हिजाब विवाद: मौलाना साजिद रशीदी का ओवैसी पर आरोप — 'इस्लाम से जोड़कर वोट साधने की कोशिश'
सारांश
मुख्य बातें
ऑल इंडिया इमाम एसोसिएशन के अध्यक्ष मौलाना साजिद रशीदी ने 26 अगस्त 2026 को नई दिल्ली में इलाहाबाद हाईकोर्ट के हिजाब संबंधी फैसले और उस पर एआईएमआईएम अध्यक्ष असदुद्दीन ओवैसी की प्रतिक्रिया को लेकर तीखी आलोचना की। रशीदी ने कहा कि हेडस्कार्फ और हिजाब दो अलग-अलग चीजें हैं, और ओवैसी ने इन्हें जानबूझकर इस्लाम से जोड़कर मुस्लिम मतदाताओं को लुभाने की कोशिश की है।
हिजाब और हेडस्कार्फ में अंतर
रशीदी ने स्पष्ट किया, 'हेडस्कार्फ हिजाब नहीं है — यह बात समझनी जरूरी है। हिजाब का मतलब है कि कोई महिला या लड़की चादर या किसी और चीज से अपना पूरा शरीर ढके। स्कार्फ में सिर्फ पीछे का सिर यानी बाल कवर होता है।' उन्होंने आरोप लगाया कि असदुद्दीन ओवैसी ने इसे इस्लाम से जोड़कर 'नया खेल खेला है और अपना वोट साधने की कोशिश की है।'
गौरतलब है कि इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपने हालिया फैसले में कहा कि हिजाब इस्लाम का अनिवार्य हिस्सा नहीं है। रशीदी ने इस पर सवाल उठाते हुए कहा कि सर्वोच्च न्यायालय पहले ही यह स्थापित कर चुका है कि स्कूल-कॉलेजों में हिजाब पर पाबंदी नहीं लगाई जा सकती।
इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले पर सवाल
रशीदी ने 2022 के कर्नाटक हाईकोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि जब उसे सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी गई, तो न्यायाधीश ने स्पष्ट किया था कि स्कूल और कॉलेजों में हिजाब पर रोक नहीं लगाई जा सकती। उन्होंने सवाल उठाया, 'क्या इलाहाबाद हाईकोर्ट के न्यायाधीश ने सर्वोच्च न्यायालय के उस फैसले को देखे बगैर निर्णय दे दिया?'
रशीदी ने यह भी कहा कि संबंधित छात्रा 10 वर्षों तक उसी स्कूल में हेडस्कार्फ के साथ पढ़ती रही और उस दौरान न स्कूल को और न ही किसी अदालत को आपत्ति थी। उनके अनुसार, हाईकोर्ट को स्कूल प्रशासन से यह पूछना चाहिए था कि एक दशक बाद अचानक आपत्ति क्यों उठाई गई। उन्होंने माँग की कि स्कूल की मान्यता रद्द कर उस पर भारी जुर्माना लगाया जाना चाहिए था।
यूसीसी और वंदे मातरम पर रुख
यूनिफॉर्म सिविल कोड (UCC) पर रशीदी ने कहा कि इसे मुसलमानों पर जबरदस्ती थोपा जा रहा है। उन्होंने कहा, 'निकाह, तलाक और विरासत — ये तीन अधिकार संविधान ने हमें दिए हैं। हम इन्हें इस्लाम के मुताबिक ही करेंगे।' उन्होंने स्पष्ट किया कि वे संविधान और कानून का सम्मान करते हैं, लेकिन इस्लामी व्यक्तिगत कानून से समझौता नहीं करेंगे।
वंदे मातरम को अनिवार्य किए जाने के प्रस्ताव का विरोध करते हुए रशीदी ने कहा, 'यह मुसलमानों की आस्था के खिलाफ है। हम वंदे मातरम नहीं गाएंगे।' उन्होंने कांग्रेस, समाजवादी पार्टी (सपा) और अन्य तथाकथित धर्मनिरपेक्ष दलों की आलोचना करते हुए कहा कि वे इस मुद्दे पर भारतीय जनता पार्टी (BJP) के जाल में फंस गए हैं।
टीपू सुल्तान और मुगलों पर विवादास्पद बयान
मालेगांव महानगर पालिका में टीपू सुल्तान की तस्वीर लगाए जाने का समर्थन करते हुए रशीदी ने कहा, 'टीपू सुल्तान हिंदुस्तान में सबसे पहले अंग्रेजों के खिलाफ लड़ने वाले शहीद हैं।' उन्होंने मुगलों को 'सही मायनों में रोल मॉडल' बताया और कहा कि आज उन्हें आक्रांता कहना ऐतिहासिक तथ्यों से परे है। ये बयान राजनीतिक रूप से विवादास्पद हैं और इन पर विभिन्न इतिहासकारों एवं राजनीतिक दलों की अलग-अलग राय है।
आगे की स्थिति
इलाहाबाद हाईकोर्ट के इस फैसले के सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दिए जाने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। रशीदी के बयानों ने हिजाब, यूसीसी और धार्मिक पहचान से जुड़ी बहस को एक बार फिर राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में ला दिया है।