27 सितंबर 2026
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ओवैसी और राहुल गांधी एक ही डीएनए के: मुफ्ती वजाहत कासमी का विपक्ष पर तीखा हमला

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ओवैसी और राहुल गांधी एक ही डीएनए के: मुफ्ती वजाहत कासमी का विपक्ष पर तीखा हमला

सारांश

इस्लामिक स्कॉलर मुफ्ती वजाहत कासमी ने एक साथ कई मोर्चों पर बात की — ओवैसी और राहुल को 'एक ही डीएनए' का बताया, महमूद मदनी के यूएन वाले बयान को राजनीति करार दिया और मुसलमानों से संविधान को सर्वोपरि मानने की अपील की।

मुख्य बातें

मुफ्ती वजाहत कासमी ने 27 सितंबर 2026 को कहा कि असदुद्दीन ओवैसी और राहुल गांधी 'एक ही डीएनए के हैं' जो हार पर चुनाव आयोग को दोषी ठहराते हैं।
उन्होंने कहा कि एसआईआर प्रक्रिया से बंगाल समेत कई राज्यों में लाखों बांग्लादेशी मतदाता सूची से बाहर हुए, जिस पर विपक्ष चुप है।
दिल्ली उच्च न्यायालय की पॉक्सो टिप्पणी को उचित बताते हुए कासमी ने कहा — 'देश का संविधान सर्वोपरि है, पर्सनल लॉ कुछ भी नहीं।' महमूद मदनी के संयुक्त राष्ट्र वाले बयान को 'राजनीति' करार दिया; कहा — भारत दुनिया में मुसलमानों के लिए सबसे शांतिपूर्ण मुल्क है।
मस्जिद-मदरसा दस्तावेज़ीकरण में लापरवाही के लिए मुस्लिम संगठनों को भी जवाबदेह ठहराया।

इस्लामिक स्कॉलर मुफ्ती वजाहत कासमी ने 27 सितंबर 2026 को नई दिल्ली में चुनाव आयोग की विपक्षी आलोचना, असदुद्दीन ओवैसी की एसआईआर संबंधी टिप्पणियों, दिल्ली उच्च न्यायालय के पॉक्सो फैसले और महमूद मदनी के संयुक्त राष्ट्र वाले बयान पर कड़ी प्रतिक्रिया दी। कासमी ने ओवैसी और राहुल गांधी को एक ही सोच का बताते हुए चुनाव हारने पर ईवीएम और चुनाव आयोग को कोसने की प्रवृत्ति पर निशाना साधा।

विपक्ष और चुनाव आयोग पर मुफ्ती का रुख

मुफ्ती वजाहत कासमी ने कहा, 'क्या इन सभी संगठनों ने — खासकर 'कॉकरोच जनता पार्टी' ने — दिल्ली को विरोध-प्रदर्शन की राजधानी मान लिया है? दिल्ली में करोड़ों लोग रहते हैं और बार-बार के प्रदर्शनों से आम लोगों को परेशानी होती है।' उन्होंने यह भी याद दिलाया कि कांग्रेस के शासनकाल में मुख्य चुनाव आयुक्तों को सेवानिवृत्ति के बाद राज्यपाल या राज्यसभा सांसद बनाने की परंपरा रही है, जिससे पारदर्शिता पर सवाल उठते हैं।

ओवैसी-राहुल को एक ही डीएनए का बताया

असदुद्दीन ओवैसी के एसआईआर संबंधी बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए कासमी ने कहा, 'असदुद्दीन ओवैसी और राहुल गांधी जैसे लोग एक ही डीएनए के हैं। ये लोग जब चुनाव जीतते हैं तो खुद जीतते हैं और जब हार जाते हैं तो चुनाव आयोग और ईवीएम पर सवाल खड़े कर देते हैं।' उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि बंगाल समेत कई राज्यों में एसआईआर प्रक्रिया के ज़रिए लाखों बांग्लादेशियों को मतदाता सूची से बाहर किए जाने पर विपक्ष चुप क्यों है। उनके अनुसार, 'चुनाव आयोग एक संवैधानिक संस्था है जो अपना काम कर रही है।'

पॉक्सो और पर्सनल लॉ पर स्पष्ट राय

दिल्ली उच्च न्यायालय की पॉक्सो संबंधी टिप्पणी पर मुफ्ती कासमी ने कहा, 'हाईकोर्ट की ओर से अच्छी टिप्पणी की गई है। हमारे लिए देश का संविधान सर्वोपरि है — पर्सनल लॉ कुछ भी नहीं।' उन्होंने मुस्लिम पर्सनल लॉ पर भी तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि पर्सनल लॉ की आड़ में बेटियों को संपत्ति अधिकारों से वंचित रखने की प्रवृत्ति पर कोई मौलाना या संगठन बात नहीं करता। उन्होंने मुसलमानों से अपील की कि वे संविधान के दायरे में चलें।

