मां की याद में भावुक हुए PM मोदी, बोले — 'सौ साल आशीर्वाद मिला, फिर भी कमी आज भी महसूस होती है'
सारांश
मुख्य बातें
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बुधवार, 12 जुलाई को नई दिल्ली में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान अपनी स्वर्गीय माँ को भावपूर्वक याद किया। पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की आत्मकथा 'ट्रायम्फ ऑफ द इंडियन रिपब्लिक: माई लाइफ, माई स्ट्रगल्स' के विमोचन अवसर पर बोलते हुए मोदी ने कहा कि माँ के सौ वर्ष से अधिक जीवित रहने के बावजूद उनकी कमी आज भी गहराई से महसूस होती है।
मोदी के भावपूर्ण उद्गार
प्रधानमंत्री ने कहा, 'मैं भाग्यशाली रहा हूँ कि मेरी माँ सौ साल से भी अधिक समय तक जीवित रहीं और मुझे आशीर्वाद देती रहीं। उसके बावजूद आज भी मैं माँ की कमी महसूस करता हूँ।' यह वक्तव्य उस समय आया जब मोदी कोविंद के जीवन-संघर्षों का उल्लेख कर रहे थे और माँ की भूमिका पर विशेष रूप से केंद्रित हुए।
कोविंद के जीवन-संघर्ष का वर्णन
प्रधानमंत्री ने रामनाथ कोविंद के बचपन की एक हृदयविदारक घटना का उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि कानपुर देहात के एक साधारण परिवार में जन्मे कोविंद के घर एक बार गर्मी के मौसम में आग लग गई। उनकी माँ अपनी चिंता छोड़कर घर की चीजें बचाने में जुट गईं — क्योंकि एक सामान्य परिवार में वे वस्तुएँ बच्चों के पालन-पोषण का एकमात्र जरिया होती हैं। उसी प्रयास में आग की चपेट में आने से उनकी माँ की मृत्यु हो गई।
मोदी ने कहा, 'आप कल्पना कर सकते हैं कि छोटी सी उम्र में इस तरह की घटना कितनी दर्दनाक रही होगी। यह ऐसा घटनाक्रम था, कोई भी उससे टूट सकता था, लेकिन कोविंद जी को उन मुश्किलों ने मजबूत किया। पड़ोस की एक माता जी ने उनके पालन-पोषण में मदद की।'
शिक्षा को बनाया सामर्थ्य का मार्ग
प्रधानमंत्री ने रेखांकित किया कि संघर्षों के बीच रामनाथ कोविंद ने शिक्षा को अपनी शक्ति का आधार बनाया। उन्होंने संसाधनों की कमी को अपनी कमज़ोरी नहीं बनने दिया और एक ऐसे मुकाम तक पहुँचे जिसकी कल्पना उस दौर में शायद किसी ने नहीं की होगी — भारत के राष्ट्रपति पद तक। मोदी ने कहा कि इतने बड़े ओहदे पर पहुँचने के बाद भी कोविंद की विनम्रता और सादगी कायम रही।
समाज और सफलता पर दार्शनिक दृष्टि
प्रधानमंत्री ने एक व्यापक मानवीय प्रवृत्ति का भी उल्लेख किया — कि लोग अपनी सफलता का श्रेय स्वयं लेते हैं और कठिनाइयों के लिए समाज को जिम्मेदार ठहराते हैं। उन्होंने कहा कि जब हृदय उदार हो और भारतीय संस्कार गहरे हों, तो व्यक्ति समाज की कमियाँ निकालने में समय नहीं गँवाता, बल्कि सकारात्मक पक्ष पर ध्यान केंद्रित करता है और अपनी सफलता में समाज को बराबर का भागीदार मानता है। उनके अनुसार, कोविंद की आत्मकथा और उसका शीर्षक इसी भावना का जीवंत उदाहरण है।
मोरारजी देसाई से मिली दिशा
मोदी ने बताया कि मोरारजी भाई देसाई के साथ काम करने के अनुभव ने कोविंद को देशसेवा की नई दिशा दी। वहीं से उन्होंने राजनीति और समाजसेवा को अपना मार्ग चुना और अपने कर्तव्यों के प्रति समर्पण को सर्वोपरि रखा। संसद में उनका कार्यकाल इस समर्पण का प्रमाण है। यह आत्मकथा उन सभी के लिए प्रेरणा का स्रोत है जो विपरीत परिस्थितियों में भी अपना मार्ग बनाते हैं।