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खरगोन की 408 साल पुरानी खप्पर परंपरा: महानवमी पर मां महाकाली की सवारी में उमड़े हजारों श्रद्धालु

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खरगोन की 408 साल पुरानी खप्पर परंपरा: महानवमी पर मां महाकाली की सवारी में उमड़े हजारों श्रद्धालु

सारांश

मध्यप्रदेश के खरगोन में 408 साल पुरानी खप्पर परंपरा इस वर्ष भी जीवंत रही। महानवमी की मध्यरात्रि में भावसार क्षत्रिय समाज ने मां महाकाली की भव्य सवारी निकाली — ढोल-मृदंग, निमाड़ी गरबियाँ और रौद्र स्वरूप के दर्शन के लिए हजारों श्रद्धालु रातभर डटे रहे।

मुख्य बातें

मध्यप्रदेश के खरगोन के भावसार मोहल्ले में 408 वर्ष पुरानी खप्पर परंपरा नवरात्रि 2026 में भी निर्बाध जारी रही।
महानवमी और दशहरे की मध्यरात्रि में भावसार क्षत्रिय समाज द्वारा मां महाकाली की भव्य सवारी निकाली गई।
आयोजन रात लगभग 4 बजे शुरू होकर सुबह तक चला; हजारों श्रद्धालु रातभर जागकर दर्शन करते हैं।
खप्पर आयोजन समिति के अध्यक्ष डॉ.
मोहन भावसार ने बताया कि यह दायित्व पीढ़ी दर पीढ़ी उन्हीं परिवारों में चला आ रहा है।
यह परंपरा खरगोन की धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान का अभिन्न हिस्सा मानी जाती है।

मध्यप्रदेश के खरगोन शहर के भावसार मोहल्ले में नवरात्रि 2026 के दौरान 408 वर्ष पुरानी खप्पर परंपरा एक बार फिर पूरी श्रद्धा और आस्था के साथ निभाई गई। महानवमी और दशहरे की मध्यरात्रि में भावसार क्षत्रिय समाज द्वारा निकाली गई मां महाकाली की भव्य सवारी के दर्शन के लिए हजारों श्रद्धालु पूरी रात जागकर माता की आराधना में लीन रहे।

मुख्य घटनाक्रम

यह आयोजन हर वर्ष शारदीय नवरात्र के दौरान होता है। इस वर्ष भी देर रात लगभग 4 बजे से शुरू होकर यह सवारी सुबह तक चली। हाथों में खप्पर, ढोल-मृदंग की थाप और निमाड़ी गरबियों की मंगलमयी गूंज के बीच निकलने वाली यह सवारी अपने अलौकिक स्वरूप के लिए पूरे निमाड़ अंचल में प्रसिद्ध है। आयोजन के समापन के बाद भावसार समाज द्वारा दशहरे का पर्व मनाया जाता है।

परंपरा की विशेषता

इस अनूठी परंपरा में विशेष रूप से चुने गए युवक मां महाकाली का रौद्र स्वरूप धारण कर शेर पर सवार होते हैं। उनके एक हाथ में तलवार और दूसरे हाथ में जोगनी का प्रतीकात्मक नरमुंड होता है। यह दृश्य श्रद्धालुओं में भक्ति और रोमांच का संचार करता है। गौरतलब है कि यह भूमिका निभाने वाले युवक उन्हीं परिवारों से आते हैं जो कई पीढ़ियों से इस दायित्व को निभाते चले आ रहे हैं।

विशेषज्ञ क्या कहते हैं

खप्पर आयोजन समिति के अध्यक्ष डॉ. मोहन भावसार ने बताया, 'इतने सालों से भावसार क्षत्रिय समुदाय विशेष रूप से महानवमी उत्सव का आयोजन कर रहा है। देवी का सम्मान करने की यह परंपरा परिवारों में पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही है।' उन्होंने पुष्टि की कि यह परंपरा बिना किसी व्यवधान के 408 वर्षों से निरंतर जारी है।