महमूद मदनी के यूएन वाले बयान पर कड़ी आपत्ति

महमूद मदनी की ओर से संयुक्त राष्ट्र का दरवाजा खटखटाने की बात पर मुफ्ती कासमी ने कहा कि मदनी एक सीमित देवबंदी समूह का प्रतिनिधित्व करते हैं और उनके बयान अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मुसलमानों की छवि खराब करते हैं। उन्होंने कहा, 'पूरी दुनिया में किसी भी मजहब के लिए सबसे ज़्यादा शांति, शान और खूबसूरत मुल्क भारत है।' कासमी ने हामिद अंसारी के उपराष्ट्रपति पद छोड़ने के बाद मुसलमानों की असुरक्षा संबंधी बयान का भी उल्लेख करते हुए कहा कि यह एक राजनीतिक टोले की मानसिकता है।

मस्जिदों-मदरसों पर संगठनों की जवाबदेही

मुफ्ती कासमी ने यह भी रेखांकित किया कि जिन संगठनों ने वर्षों में मस्जिदों और मदरसों के दस्तावेज़, नक्शे और पंजीकरण को दुरुस्त करने की कोशिश नहीं की, वे आज उनके गिराए जाने का दोष केवल सरकार पर मढ़ रहे हैं। उन्होंने कहा, 'इन लोगों की ओर से सरकार को हमेशा दोषी ठहराया जाता है और मुसलमानों के मन में आशंका पैदा की जाती है — मैं इसकी निंदा करता हूं।' यह बयान ऐसे समय में आया है जब मुस्लिम धार्मिक नेताओं के बीच राजनीतिक लाइनें खिंचती दिख रही हैं।

संपादकीय दृष्टिकोण

और दूसरा जो समुदाय को पीड़ित के रूप में प्रस्तुत करके प्रासंगिकता बनाए रखना चाहता है। मदनी पर 'टोला' और 'ब्लैकमेलिंग' जैसे शब्दों का प्रयोग बताता है कि यह महज़ मतभेद नहीं, बल्कि मुस्लिम प्रतिनिधित्व की वैधता की लड़ाई है। मुख्यधारा की कवरेज जो चूकती है वह यह है कि इस तरह की आंतरिक आवाज़ें समुदाय के भीतर एक बड़े असंतोष का संकेत हो सकती हैं जो अभी तक चुनावी या संस्थागत मंचों पर दिखाई नहीं देता।
RashtraPress
27 सितंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

मुफ्ती वजाहत कासमी ने ओवैसी और राहुल गांधी को 'एक ही डीएनए का' क्यों कहा?
कासमी के अनुसार, ओवैसी और राहुल गांधी दोनों चुनाव जीतने पर खुद को श्रेय देते हैं लेकिन हार पर चुनाव आयोग और ईवीएम को दोष देते हैं — यही उनका साझा रवैया है। उन्होंने इसे एक राजनीतिक प्रवृत्ति बताया जो संवैधानिक संस्थाओं की विश्वसनीयता को कमज़ोर करती है।
मुफ्ती कासमी ने एसआईआर प्रक्रिया पर क्या कहा?
उन्होंने कहा कि एसआईआर (विशेष सारांश पुनरीक्षण) प्रक्रिया के तहत बंगाल समेत कई राज्यों में लाखों बांग्लादेशी नागरिकों को मतदाता सूची से हटाया गया है। उनका सवाल था कि विपक्ष इस पर चुप क्यों है, जबकि यह देश के संसाधनों और लोकतंत्र की सुरक्षा का मामला है।
दिल्ली उच्च न्यायालय की पॉक्सो और पर्सनल लॉ पर टिप्पणी पर कासमी का क्या रुख है?
कासमी ने दिल्ली उच्च न्यायालय की टिप्पणी को उचित बताया और कहा कि देश का संविधान सर्वोपरि है, पर्सनल लॉ नहीं। उन्होंने मुस्लिम पर्सनल लॉ संगठनों की भी आलोचना की कि वे बेटियों के संपत्ति अधिकारों पर कभी बात नहीं करते।
महमूद मदनी के यूएन दरवाजा खटखटाने वाले बयान पर मुफ्ती कासमी ने क्या कहा?
कासमी ने इसे सीधे राजनीति करार दिया। उनके अनुसार मदनी एक सीमित देवबंदी समूह का प्रतिनिधित्व करते हैं और उनके बयान अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत और यहाँ के मुसलमानों की छवि को नुकसान पहुँचाते हैं, जबकि भारत दुनिया में मुसलमानों के लिए सबसे शांतिपूर्ण देशों में से एक है।
मुफ्ती कासमी ने मस्जिद-मदरसा मुद्दे पर मुस्लिम संगठनों को क्या नसीहत दी?
उन्होंने कहा कि जिन संगठनों ने वर्षों में मस्जिदों और मदरसों के दस्तावेज़, नक्शे और पंजीकरण ठीक करने की कभी कोशिश नहीं की, वे अब उनके गिराए जाने का दोष सरकार पर मढ़ रहे हैं। उनका आग्रह था कि इसके बजाय संगठनों को ज़मीनी जवाबदेही दिखानी चाहिए।
राष्ट्र प्रेस
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