PM मोदी के जन्मदिन पर सहपाठी दौलत खान पठान ने सुनाई वडनगर की अनसुनी कहानियाँ
सारांश
मुख्य बातें
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 75वें जन्मदिन पर उनके बचपन के सहपाठी और जमीयत उलेमा ए हिंद के मेहसाणा इकाई के अध्यक्ष तथा बीएसएनएल से सेवानिवृत्त दौलत खान पठान ने गुजरात के वडनगर में बिताए बचपन के उन दिनों को साझा किया, जो आज भी उनकी स्मृति में जीवंत हैं। उन्होंने बताया कि नरेंद्र मोदी न केवल एक तेज़ विद्यार्थी थे, बल्कि समाज-सेवा के प्रति उनका समर्पण भाव बचपन से ही झलकता था।
वडनगर की गलियों में बनी दोस्ती
दौलत खान पठान वडनगर के पठान मोहल्ले में रहते थे, जहाँ 250 से 300 घर थे। उन्होंने बताया कि उन्होंने प्रेरणा स्कूल में कक्षा 4 से 7 तक नरेंद्र मोदी के साथ पढ़ाई की। दोनों के बीच न केवल पढ़ाई बल्कि वाद-विवाद प्रतियोगिताओं में भी गहरी प्रतिस्पर्धा और दोस्ती रही।
पठान ने बताया कि दोनों हर बुधवार को होने वाली साप्ताहिक डिबेट में नियमित रूप से शीर्ष स्थान प्राप्त करते थे। 1965 में तत्कालीन मुख्यमंत्री बलवंतराय मेहता पर आयोजित एक वाद-विवाद के बाद पठान ने मोदी को पुस्तकालय जाकर अखबार पढ़ने के लिए प्रेरित किया — एक आदत जो बाद में उनके राजनीतिक जागरण की नींव बनी।
एक रुपये की फीस और RSS में दाखिला
बचपन का एक अहम पल 1961 में आया, जब दोनों मित्र डॉ. वसंत पारिख के नेतृत्व में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) में शामिल होना चाहते थे, लेकिन दोनों के पास ₹1 की पंजीकरण फीस नहीं थी। नरेंद्र मोदी खुद पठान के घर गए ताकि उनकी माँ को फीस देने के लिए मना सकें, जबकि पठान मोदी की माँ हीराबा के पास गए और उनसे एक रुपया दिलवाया। इस तरह दोनों ने RSS में पंजीकरण करवाया।
यह प्रसंग दोनों के बीच की उस निश्छल दोस्ती को दर्शाता है जो सामाजिक और धार्मिक सीमाओं से परे थी। गौरतलब है कि दौलत खान पठान मुस्लिम समुदाय से हैं, और उनकी यह मित्रता वडनगर की सांप्रदायिक सौहार्द की मिसाल मानी जाती है।
गरीबी और सेवा के संस्कार
पठान ने बताया कि मोदी के परिवार की आर्थिक स्थिति अत्यंत कठिन थी। मोदी की माँ हीराबा कुएँ से पानी खींचकर और बर्तन माँजकर एक आना प्रति बर्तन कमाती थीं। यह देखकर युवा नरेंद्र के मन में देश-सेवा की भावना और गहरी होती गई।
डॉ. वसंत पारिख के मार्गदर्शन में मोदी और RSS के अन्य साथी चंपा, नवापुरा और सुल्तानपुरा जैसे सूखाग्रस्त गाँवों में ₹2 में 5 किलो बाजरे के भारी बोरे पहुँचाते थे। यह सामुदायिक सेवा का वह पाठ था जिसने उनके भावी जीवन की दिशा तय की।
घर छोड़ा, साधु बने, भारत घूमे
पठान के अनुसार, डॉ. पारिख और RSS के निस्वार्थ समर्पण से प्रेरित होकर नरेंद्र मोदी ने विवाह न करने का निर्णय लिया और अपने घर को छोड़कर तीन वर्षों तक साधु के रूप में भिक्षा पर निर्भर रहते हुए सम्पूर्ण भारत का भ्रमण किया। 1971 में गुजरात लौटने के बाद वे अहमदाबाद के खड़िया RSS कार्यालय में रहने लगे।
1975 की आपातकाल के दौरान उन्होंने जेल में बंद विपक्षी नेताओं की सेवा की और अपनी पहली पुस्तक 'संघर्ष मा गुजरात' लिखी। 1977 में मोरबी बाढ़ राहत कार्य के दौरान उन्होंने बरामद प्रत्येक सोने का आभूषण पुलिस को सौंपा, जिससे उन्हें व्यापक सम्मान मिला।
2009 में मुलाकात और 'आधा गुजरात' वाला मज़ाक
कई दशकों के अंतराल के बाद 2009 में गुजरात के मुख्यमंत्री कार्यालय में एक बैठक के दौरान मोदी ने पठान के साथ बचपन की उन यादों को स्नेहपूर्वक ताज़ा किया। उन्होंने मज़ाक में पठान को सेवानिवृत्ति पर 'आधा गुजरात' देने की पेशकश की। हालाँकि पारिवारिक जिम्मेदारियों के कारण पठान भारतीय जनता पार्टी (BJP) की सक्रिय राजनीति में शामिल नहीं हो सके।
पठान ने यह भी बताया कि 1990 में मोदी ने अपने बड़े भाई सोमभाई का स्थानांतरण रद्द कराने के लिए तत्कालीन स्वास्थ्य मंत्री अशोक भट्ट से बात की थी, जो सार्वजनिक कर्तव्य और पारिवारिक मामलों के बीच उनके स्पष्ट अंतर को दर्शाता है। पठान के अनुसार मोदी ने अपने गृहनगर वडनगर को विशेष दर्जा देने की बजाय पूरे राज्य को समान दृष्टि से देखा।