सांस्कृतिक एवं धार्मिक महत्व

खप्पर परंपरा केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि खरगोन की सांस्कृतिक विरासत का अभिन्न अंग है। यह ऐसे समय में विशेष महत्व रखती है जब कई प्राचीन लोक-परंपराएँ आधुनिकता की आँधी में विलुप्त होती जा रही हैं। निमाड़ अंचल की यह पहचान आज भी अपने मूल स्वरूप में जीवित है, जो इसे राज्य की सांस्कृतिक थाती का एक दुर्लभ उदाहरण बनाती है।

आम जनता पर असर

इस आयोजन में हजारों की संख्या में श्रद्धालु देर रात से ही आयोजन स्थल पर पहुँच जाते हैं और पूरी रात जागकर मां के दर्शन की प्रतीक्षा करते हैं। यह आयोजन केवल भावसार समाज तक सीमित नहीं, बल्कि खरगोन और आसपास के क्षेत्रों से भी बड़ी संख्या में भक्त इसमें शामिल होते हैं। आने वाले वर्षों में भी यह परंपरा उसी भव्यता के साथ जारी रहेगी, क्योंकि नई पीढ़ी इसे उतनी ही आस्था से आगे बढ़ा रही है।

संपादकीय दृष्टिकोण

तब 408 वर्षों की निरंतरता अपने आप में एक सामाजिक शोध का विषय है। हालाँकि, इस आयोजन का व्यापक दस्तावेज़ीकरण और डिजिटल संरक्षण अभी भी अपेक्षित है, ताकि यह विरासत अगली पीढ़ियों तक केवल स्मृति नहीं, बल्कि प्रमाण के रूप में भी पहुँचे।
RashtraPress
20 अक्टूबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

खरगोन की खप्पर परंपरा क्या है?
खप्पर परंपरा मध्यप्रदेश के खरगोन के भावसार मोहल्ले में 408 वर्षों से चली आ रही एक अनूठी धार्मिक परंपरा है, जिसमें भावसार क्षत्रिय समाज महानवमी और दशहरे की मध्यरात्रि में मां महाकाली की भव्य सवारी निकालता है। इसमें युवक मां महाकाली का रौद्र स्वरूप धारण कर शेर पर सवार होते हैं और हाथों में तलवार व जोगनी का प्रतीकात्मक नरमुंड लेकर चलते हैं।
खप्पर परंपरा कब और कहाँ होती है?
यह परंपरा हर वर्ष शारदीय नवरात्र के दौरान खरगोन के भावसार मोहल्ले में आयोजित होती है। आयोजन महानवमी की देर रात लगभग 4 बजे शुरू होकर दशहरे की सुबह तक चलता है।
इस परंपरा में कौन भाग लेता है?
भावसार क्षत्रिय समाज इस परंपरा का संचालन करता है। मां महाकाली का स्वांग रचने वाले युवक उन्हीं परिवारों से आते हैं जो कई पीढ़ियों से यह भूमिका निभाते चले आ रहे हैं। दर्शन के लिए खरगोन और आसपास के क्षेत्रों से हजारों श्रद्धालु रातभर जागकर उपस्थित रहते हैं।
क्या यह परंपरा केवल धार्मिक है या इसका सांस्कृतिक महत्व भी है?
यह परंपरा धार्मिक और सांस्कृतिक दोनों दृष्टियों से महत्वपूर्ण है। यह खरगोन और निमाड़ अंचल की सांस्कृतिक विरासत का अभिन्न हिस्सा मानी जाती है। ढोल-मृदंग और निमाड़ी गरबियों की गूंज इसे एक लोक-सांस्कृतिक उत्सव का रूप भी देती है।
खप्पर आयोजन समिति के अनुसार यह परंपरा कितने समय से चल रही है?
खप्पर आयोजन समिति के अध्यक्ष डॉ. मोहन भावसार के अनुसार यह परंपरा 408 वर्षों से लगातार निर्बाध रूप से चली आ रही है। उन्होंने बताया कि देवी का सम्मान करने की यह परंपरा पीढ़ी दर पीढ़ी परिवारों में आगे बढ़ती रही है।
राष्ट्र प्रेस
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