अपने गृहनगर वडनगर को विशेष दर्जा देने की बजाय पूरे राज्य को समान दृष्टि से देखा।

संपादकीय दृष्टिकोण

सामुदायिक सेवा और त्याग — मोदी की सार्वजनिक छवि के उन स्तंभों को रेखांकित करती है जो उनके राजनीतिक जीवन का आधार बने।
RashtraPress
17 सितंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

दौलत खान पठान कौन हैं और मोदी से उनका क्या संबंध है?
दौलत खान पठान गुजरात के वडनगर में नरेंद्र मोदी के बचपन के सहपाठी हैं, जिन्होंने प्रेरणा स्कूल में कक्षा 4 से 7 तक मोदी के साथ पढ़ाई की। वे बीएसएनएल से सेवानिवृत्त हैं और जमीयत उलेमा ए हिंद के मेहसाणा इकाई के अध्यक्ष हैं।
1961 में RSS फीस की ₹1 की कहानी क्या है?
1961 में नरेंद्र मोदी और दौलत खान पठान दोनों RSS में शामिल होना चाहते थे लेकिन दोनों के पास ₹1 की पंजीकरण फीस नहीं थी। मोदी पठान के घर गए और उनकी माँ को फीस देने के लिए मनाया, जबकि पठान मोदी की माँ हीराबा के पास गए और उनसे एक रुपया दिलवाया — इस तरह दोनों का RSS में पंजीकरण हुआ।
नरेंद्र मोदी ने साधु बनकर भारत भ्रमण क्यों किया?
पठान के अनुसार, डॉ. वसंत पारिख और RSS के निस्वार्थ समर्पण के सिद्धांतों से प्रेरित होकर मोदी ने विवाह न करने और देश-सेवा को समर्पित जीवन जीने का निर्णय लिया। इसके बाद उन्होंने तीन वर्षों तक साधु के रूप में भिक्षा पर निर्भर रहते हुए सम्पूर्ण भारत का भ्रमण किया और 1971 में गुजरात लौटे।
2009 में मोदी और पठान की मुलाकात में क्या हुआ था?
2009 में गुजरात के मुख्यमंत्री कार्यालय में एक बैठक के दौरान मोदी ने पठान के साथ बचपन की यादें स्नेहपूर्वक ताज़ा कीं और मज़ाक में उन्हें सेवानिवृत्ति पर 'आधा गुजरात' देने की पेशकश की। हालाँकि पारिवारिक जिम्मेदारियों के कारण पठान BJP की सक्रिय राजनीति में शामिल नहीं हो सके।
मोरबी बाढ़ 1977 में मोदी की क्या भूमिका थी?
1977 की मोरबी बाढ़ राहत कार्य के दौरान नरेंद्र मोदी ने बाढ़ में बरामद प्रत्येक सोने का आभूषण पुलिस को सौंप दिया। इस ईमानदारी के कारण उन्हें व्यापक सम्मान प्राप्त हुआ और उनकी छवि एक निस्वार्थ कार्यकर्ता के रूप में स्थापित हुई।
राष्ट्र प्रेस
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